क्या लखनऊ के 'ला मार्ट्स' स्कूल में अंग्रेज भूत घूमता है?
सिर्फ ला मार्ट्स ही नहीं, जानें इंडिया के टॉप बोर्डिंग स्कूलों का इतिहास
Advertisement

फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
बच्चे चलने-फिरने लायक हुए नहीं कि उनके लिए स्कूल की खोज शुरू हो जाती है. आज कल स्कूल इतने ज्यादा हो गए हैं कि आप महीनों ये सोचने में बिता देते हैं हैं कि बच्चे को किसमें भर्ती कराएं. पर एक समय ऐसा भी था कि लोग पाठशालाओं और मदरसों में पढ़ते थे. शिक्षा पर इतना जोर न था. अंग्रेजों के साथ आयीं क्रिश्चियन मिशनरी और पढ़ाई लिखाई के तौर तरीके बदल गए. इस बदलते वक़्त में कुछ ऐसे स्कूल बने जो आज देश के सबसे पुराने स्कूलों में गिने जाते हैं. ये मात्र स्कूल ही नहीं, बच्चों के जीने और बड़े होने का एक तरीका बन गए. जानते हैं ऐसे ही कुछ हेरिटेज बोर्डिंग स्कूलों का इतिहास:
आज से 200 साल पहले जब अंग्रेजों ने भारतीयों को अंग्रेजी तरीके से पढ़ाने की मुहिम छेड़ी हुई थी, चार प्रोटेस्टेंट इसाई औरतें लंदन ने भारत आयीं. उनमें से एक ने शादीशुदा जीवन चुना और बाकी तीनों ने तय किया कि लड़कियों के लिए एक स्कूल खोलना चाहिए. ये तीन औरतें थीं मिस बिन्गेल, मिस आयटून और मिस बर्च. मसूरी के पास स्कूल खोला गया. लेकिन जिस बिल्डिंग में खोला गया वहां जगह कम थी. 1857 की क्रांति के साल भर पहले स्कूल के मैनेजमेंट ने कर्नल रीली का बंगला 'वुडस्टॉक हाउस' किराए पर लिया. कुछ सालों बाद उसे खरीद लिया गया और वही वुडस्टॉक स्कूल कहलाया. कुछ ही सालों बाद पैसों और टीचरों की कमी के चलते स्कूल को बंद करना पड़ा. तब इसे अमेरिकी मिशनरी चर्च के वुडसाइड और केलोग ने खरीद लिया. छात्रों की संख्या 100 तक पहुंचने में स्कूल को लगभग 15 साल लगे. इसमें तीन-चौथाई लड़कियां थीं. देश में हैलीज़ कॉमेट यानी धूमकेतु और उसके बाद हैजे की मार को सहन कर भी स्कूल खड़ा रहा. 10 साल की कड़ी महनत के बाद 1926 में वुडस्टॉक हॉस्टल खोला गया. दुसरे विश्व युद्ध में जब जापान ने बरमा, सिंगापुर और थाईलैंड पर कब्ज़ा कर लिया, इन देशों के रिफ्यूजियों को स्कूल ने सहारा दिया. 1954 में स्कूल ने अपने 100 साल पूरे किये.
एशिया का सबसे पुराना को-एड बोर्डिंग स्कूल है लॉरेंस स्कूल. जब देश आज़ाद हुआ, लॉरेंस स्कूल के सौ साल पूरे हुए. असल में ये स्कूल अंग्रेजी सेना के हेनरी लॉरेंस ने बनवाया. स्कूल बनाया गया ब्रिटिश सैनिकों के बच्चों के लिए. स्कूल की शुरुआत में कुछ एंग्लो-इंडियन बच्चों को भर्ती किया गया, पर प्रेफरेंस उन बच्चों को मिलती जिनके माता पिता दोनों अंग्रेज़ हों. स्कूल बनने के 10 साल बाद इसे लॉरेंस रॉयल मिलिट्री स्कूल का नाम दिया गया. स्कूल अपनी मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए जाना जाता था. पहले विश्व युद्ध में स्कूल के छात्रों को ब्रिटेन की तरफ से लड़ने के लिए भेजा गया. पहले बीस सालों में देश में फैले हैजे ने लगभग 100 छात्रों की जान ले ली. सनावर स्कूल ने भी देश की आज़ादी के साथ अपने 100 साल पूरे किये. ब्रिटिश शासन ख़त्म होने के साथ कई अंग्रेज़ छात्र ब्रिटेन लौट गए और स्कूल का मैनेजमेंट देश की डिफेंस मिनिस्ट्री फिर एजुकेशन मिनिस्ट्री के हाथों में चला गया. हेनरी लॉरेंस ने ऐसे ही तीन स्कूल और बनवाये थे जो माउंट अबू, ऊटी और पाकिस्तान के गोरा गली में हैं. तीनों को ही लॉरेंस स्कूल के नाम से जाना जाता है.
