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  • Film review: Sarabjit starring Aishwarya Rai, Randeep Hudda, Richa Chaddha directed by Omung Kumar

सरबजीत फ़िल्म रिव्यू : रुला देते हैं रणदीप हुड्डा

सरबजीत. रणदीप हुड्डा और ऐश्वर्या राय की फ़िल्म रिलीज़ हुई है. पढ़ें लल्लनटॉप रिव्यू

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20 मई 2016 (अपडेटेड: 20 मई 2016, 09:20 AM IST)
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सरबजीत सिंह. पाकिस्तानी जेल में बंद एक हिन्दुस्तानी. जिसने शराब के नशे में गलती से बॉर्डर लांघा और पाकिस्तानी रेंजरों ने उसे पकड़ लिया. अगस्त 1990. 2 मई 2013 को उसकी लाश पाकिस्तान से हिंदुस्तान आई. अगस्त 1990 से मई 2013 के बीच सरबजीत और उसकी परिवार की कहानी कहती फ़िल्म सरबजीत रिलीज़ हुई. फ़िल्म में सरबजीत का रोल किया है रणदीप हुड्डा ने. उनकी बहन बनी हैं ऐश्वर्या राय. ऋचा चड्ढा हैं सरबजीत की पत्नी. कहानी लाज़मी तौर पर पूरी तरह से इन तीनों और सरबजीत की दो बेटियों के चारों ओर ही घूमती है. पहले हाफ में ऐसा लगता है जैसे फिल्म सरबजीत नहीं उसकी बहन के बारे में ज़्यादा हो. लेकिन सेकण्ड हाफ में वो कसर पूरी हो जाती है. ओमकारा का सैफ अली खान, बर्फी का रणबीर कपूर, वासेपुर का मनोज बाजपई, गुज़ारिश का ऋतिक. ऐसी ही बनी लिस्ट में अब एक और नाम जुड़ जायेगा. सरबजीत का रणदीप हुड्डा. रणदीप हुड्डा ने अपनी ऐक्टिंग के दम पर ट्रेजेडी को भी ट्रॉमा पहुंचा दिया है. एक मदमस्त पंजाबी किसान है जो अखाड़े में कुश्ती लड़ता है, स्कूटर चलाता है, परिवार को हंसाता है. वो कई सालों बाद खुद को एक 'दुश्मन देश' की जेल में पाता है. वो खुद पागलपन की चौखट पर खड़ा है. उसकी इस पूरी 23 साल की यात्रा को जिस तरह से रणदीप ने सच-मुच जिया है, वो कमाल है. कुछ शॉट्स ऐसे है जो आपको ये मनाने पर मजबूर कर देंगे कि आप किसी भी वजह से ऐसी सिचुएशन में न फंसे. रुमाल साथ में रखें. रणदीप जब मन में आता है रुला देते हैं. ऐश्वर्या राय. मिस वर्ल्ड. हमेशा चकाचौंध में रहने वाली. फ़िल्म में एकदम सादी. ऐसी कि किसी को शक भी न हो कि ये वही है जिससे सुन्दर कोई कभी था ही नहीं. जिसकी नीली आंखों के कसीदे पढ़े जाते रहे हैं, वो उन्हीं आंखों पर चश्मा चढ़ा, अपने बालों को सफ़ेद कर, कमर झुका कर चलती जाती है. पूरी लड़ाई लड़ती है. अपने दम पर. चूक होती है तो मात्र एक जगह. अनुराग कश्यप ने जब वासेपुर बनाई थी तो उन्होंने कास्टिंग में ख़ास ध्यान रखा था. कहानी चूंकि बिहार-झारखण्ड की थी, लिहाज़ा उन्होंने सारे ऐक्टर्स नॉर्थ बेल्ट से लिए थे. इस फिल्म में ऐसा नहीं है. ऐश्वर्या राय पंजाबी बोलती नहीं दिखतीं. वो सिर्फ उतनी ही पंजाबी बोल रही होती हैं जितनी पॉपुलर कल्चर का हिस्सा हैं. जैसे लगान में आमिर अवधी के साथ पूरा जस्टिस नहीं कर सके, वैसा ही कुछ-कुछ केस ऐश्वर्या का इस फ़िल्म में भी है. ऋचा चड्ढा. इस फ़िल्म की अंडरडॉग. इनका हाल वही है जो शोले में साम्भा का था. उसे सिर्फ एक डायलाग मिला था. इन्हें एक से कुछ ज़्यादा. लेकिन साम्भा आज तक याद है तो ऋचा चड्ढा भी याद रहेंगी. ऐश्वर्या के कैरेक्टर को वज़न देने, उसे ग्लोरिफाई करने की कोशिश में सरबजीत की पत्नी का रोल निभा रही ऋचा चड्ढा दबी-दबी सी दिखती हैं. उनकी तकलीफ़ों को उनकी खामोशी के ही ज़रिये दिखाया गया है. वो भी जानबूझकर ऐसा किया