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  • Film Review Newton starring Rajkumar Rao, Raghubeer Yadav, Pankaj Tripathi directed by Amit Masurkar

खुशखबरी : अगले ऑस्कर के लिए इंडिया से न्यूटन भेजी जाएगी

जिसमें एक आर्मी का अफ़सर कहता है कि ये वोटिंग मशीन एक खिलौने जैसी है.

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21 सितंबर 2017 (अपडेटेड: 22 सितंबर 2017, 09:27 AM IST)
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एक लड़का है. हर दूसरे लड़के जैसा लगता है. लाइट चली जाती है तो तुरंत उचककर देखता है उसी के ब्लॉक की गई है या पूरी गई है. मालूम पड़ता है कि बस उसी के ब्लॉक में अंधेरा है. झट से नीचे उतरता है और ट्रिप हुई एमसीबी को सही करके आ जाता है. ताज़ी ताज़ी सरकारी नौकरी लगी है इसलिए उत्साहित है. लेकिन डरता है कि कहीं बस कुर्सी पर बैठा न रह जाए. बाकियों की तरह. बाकी लोगों के लिए दफ्तर में सबसे रोचक पल वो होते थे, जिसमें सभी ताश खेला करते थे. इस लड़के को इसी बात की कोफ़्त है. इसे दुनिया को सुधारना है. क्रान्ति लानी है. और ये बखूबी जानता है कि कुर्सी गरम करने से क्रान्ति न आने वाली.
इसने क्रांति की शुरुआत खुद से की थी. नूतन नाम था इसका बचपन में. दसवीं में रजिस्ट्रेशन के वक्त नू को न्यू और तन को टन कर लिया और न्यूटन बन गया. इस बात को बताने में इसकी चिलबिलाती आंखों में एक्स्ट्रा शाइन आ जाती है. और अचानक एक दिन न्यूटन को एक ज़िम्मेदारी दी जाती है. नक्सल प्रभावित इलाके में वोटिंग करवाने की. और ये चल पड़ता है. बिना दोबारा सोचे. एक महा-ईमानदार सरकारी ऑफिसर देश की बड़ी अंदरूनी मुसीबत से दो-चार होने जा रहा है. इसी मुलाकात की कहानी है न्यूटन. घुंघराले बालों वाला, आंखें मिचकाने वाला, सरकारी टेबल पर ताश के पत्तों से नफ़रत करने वाला, सवाल करने वाला और कायदे-कानून वाला न्यूटन.
rajkumar rao newton
राजकुमार राव ने अपने कैरेक्टर के साथ भरपूर एक्सपेरिमेंट्स किए हैं.

डायरेक्टर अमित मासुरकर की 2013 में एक छोटी फ़िल्म आई थी. सुलेमानी कीड़ा. मुंबई में रहने वाले दो लड़कों की कहानी. शूं-शां वाली कहानी. सेक्स की चाह रखने वाले और हर बार केएलपीडी करवाने वाले लेखक की कहानी. वो लेखक जो एक पब में खड़ा होकर कविता सुनाता है या अपना ही दर्द बयान करता है - "मेरी गां* में कीड़ा है..." अंकल आते हैं और उसे संस्कारों की सीख दे जाते हैं. लड़का मुंह बाए खड़ा रहता है. मयंक तिवारी. न्यूटन में पोलिंग बूथ के बाहर हेल्मेट पहने और माइक पकड़े 20 सेकन्ड के लिए दिखता है. न्यूटन की लिखाई में इसके कीड़े का भी हाथ है.


मैंने बचपन में घरवालों की गैरमौजूदगी में थर्मामीटर तोड़ा था. जानबूझकर. मुझे बताया जाता था कि अन्दर पारा भरा होता है, लेकिन मैं ये साबित करने पर तुला था कि वो पारा नहीं बल्कि पानी है. जब थर्मामीटर टूटने के बाद पारा ज़मीन पर फ़ैला तो महसूस हुआ कि उसमें और पानी में कितना भयानक अंतर है. पानी बहता है. पारा भी बह रहा था. लेकिन अभी तक फर्श पर पानी बहता देखने वाला मैं, चौथाई चम्मच पारे का बहाव देखकर सकते में था. एकदम मुग्ध. कुछ 20-21 सालों बाद वो बहाव न्यूटन फ़िल्म में देखा. पारा फैलता नहीं है. न्यूटन भी नहीं फैलती. कुछ टुकड़े ज़रूर होते हैं. लेकिन एक दूसरे के पास आते ही ऐसे मिल जाते हैं जैसे अलग ही नहीं थे. न्यूटन भी वही पारा है. न जाने ये फ़िल्म किस थर्मामीटर में कैद थी. अमित, मयंक, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, अंजली पाटिल और रघुबीर यादव ने मिलकर इसे तोड़ा है. हम सभी फिर मुग्ध होने वाले हैं. 