स्कूल के फाउंडर सतीश रंजन दास कलकत्ते के बहुत बड़े वकील थे. उनकी पढाई-लिखाई लंदन के मैनचेस्टर स्कूल में हुई. वहां से लौट कर सतीश ने तय किया कि एक ऐसा ही एक स्कूल भारत में बनवायेंगे जिसमें हर तरह की सुविधा हो. वापस आ कर सतीश रंजन दास ने 1935 में दून स्कूल बनवाया. देहरादून में था इसलिए नाम दून पड़ा. उस दौर में बनने वाले सारे बोर्डिंग स्कूल अंग्रेज बच्चों के लिए होते थे और इन्हें क्रिशचियन मिशनरी चलाते थे. दूसरे क्रिश्चियन स्कूलों की तरह दून स्कूल धार्मिक मूल्यों पर नहीं चलता था और हर तरह के बच्चे इसमें पढ़ सकते थे.
1857 के बाद जब भारत का शासन रानी विक्टोरिया के हाथ में आया, उसने जॉर्ज एडवर्ड लिंच कॉटन को भारत में कलकत्ते के बिशप के तौर पर अपॉइंट किया. बिशप कॉटन चाहते थे कि नॉर्थ इंडिया के पहाड़ी इलाके में एक स्कूल खोलें. इसके लिए उन्होंने चंदा जमा किया और 17,000 रूपए के इन्वेस्टमेंट के साथ स्कूल खोला. स्कूल 35 बच्चों के साथ शुरू हुआ और साल भर के अंदर बच्चों की संख्या दोगुनी हो गयी. स्कूल में 65 से ज्यादा बच्चे नहीं आ सकते थे इसलिए स्कूल को शिफ्ट किया जाना ज़रूरी था. बिशप कॉटन को जो जगह पसंद आई वो केओंथल के राजा की पर्सनल प्रॉपर्टी थी जिससे राजा को बहुत प्रेम था. अंत में बिशप कॉटन ने वाइसराय जॉन लॉरेंस की मदद से वो प्रॉपर्टी खरीद ली और वहां बिशप कॉटन स्कूल की नयी ईमारत खड़ी हुई. जो आज 150 साल से भी ज्यादा पुरानी हो गई है.
फ्रेंच मूल के क्लॉड मार्टिन ईस्ट इंडिया कंपनी में अफ़सर थे. कहते हैं मार्टिन लखनऊ के नवाब असफ-उद-दौला के ख़ास दोस्त थे, और उनकी नवाबी में अफ़सरी करते हुए मार्टिन ने खूब प्रॉपर्टी बनायी. मार्टिन अपने लिए एक बहुत बड़ा बंगला बनवा रहे थे, पर जब तक उसका कंस्ट्रक्शन पूरा हो पाता, मार्टिन की मौत हो गयी. लेकिन अपनी वसीयत में मार्टिन लिख गए थे कि लखनऊ, कलकत्ता, और फ़्रांस में उनकी प्रॉपर्टी को स्कूलों में तब्दील कर दिया जाए. इन स्कूलों में अंग्रेजी और बाइबिल की शिक्षा दी जाए. लखनऊ वाले बंगले को कॉंस्टेंशिया कहा जाता था. मार्टिन ये भी चाहते थे कि उन्हें कॉंस्टेंशिया के अन्दर ही दफना दिया जाए. कुछ लोग कहते हैं कि मार्टिन ने ऐसा इसलिए किया जिससे उनके दोस्त नवाब उनकी प्रॉपर्टी न हड़प लें. 1845 में स्कूल शुरू हुआ.
एक-एक कर देश में जब कई क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल खड़े होने लगे, पाठशालाओं और मदरसों की अहमियत घटने लगी. ग्वालियर के राजा माधवराव सिंधिया चाहते थे कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिले तो, लेकिन भारतीय तरीके से. इसी सोच के साथ स्कूल बना 1897 में. स्कूल महाराजा के किले के ही एक हिस्से में बना था और तब इसमें केवल राजाओं और नवाबों के खानदानों के बच्चे पढ़ सकते थे.
