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ऐंग्री बर्ड्स द मूवी : फिल्म अच्छी है मगर अच्छा कुछ नहीं है

ऐंग्री बर्ड्स फिल्म आ गयी है. उसी गेम पर बनी है. वैसी ही चिड़िया हैं. वैसे ही काम हैं. सुअर भी हैं. दोनों की लड़ाई भी है.

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27 मई 2016 (अपडेटेड: 27 मई 2016, 09:38 AM IST)
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फिल्म आई है ऐंग्री बर्ड्स. गेम खेला होगा. एंड्राइड के शुरुआती दौर में चढ़ने वाले पहले गेमों में से एक. गेम बहुत ही ज़्यादा पॉपुलर हुआ था. बड़ों के बीच और बच्चों के बीच भी. ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी गेम के ऊपर कोई फिल्म बनी है. फिल्म थ्री-डी में है. फिल्म की कहानी में एक चिड़ियों का झुण्ड है. झुण्ड क्या, उनका अपना देश है. अपनी कम्यूनिटी है. सब कुछ उनका अपना है. बर्ड आईलैंड. वहां जहां सारी चिड़िया रहती हैं. कोई बैर नहीं. आपस में सभी दोस्त हैं. एकदम सूरज बड़जात्या की फ़िल्मी फैमिली टाइप वाला प्यार. लेकिन इन सबमें एक चिड़िया आउट-कास्ट है. नाम है रेड. गुस्सैल है. जिद्दी है. एक बर्थडे पार्टी के दौरान किसी पर अपना गुस्सा निकाल दिया, और मिल गयी सज़ा. सज़ा मिली अपने गुस्से को काबू करने के लिए क्लासेज़ करने की. रेड के हिसाब से बहुत ही बकवास आईडिया. वहां बस टाइम काटने को जाता. और फिर बर्ड आइलैंड पर आते हैं कुछ सुअर. सुअर जो उन्हें लुभाते हैं. उन्हें ललचाते हैं. चाहते हैं चिड़ियों को लूटना. जिसके लिए उन्हें दावतें देते हैं. रेड सुअरों की असली नीयत पहचान चुका था. वो सभी चिड़ियों को चेतावनी देता है. लेकिन कोई नहीं सुनता. और आखिर में सब लुट जाते हैं. फिल्म की कहानी चिड़ियों के लुटने से लूट का बदला लिए जाने की है. ऊपरी तौर पर देखें तो 2014 में आई 'लेगो' फिल्म की याद आती है. लेगो उस वक़्त एक ब्रांड मात्र था लेकिन उसकी कोई कहानी नहीं थी. लेगो फ़िल्म में बाकायदे कहानी को डेवेलप किया गया और क्या बेहतरीन डेवेलप किया. फ़िल्म पूरी तरह सक्सेसफुल रही थी. ऐंग्री बर्ड्स में ऐसा नहीं हो पाया. हालांकि चाहत कुछ ऐसी ही होगी. फिल्म में कुछ एक जगहें ऐसी हैं जहां मज़ा आता है लेकिन ऊपर से देखें तो इस फ़िल्म में कुछ भी नहीं है. आप भले ही फिल्म देखते वक़्त मुस्कुरा रहे होंगे या कहीं हंस पड़े होंगे. लेकिन अगर आपसे कोई पूछे कि ये फिल्म क्यूं देखी जानी चाहिए, तो आप शायद जवाब न दे पाएंगे. और ये बात जितनी बड़ों पर लागू होती है उतनी ही बच्चों पर भी. फाइंडिंग नीमो और आइस-एज सीरीज़ देखने वाली खेप के लिए ये फिल्म चूरन साबित होगी. अच्छी बात बस ये है कि अब कार्टूनों को सिर्फ एक कार्टून समझकर हल्का ट्रीटमेंट नहीं दिया जाता. अब एनिमेटेड फिल्मों में भी साइंस के कई कॉन्सेप्ट्स को दिखाया जाता है. मसलन एक मोटे गिद्ध का अपने मोटापे को छुपाने के लिए ऐसे शीशे का इस्तेमाल करना जो चीज़ों के शेप को बिगाड़ देता है. एक चिड़िया का अपनी चोंच की वजह से बुमेरांग जैसा बन जाना. और ऐसा ही बहुत कुछ. सब कुछ नहीं बताएंगे. ऐसी फिल्में सिर्फ बच्चों के लिए नहीं बड़ों को भी ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं और ये अच्छी बात है. लेकिन ऐसे समय में जब 'एक्स मेन' और 'ऐलिस थ्रू द लुकिंग ग्लास' जैसी फ़िल्में लगी हों तो ऐंग्री बर्ड्स मूवी को देखने जाना अक्लमंदी नहीं कहलायेगा. https://www.youtube.com/watch?v=QRmKa7vvct4

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