फिल्म रिव्यू: डिअर जिंदगी
शाहरुख़ का किरदार इस फिल्म में शाहरुख ही कर सकते थे.
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फोटो - thelallantop
काइरा चुप-चाप बैठी है. कमरे में रखी एक-एक चीज को ध्यान से देख रही है. घड़ी, जग, गिलास, एक सैनिक का छोटा सा पुतला, सैंडक्लॉक. ये जहांगीर से उसकी आखिरी मुलाक़ात है. इसके बाद काइरा रोने वाली है. इसके पहले भी काइरा रोई थी. खूब फफक-फफककर. लेकिन काइरा हमेशा से ऐसी नहीं थी. वो इस तरह रोती नहीं थी. कमज़ोर तो बिलकुल नहीं पड़ती थी.
कमज़ोर तो हम भी नहीं पड़ते. दुनिया-जहान की मुश्किलें सर पे आ जाएं, हम सब झेल ले जाते हैं. कभी रोते नहीं. क्योंकि रोते तो वो हैं जो कमज़ोर होते हैं. पूरे हफ्ते काम करने के बाद जब हमारे पास वीकेंड आता है, अपने कमरे में इतनी चुप्पी महसूस होती है कि जी करता है कहीं बाहर हो आएं. दोस्तों से मिल लें, पार्टी कर लें. क्योंकि अकेले होने पर डर सताता है. खुद के अतीत का डर, भविष्य का डर. जो हमारा प्रेमी है, हमें छोड़ न दे. इसलिए दे दो जितना दे सको इस रिश्ते को. फिर भी अकेलेपन का डर इतना हो जाता है कि प्रेमी को फ़ोन कर लेते हैं. एकाकीपन का डर सबको होता है. सन्नाटे का डर सबको होता है. आपको भी है. इसलिए आप 'डिअर जिंदगी' जरूर देखने जाएं.
काइरा एक सफल लड़की है. सिनेमेटोग्राफर है. जब हम उसे देखते हैं, वो 'टू-टाइमिंग' कर रही होती है. वो एक बॉयफ्रेंड के साथ है. पर एक अजीब सी कमी है उसकी लाइफ में. काम के सिलसिले में बाहर गई, दूसरे लड़के से इश्क हो गया. दूसरा लड़का अपने पिछले रिलेशनशिप के जाल में है. लाइफ में कौन 'एक्स' हो गया है? किससे प्रेम है? सब घुल सा गया है. काइरा को मालूम नहीं है क्या हो रहा है. उसे मालूम है वो कई लड़कों को डेट कर चुकी है. उसे ये भी मालूम है कि इस चीज को दुनिया कितना बुरा मानती है. उसे अपराधबोध नहीं है, डर है. एक अजीब सा डर अपनी संवेदनाओं के अनाथ होने का. उसको मालूम है कि उसकी अपने प्रेमियों के साथ निभ नहीं रही है. लेकिन वो इस बात को कैसे अपनाएगी?
दारू पे दारू पी जाएगी. नशे में धुत्त होकर नाचेगी. जब आंसू गिरने को आएंगे तो वो कच्ची मिर्ची चबा जाएगी. लेकिन कमज़ोर नहीं पड़ेगी. उन लड़कों से कभी नहीं कह पाएगी कि उसे उनके अंदर क्या नहीं पसंद था. या क्या पसंद था. हर रिश्ते को वो इतना सतही बनाकर रखेगी कि मर्द आएं और जाएं तो उसे फर्क न पड़े. लेकिन कबतक दिमाग साथ देगा? कुछ साल भी नहीं. आंखों से नींद गायब हो जाएगी. नींद की गोलियां तक काम नहीं करेंगी.
फिर यूं ही जहांगीर मिल जाएगा. धीरे धीरे सब बदल जाएगा. क्योंकि जहांगीर उसे उसके डरों से परिचित कराएगा. जो असल में काइरा को है, वो इश्क या इश्क में होने वाला धोखा नहीं. वो एंग्जायटी और स्लीप डिसऑर्डर है. एक ऐसी दिमागी तकलीफ जिसमें आपको थैरेपिस्ट, काउंसलर, या डॉक्टर की जरूरत होती है. लेकिन आप कभी डॉक्टर के बारे में सोचते ही नहीं क्योंकि आपको लगता वहां तो पागल लोग जाते हैं. कि थैरेपिस्ट के पास जाने वाला हर व्यक्ति एक मानसिक रोगी है जिसके बारे में अगर किसी को पता चल गया तो वो छिप-छिपकर बातें करेंगे.