अपनी पॉलिटिकल सक्सेस और खूबसूरती के लिए जानी जाने वाली महारनी गायत्री देवी ने इस स्कूल की नींव रखी. महाराजा के खानदान की ये बहू जल्द ही देश की बड़ी फैशन आइकॉन बन गयीं थीं. 1940 में जब जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह ने गायत्री देवी से शादी की, उसके चर्चे पूरे देश में हुए. पर गायत्री देवी मात्र एक खूबसूरत चेहरा ही नहीं थीं. उन्हें महल की औरतों की पढ़ाई-लिखाई की बराबर चिंता रहती थी. इसलिए उन्होंने ख़ास लड़कियों के लिए ये स्कूल बनवाया. 1943 में 24 लड़कियों के साथ स्कूल शुरू हुआ.
1. वुडस्टॉक स्कूल, मसूरी
आज से 200 साल पहले जब अंग्रेजों ने भारतीयों को अंग्रेजी तरीके से पढ़ाने की मुहिम छेड़ी हुई थी, चार प्रोटेस्टेंट इसाई औरतें लंदन ने भारत आयीं. उनमें से एक ने शादीशुदा जीवन चुना और बाकी तीनों ने तय किया कि लड़कियों के लिए एक स्कूल खोलना चाहिए. ये तीन औरतें थीं मिस बिन्गेल, मिस आयटून और मिस बर्च. मसूरी के पास स्कूल खोला गया. लेकिन जिस बिल्डिंग में खोला गया वहां जगह कम थी. 1857 की क्रांति के साल भर पहले स्कूल के मैनेजमेंट ने कर्नल रीली का बंगला 'वुडस्टॉक हाउस' किराए पर लिया. कुछ सालों बाद उसे खरीद लिया गया और वही वुडस्टॉक स्कूल कहलाया. कुछ ही सालों बाद पैसों और टीचरों की कमी के चलते स्कूल को बंद करना पड़ा. तब इसे अमेरिकी मिशनरी चर्च के वुडसाइड और केलोग ने खरीद लिया. छात्रों की संख्या 100 तक पहुंचने में स्कूल को लगभग 15 साल लगे. इसमें तीन-चौथाई लड़कियां थीं. देश में हैलीज़ कॉमेट यानी धूमकेतु और उसके बाद हैजे की मार को सहन कर भी स्कूल खड़ा रहा. 10 साल की कड़ी महनत के बाद 1926 में वुडस्टॉक हॉस्टल खोला गया. दुसरे विश्व युद्ध में जब जापान ने बरमा, सिंगापुर और थाईलैंड पर कब्ज़ा कर लिया, इन देशों के रिफ्यूजियों को स्कूल ने सहारा दिया. 1954 में स्कूल ने अपने 100 साल पूरे किये.
2. द लॉरेंस स्कूल, सनावर
एशिया का सबसे पुराना को-एड बोर्डिंग स्कूल है लॉरेंस स्कूल. जब देश आज़ाद हुआ, लॉरेंस स्कूल के सौ साल पूरे हुए. असल में ये स्कूल अंग्रेजी सेना के हेनरी लॉरेंस ने बनवाया. स्कूल बनाया गया ब्रिटिश सैनिकों के बच्चों के लिए. स्कूल की शुरुआत में कुछ एंग्लो-इंडियन बच्चों को भर्ती किया गया, पर प्रेफरेंस उन बच्चों को मिलती जिनके माता पिता दोनों अंग्रेज़ हों. स्कूल बनने के 10 साल बाद इसे लॉरेंस रॉयल मिलिट्री स्कूल का नाम दिया गया. स्कूल अपनी मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए जाना जाता था. पहले विश्व युद्ध में स्कूल के छात्रों को ब्रिटेन की तरफ से लड़ने के लिए भेजा गया. पहले बीस सालों में देश में फैले हैजे ने लगभग 100 छात्रों की जान ले ली. सनावर स्कूल ने भी देश की आज़ादी के साथ अपने 100 साल पूरे किये. ब्रिटिश शासन ख़त्म होने के साथ कई अंग्रेज़ छात्र ब्रिटेन लौट गए और स्कूल का मैनेजमेंट देश की डिफेंस मिनिस्ट्री फिर एजुकेशन मिनिस्ट्री के हाथों में चला गया. हेनरी लॉरेंस ने ऐसे ही तीन स्कूल और बनवाये थे जो माउंट अबू, ऊटी और पाकिस्तान के गोरा गली में हैं. तीनों को ही लॉरेंस स्कूल के नाम से जाना जाता है.
3. दून स्कूल, देहरादून
स्कूल के फाउंडर सतीश रंजन दास कलकत्ते के बहुत बड़े वकील थे. उनकी पढाई-लिखाई लंदन के मैनचेस्टर स्कूल में हुई. वहां से लौट कर सतीश ने तय किया कि एक ऐसा ही एक स्कूल भारत में बनवायेंगे जिसमें हर तरह की सुविधा हो. वापस आ कर सतीश रंजन दास ने 1935 में दून स्कूल बनवाया. देहरादून में था इसलिए नाम दून पड़ा. उस दौर में बनने वाले सारे बोर्डिंग स्कूल अंग्रेज बच्चों के लिए होते थे और इन्हें क्रिशचियन मिशनरी चलाते थे. दूसरे क्रिश्चियन स्कूलों की तरह दून स्कूल धार्मिक मूल्यों पर नहीं चलता था और हर तरह के बच्चे इसमें पढ़ सकते थे.