 
हाल ही में एक फ़िल्म आई थी. कहानी लखनऊ की थी. नाम में भी लखनऊ था. उसमें एक जेल दिखाया जाता है. फ़िल्म अगर ध्यान से देखिये तो जेल के पीछे पहाड़ दिखाई देते हैं. लखनऊ में जीवन का 50% हिस्सा बिताने वाला ये नाचीज़ खुद को एक नम्बर का सड़कछाप मानता था. लेकिन अब परेशान है कि ससुरा पहाड़ वाला इलाका छूट कैसे गया? वहां बियर पीते तो क्या मज़ा आती. (हमारे यहां मज़ा आता नहीं आती है). हो सकता है 2014 के बाद वहां पहाड़ इनस्टॉल करवाया हो. अखिलेश यादव ने मेट्रो चलाकर चुनाव जीतने की सोची थी. शायद पहाड़ लगा के भी वोट पाने का प्लान होगा. हमको नहीं मालूम. लेकिन न्यूटन सच्ची-मुच्ची के छत्तीसगढ़ के जंगलों में शूट हुई है. कहानी भी वहीं की है. फ़िल्म में मौजूद गांव के लोग भी आस-पास के इलाकों से हैं. कास्टिंग करने वाले रोमिल मोदी ने महीनों उन्हीं जंगलों और आसपास के गांवों में बिताया है. वहां से ऑडिशन रिकॉर्ड करके वो शहर आते थे और फिर इन्टरनेट की मदद से उन ऑडिशन्स को बम्बई में तैयारी कर रहे अमित देखते थे. आगे के इंस्ट्रक्शन लेने के बाद अगले तीन-चार दिनों के लिए फिर से रोमिल गायब हो जाते थे. ऐसे इलाके में जहां इन्टरनेट क्या फ़ोन के सिग्नल भी दूभर थे. इसीलिए जब आप ये फ़िल्म देखते हैं तो आपको पेड़ों से छनती धूप की गरमी महसूस होती है.
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ऐक्टिंग के मामले में इस फ़िल्म को पकड़ना मुश्किल होगा. राजकुमार राव हर फ़िल्म में बार को ऊंचा करते जा रहे हैं. पिछले एक महीने में राजकुमार एक दब्बू प्रीतम विद्रोही से बैडऐस बबुआ बनकर अब न्यूटन बन गए हैं. और ये कमाल का ट्रांसफॉर्मेशन है. फिलहाल ये सिर्फ राजकुमार के बस की बात लग रही है. पंकज त्रिपाठी. ओमकारा का किचलू, वासेपुर का सुल्तान, बरेली का नरोत्तम मिश्रा और न्यूटन का आत्मा राम. आत्मा राम को नाइट-विज़न गॉगल्स चाहिए. और इसी कोफ़्त से भरा वो नक्सली इलाके में बैठा है. कहता है डेंजर इलाका है. जल्दी निकल लेना चाहिए. न्यूटन का पूरक. स्क्रीन पर न्यूटन और आत्मा राम को एक साथ देख वो ठंडक मिलती है जो चिलचिलाती गरमी में पुदीने से महकते आम के पने को पीने पर मिलती है. पंकज त्रिपाठी ने कहीं भी खुद को उन्नीस नहीं होने दिया है और पिछले कामों से बीस ही साबित हुए हैं.
थाना प्रभारी से सुबूत वाली कटी उंगली वहीं फेंक देने को कहने वाला सुलतान जब वर्दी धारण कर कहता है "वर्दी में विनती भी धमकी मालूम देती है." तो आप उसके साथ सहानुभूति रखने लगते हैं. आपका एक हिस्सा उस वक्त भी न्यूटन के साथ रहता है. और यहीं आत्मा राम और उस नाम का चोंगा ओढ़े पंकज त्रिपाठी जीत जाते हैं. रघुबीर यादव एक छोटे, लेकिन बेहद अहम रोल में हैं. उनका अनुभव उनकी बातों में दिखता रहता है. रघुबीर और ओमकार दास मणिकपुरी को साथ देख एक और डार्क कॉमेडी पीपली लाइव याद आ जाती है. 3 हफ्ते में दूसरी बार दिखने वाली अंजली पाटिल एक आदिवासी लड़की मलको के रोल में हैं. ये जो भी कहती हैं वो रह-रह कर तमाचे सा लगता है. नक्सल प्रभावित क्षेत्र में रहने वालों की परेशानियां और उनकी दुर्दशा अंजली के ज़हर बुझे बोलों से हम तक पहुंचती है.
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कुल मिलाकर न्यूटन एक नई फ़िल्म है. एक साबुत फ़िल्म है और इसमें सब कुछ देखने लायक है. सब कुछ.
इस फ़िल्म को देखा जाए. इसे स्कूल सिलेबस में जुड़वा दिया जाए. इसे समझा जाए और इससे सीखा जाए. हर किसी को मालूम हो कि वोटिंग मशीन एक खिलौना नहीं होती. हर कोई न्यूटन बन जाए. न बन पाए तो कम से कम न्यूटन होने की ऐक्टिंग ही करे. सब अच्छा होगा.


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