~ मिहिर पंड्या--------------------------------------------------------------------------------जैसे इंसानों की पहचान के सबके पास अपने गुर होते हैं, वैसे ही फ़िल्मों की पहचानके भी हम अपने गुर डेवलप कर लेते हैं. इस घनघोर, छप्पर फ़ाड़, इन-योर-फेस प्रमोशनके दौर में इसके बिना कोई गुज़ारा भी नहीं. जैसे कि मैं किसी भी फ़िल्म की पहचानसबसे पहले फ़िल्म के निर्देशक के नाम से करता हूं. इसे मेरी बुरी आदत कहा जा सकताहै और शायद आप मुझे 'इंटेलेक्चुअल टाइप' भी कह दें. लेकिन फ़िल्म की पहचान का यहीसबसे अच्छा शॉर्टकट है. याने शाहरुख की फ़िल्म देखनी है कि नहीं ये शाहरुख से नहींतय होता, इससे तय होता है कि उसका निर्देशक रोहित शेट्टी है या मनीष शर्मा या राहुलढोलकिया. सिनेमा की दुनिया में निर्देशक जहाज का कैप्टन माना जाता है और उसी से तयहोता है कि जहाज़ मेरे मन के समंदर पर तैरेगा कि डूब जाएगा. यही वजह है कि फ़िल्मके ट्रेलर में निर्देशक का नाम सबसे ख़ास होता है.https://www.youtube.com/watch?v=TlZM9kuqw38 यह स्वाभाविक है कि मैं किसी भीफ़िल्म के ट्रेलर में सबसे पहले उसके निर्देशक का नाम ढूंढूगा. और यह भी कि फ़िल्मके ट्रेलर में निर्देशक के नाम को कितना वज़न दिया गया है. नई 'सौ करोड़ी' फ़िल्म'हाउसफ़ुल' 3 का ट्रेलर आया है. यहां निर्देशक का नाम है, लेकिन निर्माता का नामनिर्देशक के नाम पर भारी है. और यह तब जब निर्देशकों की जोड़ी खुद 'सौ करोड़ी' है.खांटी पॉपुलर सिनेमा बनाने वाले और नए एमबीए टाइप मार्केटिंग वाले भी इसे कैसेजस्टीफ़ाई करेंगे कि किसी फ़िल्म के ट्रेलर में उन निर्देशकों का नाम सबसे अन्त मेंनहीं आता है, जिनकी पिछली डेब्यू फ़िल्म ने 100 करोड़ से ज़्यादा रुपए कमाए थे, औरजिनकी लिखी पिछली पांच फ़िल्में सौ करोड़ी क्लब में शामिल हैं. साजिद-फ़रहाद, जो इसफ़िल्म के लेखक-निर्देशक हैं, नाम से खुद ही इस फ़िल्म में किसी मेहमान कलाकार सेलगते हैं. वे मेहनती लेखक हैं इसमें शक नहीं. मायानगरी की दुनिया में अपनी मेहनत केबल पर नीचे से ऊपर आए हैं. आज वे निर्देशक हैं. सिनेमा की सबसे सम्माननीय पोस्ट.इसलिए मुझे दुख होता है जब उनकी लिखी और निर्देशित फ़िल्में देखकर बल्लियों उछलनेवाले मेरे दोस्त उनका नाम सुनकर गूंगे बन जाते हैं. दर्जन सुपरहिट फ़िल्में औरसंवाद लिखने के बाद भी उन्हें कोई नहीं जानता. वजह साफ़ है. और वो इस तरह की फ़िल्मकी संरचना में ही शामिल है. यहां फ़िल्म के निर्माता फ़िल्म नहीं बेच रहे हैं.फ़िल्म की कहानी नहीं बेच रहे हैं. वे बेच रहे हैं सुन्दर लोकेशनें, वे बेच रहे हैंव्हॉट्सएप पर चलने वाले जोक, वे बेच रहे हैं गंभीर इंसानी बीमारियों पर चुटकुलेबनाने वाली भद्दी हंसी. ऐसी फ़िल्म में जहां लेखक-निर्देशक से ज़्यादा वज़न फ़िल्ममें पैसा लगाने वाले का हो, शायद हमें फ़िल्म से और कुछ उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए.लेकिन सच कहूं. अब मुझे ऐसी फ़िल्में देखकर गुस्सा नहीं आता. क्योंकि भले येहिन्दुस्तान के लोकप्रिय सिनेमा को कितनी भी गहरी गर्त में गिरा दें, ये निर्माताअन्तत: देश का भला कर रहे हैं. कैसे कर रहे हैं? इस 'कैसे' के पीछे मेरी एक गुप्तथ्योरी है. ग्लोबल वॉर्मिग का समय है. इस दौर में बताया गया है कि भारत को विकासशीलदेश होने के नाते ज़्यादा से ज़्यादा कार्बन फुटप्रिंट्स बनाने चाहिए. बताया गया हैकि यह कार्बन फ़ुटप्रिंट्स बड़े-बड़े बाबा देश हमसे खरीदेंगे और बदले में हमें पैसामिलेगा. और ये कार्बन फुटप्रिंट्स बनेंगे कैसे. रीसाइकिल इसका एक प्रमुख ज़रियाबनेगा. तो इसी से प्रेरणा लेते हुए हमारे सिनेमाउद्योग ने इस महती काम में अपनायोगदान देने के लिए एक नई किस्म के सिनेमा को लॉन्च किया है. पेश है 'हाउसफ़ुल 3',जो अपनी कुछ पूर्ववर्ती फ़िल्मों की तरह इको फ्रेंड्ली सिनेमा का सबसे अच्छा उदाहरणहै. इसे दरअसल 'एंटरटेनमेंट, गोलमाल 3, हाउसफुल 2, बोल बच्चन, हे बेबी, हाउसफुल'जैसी फ़िल्मों के बचे हुए माल को रीसाइकिल कर बनाया गया है. इसे बनाने में ज़रा साभी दिल या दिमाग़ नहीं खर्च हुआ है, इसलिए इसे प्रकृति की सेवा में पूर्णत: समर्पितसिनेमा माना जाना चाहिए.