The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Entertainment
  • film review: varun dhawan john abraham and jacqueline fernandez starrer dishoom

फिल्म रिव्यू ढिशुम: देखी, टिकस और बुकिंग चार्ज के पैसे बर्बाद हो गए

ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए चाय-पकौड़े छोड़कर सिनेमा हॉल जाया जाए.

Advertisement
pic
29 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 29 जुलाई 2016, 09:48 AM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
फिल्म रिव्यू: ढिशुम डायरेक्टर: रोहित धवन कास्ट: जॉन अब्राहम, वरुण धवन, जैकलीन फ़र्नान्डीज, अक्षय कुमार
बहुत जने बोले लल्लनटॉप पर किसी घटिया फिल्म का रिव्यू नहीं लगा. तो आप सबकी खातिर पेश है ढिशुम का रिव्यू. ढिशुम का टिकट कल रात को ही बुक कर लिया था. सुबह 9 बजे का शो था. बारिश हो रही थी. छाता लेके पैदल चलना पड़ा, घुटने तक कीचड़ अलग लगा. इतनी देर में तो रिक्शा मिला. सोचा पिक्चर थोड़ी ठीक हो, तो ये बारिश गाली खाने से बच जाए. पर अफ़सोस, देवियों और सज्जनों. टिकस का पैसा और इंटरनेट बुकिंग चार्जेस बर्बाद गए. जब पता चला विलेन का रोल अक्षय खन्ना कर रहे हैं. अच्छा शुरू से शुरू करते हैं. तो एक हैं जॉन अब्राहम. माने कबीर. कबीर बड़ा गुस्सैल पुलिस वाला है. दिमाग डिटेक्टिव वाला है. पकड़ लिया कि गर्लफ्रेंड चीट कर रही है. भन्नाया हुआ था. तभी सुषमा स्वराज जैसे कपड़े पहनने वाली फॉरेन मिनिस्टर का फोन आता है. इमरजेंसी है. जाना होगा मिडिल ईस्ट. अब यहां मिडिल ईस्ट में मैच चल रहा है किरकिट का. इंडिया-पाकिस्तान में फाइनल होना है. बल्लेबाज विराज बड़े अच्छे फॉर्म में है. इंडिया का विराट कोहली समझो. लेकिन विराट खाली खेलता है. विराज तो पार्ट टाइम ओर्थोपेडिक सर्जन भी है. डाइव मारते हुए कंधे की हड्डी सरक जाती है. तो खुद ही चटका के ठीक कर लेता है. अक्षय खन्ना यानी वाघा की विराज पे नजर है. अब बताओ उसका नाम वाघा क्यों है? काहे से वो न हिंदुस्तानी है, न पाकिस्तानी. बस क्रिमिनल है. आदमियों को ऐसे मारता है जैसे मच्छर मार रहा हो. हमेशा जेब में पिस्तौल. 'V फॉर वेंडेटा' वाली फिल्म है न. वो वाला मास्क चुराकर लगाया है वाघा ने. और दूसरी तरफ हमारे हीरो. कबीर. सिगरेट पीना इनका शौक है. हमने ध्यान से देखा, कम फ़िल्टर वाली थी, रेगुलर. पूरी फिलिम में भाई ने कोई सुट्टा पूरा नहीं पिया. बताओ 13 रुपये की सिगरेट. भौकाल टाइट करने में दो-दो कश लेकर बुझा देता. गर्लफ्रेंड कहती थी, मत पियो. लेकिन भाई ने तय कर रखा था कि रिटायरमेंट के बाद सिगरेट के पैकेट पर मॉडलिंग करेंगे. खतरे वाली खोपड़ी बनकर. और हां. बॉडी खूब बनाई है कबीर ने. मल्लब 'सुल्तान' में साइड पहलवान का रोज आसानी से मिल जाता.
इधर वाघा विराज से कहता है, हमको 500 करोड़ की चुंगी लगी है. सट्टे में. पैसा ले लो. मैच फिक्स कर लो. इतने लोगन को रन आउट कराओ. इतने रन बनाओ. लेकिन विराज था सच्चा देशभक्त. इधर वाघा की पिस्तौल उसकी खोपड़ी में लगती, उधर विराज के दिमाग में 'सारे जहां से अच्छा' बज जाता. बोला हमको मार द्यो. मां-बाप को मार द्यो. लेकिन मैं बिकूंगा नहीं.
36 घंटे में मैच. और इतना ही समय है कबीर के पास विराज को छुड़ाने का. बीच में जैकलिन यानी मीरा. और जुनैद यानी वरुण धवन. अब धूम पिक्चर याद करो. अभिषेक-उदय का रोल याद करो. बस वही काम कबीर-जुनैद का है. कबीर के मुंह पर फ़ालतू का गुस्सा. जुनैद के घटिया पीजे. और जैकलीन एक चोट्टन जो मिशन में इनकी मदद करती है. न कोई थ्रिल. न सस्पेंस. न गाने अच्छे. ऊपर से पीजे वाली कॉमेडी. बस पूरे टाइम यही लगता रहा फिल्म कब ख़तम होगी. स्टंट हैं, पर कोई भी ऐसा नहीं जिसे देखकर आंखें निकल आएं. बल्कि आखिरी में जिस तरह दोनों हीरो चलते हवाईकॉप्टर पर आराम से खड़े रहते हैं बस कंडक्टर की तरह, हंसी और आ जाती है. जॉन और वरुण फिल्म में दो 'बॉडी' के अलावा कुछ नहीं है. डोले ही डोले हैं फिल्म में. उसके अलावा जैकलीन की सुंदर शक्ल. पूरा माचोपना ला कर वही टिपिकल बॉलीवुड पुलिस वाले की इमेज क्रिएट करते हैं. मिशन के दौरान लड़की की जान बचाते हैं. इसलिए फिल्म में कुछ भी नया नहीं दिखता. अक्षय खन्ना विलेन के तौर पर कोई भी खौफ क्रिएट नहीं कर पाते हैं. जिसकी सभी बात कर रहे थे. वो था अक्षय कुमार का कैमियो. जो बड़ा भद्दा लगा. अक्षय कुमार को फिल्म में गे दिखाया गया है. और हम अक्सर जिस तरह बॉलीवुड में देखते हैं, इस गे को भी ऐसा दिखाया है जैसे सेक्स के लिए तैयार बैठा हो. और लड़कों में अपने शिकार देखता हो. जैसे कोई सेंटीमेंटल या इंटेलेक्चुअल वैल्यू है ही नहीं बंदे में. ये तो फ़ॉर्मूला सा हो गया है. कि जहां कॉमेडी लानी हो, वहां गे कैरेक्टर ठूंस दो.
कुल मिलाकर फिल्म में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जिसके लिए जाया जाए. बारिश का मौसम है, बेहतर है घर पर बैठो, चाय-पकौड़ी खाओ. मज़े करो.

Advertisement

Advertisement

()