फिल्म रिव्यू: सिंबा
घिसे-पिटे फॉर्मूले वाली मज़ेदार फिल्म.
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फोटो - thelallantop
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आज की फिल्म है 'सिंबा'. रोहित शेट्टी की फिल्म. रोहित शेट्टी की फिल्मों की एक ख़ास बात होती है. आपको पहले से पता होता है आपको क्या मिलने वाला है. उड़ती कारें, मुक्का खाकर हवा में तैरते विलेन्स, स्लो मोशन का जलवा, ग्रेविटी डिफाइंग एक्शन सीन्स, थोड़ा कॉमेडी का तड़का और हल्का-फुल्का इमोशनल मेलोड्रामा. फॉर्मूला फ़िल्में बनाने में इस दशक में अगर किसी एक डायरेक्टर को महारत हासिल है, तो वो रोहित शेट्टी ही हैं. उनकी फ़िल्में कालजयी भले ही न होती हो, लेकिन हॉल से निकलने वाले लोगों में कोई विरला ही होता है जो ये कहे कि पैसे बरबाद हो गए. 'सिंबा' देखने आप ज़्यादा उम्मीदें लेकर नहीं जाते. और शायद इसी वजह से आपको फिल्म पसंद आ सकती है.
वर्दीवाला चोर
'सिंबा' कहानी है इंस्पेक्टर संग्राम भालेराव की. एक अनाथ बच्चा, जिसका सफर शुरू तो एक गुंडा बनने के लिए हुआ था लेकिन जो बना पुलिसवाला. सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे पता है वर्दी में ज़्यादा पावर है, ज़्यादा मौके हैं. वो सोना चोरी करने वाले चोरों से भी रिश्वत लेता है और जिसका सोना है, उस सुनार से भी. जो पैसे का नहीं प्यार का भूखा है और प्यार उसे सिर्फ पैसे से है. उसे देखकर 'राम लखन' के अनिल कपूर याद आ जाते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कोई राम नहीं है जो लखन को सुधार सके.
सिंबा गोवा के मिरामार पुलिस स्टेशन का इंचार्ज है. और ये पुलिस स्टेशन लोकल गुंडे दुर्वा रानडे का सरकारी अड्डा. इलाके में वही होता है जो रानडे चाहता है. सिंबा भी शुरू में उसी के पे रोल पर काम करने वाला एक कर्मचारी भर होता है. वो तो बाद में कुछ ऐसा होता है जिससे उसके अंदर का पुलिसवाला वर्दी फाड़कर बाहर आता है. ऐसा क्या होता है ये फिल्म देखकर जानिएगा.
अजय देवगन का कैमियो जहां ताबड़तोड़ तालियां बटोरता है वहीं एकदम लास्ट सीन में आने वाले सरप्राइज़ से सिनेमा हॉल सीटियों से गूंजने लगता है. वो सरप्राइज़ क्या है ये फिल्म देखकर ही जानिएगा. बहरहाल, सिंबा इस मामले में ईमानदार फिल्म है कि वो जिस उद्देश्य से बनाई है उस ट्रैक से नहीं भटकती. एंटरटेनमेंट. वो इस साल आई बड़ी-बड़ी फिल्मों की तरह आपसे धोखाधड़ी नहीं करती. सेब का वादा करके अंगूर नहीं पकड़ाती. जा सकते हैं इस वीकेंड.
सिंबा गोवा के मिरामार पुलिस स्टेशन का इंचार्ज है. और ये पुलिस स्टेशन लोकल गुंडे दुर्वा रानडे का सरकारी अड्डा. इलाके में वही होता है जो रानडे चाहता है. सिंबा भी शुरू में उसी के पे रोल पर काम करने वाला एक कर्मचारी भर होता है. वो तो बाद में कुछ ऐसा होता है जिससे उसके अंदर का पुलिसवाला वर्दी फाड़कर बाहर आता है. ऐसा क्या होता है ये फिल्म देखकर जानिएगा.