गया या नहीं, कहना मुश्किल है. एक इंसान जो 23 साल से किसी ग़लत इलज़ाम में दूसरे जेल में बंद है, जिसे फांसी दी जाने वाली है, उसकी पत्नी चुप रहे? पचता नहीं. ऐश्वर्या राय अगर एक महंगी गाड़ी हैं तो ऋचा चड्ढा उस गाड़ी की सीट हैं. गाड़ी भले ही बाहर से चमचमा रही हो लेकिन आराम में अन्दर की सीट का खासा हाथ होता है. फ़िल्म सरबजीत, सरबजीत और उसके परिवार के साथ हुई ज़्यादती के साथ पूरा जस्टिस करती है. हालांकि कई जगह पर फ़िल्म में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की हमेशा मौजूद रही बीमारी के लक्षण दिखते हैं. मैं आज भी उस दौर के इंतज़ार में हूं जब फिल्मों में गाने न के बराबर या कहानी के बैकग्राउंड में हों. कम से कम ऐसी फ़िल्म जो किसी कैदी पर बनी है, जिसकी शुरुआत में वो कैद हो जाता है और उसके मरने पर ही फ़िल्म ख़त्म होती है, को छोड़ दिया जाना चाहिए. फ़्लैशबैक और फ़्लैशबैक में एक गाने की आदत छोडनी होगी. फ़िल्म की कहानी असली है लेकिन डायलाग फ़िल्मी. कई जगह पर मॉरल साइंस की क्लास की याद आ जाती है. ऐसी फिल्मों में इनकी पूरी गुंजाइश भी रहती है. डायलाग में इंसानियत, देश, बहादुर, ताकत, चौड़ा सीना, अमन, शांति जैसे शब्दों को टॉपिंग्स की तरह इस्तेमाल किया जाता है. ऐक्टिंग के बेस पर गानों के सॉस लपेट के फिल्म को पिज़्ज़ा की तरह गरमा-गरम सर्व किया जाता है. सरबजीत भी ऐसा ही पिज़्ज़ा है. अच्छी बात ये है कि इस बार पिज़्ज़ा अच्छा है. बस कहीं कहीं हुई लेक्चरबाजी छोड़कर. एक बड़ी बात. जो हमेशा सालती रही है. और जो निहायती ज़रूरी भी है. एक फ़िल्म आई थी 1991 में. JFK. फिल्म बनाई थी ऑलिवर स्टोन ने. केविन कॉस्टनर, जिम गैरिसन और गैरी ओल्डमैन की ऐक्टिंग थी. फिल्म थी अमरीकन प्रेसिडेंट जॉन एफ़ केनेडी की हत्या की साज़िश के ऊपर. एक इन्वेस्टिगेट करती हुई फ़िल्म. फ़िल्म में सभी नाम, सभी घटनाएं सच्चाई से बेहद करीब थीं. फिल्म का असर इतना था कि कैपिटल हिल में पूरी अमेरिकी कांग्रेस ने उस फिल्म को देखा. और वही से 1992 के Assasination Disclosure Act की नींव पड़ी. हम अपने देश में बनी फिल्मों में न जाने कब किरदारों के असली नाम देख-सुन पायेंगे. पाकिस्तानी सेना ने सरबजीत को मंजीत सिंह समझ गिरफ्तार किया था. बाद में सेना के टॉर्चर से तंग आकर उसने कुबूल भी कर लिया था कि वो मंजीत सिंह है. लेकिन इस नाम 'मंजीत सिंह' को भी फिल्म में रंजीत सिंह दिखाया गया है. हम फिल्म में हिन्दुस्तानी-पाकिस्तानी राजनीति से जुड़े लोगों के नाम भी बदले हुए ही पाते हैं. एक नाम जो असली है वो है 'अवैस शेख'. इनका असली नाम शायद इसलिए ही इस्तेमाल हो पाया क्यूंकि ये सरबजीत के वकील थे और आज कल स्वीडन में शरणार्थी बने बैठे हैं. पाकिस्तान में तालिबानियों ने इनके खिलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया था. फिल्म सरबजीत एक हिला देने वाली फिल्म है. कई जगहों पर सोचने को मजबूर करती है. साथ ही रणदीप को शाबाशी देने पर भी. फ़िल्म खतम होने पर खुद को एक भारी मन से बाहर आते हुए पाएंगे. फैक्ट्स से ज़्यादा इमोशन्स पर ध्यान दिया गया है. गाने, छोटे ही सही, और लेक्चरबाजी, थोड़ी ही सही, न होती तो अच्छा था. अब मार्केट में रणदीप हुड्डा की बात करने वालों की गिनती में एक बड़ा बूम आने वाला है. https://www.youtube.com/watch?v=q1kYpWU7apI

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