4. बिशप कॉटन, शिमला
1857 के बाद जब भारत का शासन रानी विक्टोरिया के हाथ में आया, उसने जॉर्ज एडवर्ड लिंच कॉटन को भारत में कलकत्ते के बिशप के तौर पर अपॉइंट किया. बिशप कॉटन चाहते थे कि नॉर्थ इंडिया के पहाड़ी इलाके में एक स्कूल खोलें. इसके लिए उन्होंने चंदा जमा किया और 17,000 रूपए के इन्वेस्टमेंट के साथ स्कूल खोला. स्कूल 35 बच्चों के साथ शुरू हुआ और साल भर के अंदर बच्चों की संख्या दोगुनी हो गयी. स्कूल में 65 से ज्यादा बच्चे नहीं आ सकते थे इसलिए स्कूल को शिफ्ट किया जाना ज़रूरी था. बिशप कॉटन को जो जगह पसंद आई वो केओंथल के राजा की पर्सनल प्रॉपर्टी थी जिससे राजा को बहुत प्रेम था. अंत में बिशप कॉटन ने वाइसराय जॉन लॉरेंस की मदद से वो प्रॉपर्टी खरीद ली और वहां बिशप कॉटन स्कूल की नयी ईमारत खड़ी हुई. जो आज 150 साल से भी ज्यादा पुरानी हो गई है.
5. ला मार्टनियर, लखनऊ
फ्रेंच मूल के क्लॉड मार्टिन ईस्ट इंडिया कंपनी में अफ़सर थे. कहते हैं मार्टिन लखनऊ के नवाब असफ-उद-दौला के ख़ास दोस्त थे, और उनकी नवाबी में अफ़सरी करते हुए मार्टिन ने खूब प्रॉपर्टी बनायी. मार्टिन अपने लिए एक बहुत बड़ा बंगला बनवा रहे थे, पर जब तक उसका कंस्ट्रक्शन पूरा हो पाता, मार्टिन की मौत हो गयी. लेकिन अपनी वसीयत में मार्टिन लिख गए थे कि लखनऊ, कलकत्ता, और फ़्रांस में उनकी प्रॉपर्टी को स्कूलों में तब्दील कर दिया जाए. इन स्कूलों में अंग्रेजी और बाइबिल की शिक्षा दी जाए. लखनऊ वाले बंगले को कॉंस्टेंशिया कहा जाता था. मार्टिन ये भी चाहते थे कि उन्हें कॉंस्टेंशिया के अन्दर ही दफना दिया जाए. कुछ लोग कहते हैं कि मार्टिन ने ऐसा इसलिए किया जिससे उनके दोस्त नवाब उनकी प्रॉपर्टी न हड़प लें. 1845 में स्कूल शुरू हुआ.
6. सिंधिया स्कूल, ग्वालियर
एक-एक कर देश में जब कई क्रिश्चियन मिशनरी स्कूल खड़े होने लगे, पाठशालाओं और मदरसों की अहमियत घटने लगी. ग्वालियर के राजा माधवराव सिंधिया चाहते थे कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिले तो, लेकिन भारतीय तरीके से. इसी सोच के साथ स्कूल बना 1897 में. स्कूल महाराजा के किले के ही एक हिस्से में बना था और तब इसमें केवल राजाओं और नवाबों के खानदानों के बच्चे पढ़ सकते थे.
7. महारानी गायत्री देवी गर्ल्स पब्लिक स्कूल, जयपुर
अपनी पॉलिटिकल सक्सेस और खूबसूरती के लिए जानी जाने वाली महारनी गायत्री देवी ने इस स्कूल की नींव रखी. महाराजा के खानदान की ये बहू जल्द ही देश की बड़ी फैशन आइकॉन बन गयीं थीं. 1940 में जब जयपुर के महाराजा सवाई मान सिंह ने गायत्री देवी से शादी की, उसके चर्चे पूरे देश में हुए. पर गायत्री देवी मात्र एक खूबसूरत चेहरा ही नहीं थीं. उन्हें महल की औरतों की पढ़ाई-लिखाई की बराबर चिंता रहती थी. इसलिए उन्होंने ख़ास लड़कियों के लिए ये स्कूल बनवाया. 1943 में 24 लड़कियों के साथ स्कूल शुरू हुआ.