'डिअर जिंदगी' हमें बताती है कि नींद की या दिमागी तकलीफें, किसी भी आम तकलीफ जैसी है. उसके बारे में दोस्तों से बातें करें. ये न सोचें कि अपने जी की बात कहना आपको कमज़ोर बनाएगा. वरना मन की बातें मन के अंदर दीमक की तरह आपके सुकून को खाने लगेंगी.
ये फिल्म हमें बताती है कि इश्क, इश्क ही है. आपके जीवन का ज़रूरी हिस्सा है. लेकिन बस हिस्सा भर है. नहीं निभा, तो नहीं निभा. फिर से हो जाएगा. और जबतक ये तसल्ली न पड़ जाए कि अगला सचमुच जिंदगी बिताने लायक है, उसके साथ जिंदगी बिताने का प्रेशर क्यों लें? वो आपके जीवन में दर्ज हो जाएगा, एक चैप्टर की तरह.
डिअर जिंदगी में हम देखते हैं कि जरूरी नहीं मां-पिता को हमेशा भगवान की तरह देखा जाए. वो गलती करते हैं, आम इंसानों की तरह. वो बुरे मां-बाप हो सकते हैं. और आपकी हर शिकायत जायज़ है. आप अपने मां-बाप की गलतियां बर्दाश्त नहीं कर पाते क्योंकि आप उनको जीवन में बहुत ऊंचा दर्जा दे देते हैं. उनको इंसान समझेंगे तो उन्हें माफ़ करना, उनके साथ खुश रहना, आपके लिए आसान होगा.
और फिल्म का सबसे गहरा संदेश, जो मैं पर्सनली भी अपनी उम्र की लड़कियों को देना चाहूंगी. कि लाइफ में लोड मत लो. ये मत सोचो कि दुनिया का बोझ तुम्हारे कन्धों पर है. ये मत सोचो कि सिर्फ इसलिए कि तुम औरत हो, तुम्हें अपने आपको कुछ एक्स्ट्रा प्रूव करने की जरूरत है. कि तुम्हें मर्दों को पीछे छोड़ना है. कि तुम्हें किसी का बदला लेना है. लाइफ में इश्क करो, जिससे चाहे उससे. जितनी बार चाहे उतनी बार. और हमेशा याद रखो, लाइफ में हर बार जीतने के लिए मुश्किल रास्ता चुनना जरूरी नहीं. आसान भी चुन सकते हो. वो जिसमें तुम सहज हो. वो जिसमें तुम्हें कम्फर्टेबल महसूस हो. लेकिन ये मत भूलो, कि एक रास्ता तो चुनना ही होगा. क्योंकि बैठे रहने से जिंदगी नहीं कटती.
ये फिल्म काइरा का सफ़र है, खुद को खोजने का. ये फिल्म आपको भी खुद को खोजने, खुद के अंदर झांकने का मौका देगी.
फिल्म में बारीकियों का ख़ास ध्यान रखा गया है. किस तरह एंग्जायटी का एक मरीज पहली मुलाकात में अपने थैरेपिस्ट से खुल नहीं पाता है. किस तरह उससे नजरें नहीं मिला पाता है. किस तरह बेचैन रहता है. छोटे-छोटे डायलॉग, एक्सप्रेशन और सीन्स को बारीकी से काटा गया है. किस तरह हम गुस्से में अपने प्रेमी को मैसेज लिख-लिखकर मिटाते हैं. लंबे सफ़र में किस तरह उबासी लेते हैं. और किस तरह छोटी-छोटी बातों से प्रेम कर बैठते हैं.
शाहरुख़ का किरदार इस फिल्म में शाहरुख ही कर सकते थे. इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगी.
फिल्म गोवा में बेस्ड है. तो नजरों को सुकून मिलना लाजमी है. और अगर आप भी मेरी तरह डिंपल-प्रेमी हैं, तो शाहरुख़ और आलिया के कुल मिलाकर 4 डिंपल आपको गार्डन-गार्डन कर देंगे. और जसलीन रॉयल की प्यारी सी आवाज में टाइटल ट्रैक कानों को सुकून देगा.
फिल्म में आलिया के अगेंस्ट 4 हीरो हैं. शाहरुख़ को छोड़कर. कुल मिलाकर कास्ट का अच्छा चुनाव है. शाहरुख़ ने एक बार फिर से लोगों को सिखा दिया है कि रोना बुरी बात नहीं है. आलिया को देखकर आप सकारात्मकता से भर जाते हैं.
क्या अब भी कहना पड़ेगा कि फिल्म जरूर देखिए?
https://www.youtube.com/watch?v=mKyTEJKF_SA

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