छोटे-छोटे फुंदने
अगर कोई गौर से देखे तो नाइंटीज़ की फिल्मों के कुछेक रेफ्रेंसेस उसकी पकड़ में आसानी से आ जाएंगे. जैसे जब छोटा सिंबा कहता है, 'सर पर मत मार, यहां छोटा दिमाग होता है' तो आपको 'क्रांतिवीर' के नाना पाटेकर याद आ जाते हैं. वहीं सिंबा का 'अब्बा डब्बा जब्बा' कहना 'जुदाई' की उपासना सिंह की याद दिलाता है. इसके अलावा फिल्म में मराठी डायलेक्ट बैंग ऑन है. इस बात का ख़ास ध्यान रखा गया है कि मराठी मराठी की तरह ही बोली जाए. उदाहरण के लिए आकृति नाम की लड़की का नाम जब-जब भी कोई मराठी किरदार लेता है वो आक्रुति बोलता है, और हिंदी किरदार आकृति. इसी तरह बाइस को बावीस कहलवाना भी मराठी सेटअप को कन्विंसिंग बनाता है.
रणवीर सिंह का जलवा
ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ रणवीर सिंह की है. वो तेज़ी से उन हीरोज़ की जमात में शामिल हो रहे हैं (या शायद हो ही गए हैं) जिनकी एंट्री का स्वागत सीटियों से होता है. एक लालची, करप्ट लेकिन संवेदनशील पुलिसवाले का रोल उन्होंने बेहद सफाई से निभाया है. उनके बारे में बहुतों का ये पूर्वाग्रह रहता है कि वो बहुत लाउड रहते हैं. इस रोल में गुंजाइश होने के बावजूद वो अति करते नहीं दिखाई देते. बल्कि जज बनी अश्विनी कळसेकर जो सिर्फ दो-तीन सीन्स में स्क्रीन पर नज़र आती हैं, उनसे ज़्यादा लाउड हैं. वो कॉमेडी भी उम्दा करते हैं और इमोशनल सीन्स में भी जंचते हैं. मराठी तो वो इतनी उम्दा बोलते हैं कि एक भी शब्द मिसप्लेस्ड नहीं लगता. उनकी एक्टिंग की कामयाबी इस एक बात से नापी जा सकती है कि व्हाट्सएप्प पर दर्जनों बार पढ़े हुए जोक्स भी उनकी आवाज़ में हंसी पैदा करते हैं. सारा अली खान फिलर की तरह हैं. वो सिर्फ इसलिए फिल्म में हैं क्योंकि हीरो है, तो हीरोइन भी होनी चाहिए. सोनू सूद साउथ की फिल्मों में इतनी बार विलेन का रोल कर चुके हैं कि अब अच्छे सिनेमाई विलेन बनाने का एक इंस्टिट्यूट खोल सकते हैं आराम से. आशुतोष राणा चौंकाते हैं. उनका ट्रैक बहुत अच्छा है. बाकी के कलाकार भी अपना काम ठीक-ठाक कर लेते हैं.
क्या खटकता है?
एक मसाला फिल्म से लॉजिक की उम्मीद यूं भी बेकार ही है लेकिन फिर भी कुछेक चीज़ें तो बिल्कुल हज़म नहीं होती. जैसे गवाह की हैसियत से कटघरे में खड़े किसी आदमी को जज बिना किसी मुक़दमे या चार्जशीट के ऑन दी स्पॉट सज़ा नहीं सुना सकता. ऐसे ही ये भी समझ नहीं आता कि एक मराठी सेटअप में मराठी कॉस्ट्यूम में नाच रहे लोग साउथ इंडियन गाना क्यों गा रहे हैं? इसी तरह किसी भी सभ्य समाज में ये सलूशन नहीं हो सकता कि पुलिस क्रिमिनल को गोली मार दे. अगर ऐसे उपाय सर्वमान्य होने लगे तो एक बड़े दानव की निर्मिति हो जाएगी. जिसे कंट्रोल में रखना लगभग नामुमकिन होगा.
अजय देवगन का कैमियो जहां ताबड़तोड़ तालियां बटोरता है वहीं एकदम लास्ट सीन में आने वाले सरप्राइज़ से सिनेमा हॉल सीटियों से गूंजने लगता है. वो सरप्राइज़ क्या है ये फिल्म देखकर ही जानिएगा. बहरहाल, सिंबा इस मामले में ईमानदार फिल्म है कि वो जिस उद्देश्य से बनाई है उस ट्रैक से नहीं भटकती. एंटरटेनमेंट. वो इस साल आई बड़ी-बड़ी फिल्मों की तरह आपसे धोखाधड़ी नहीं करती. सेब का वादा करके अंगूर नहीं पकड़ाती. जा सकते हैं इस वीकेंड.
