मदर्स डे फिल्म रिव्यू: कॉमेडी ऐसी जो रुला दे
फिल्म से अच्छा तो हमने रिव्यू ही लिख दिया है.
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फोटो - thelallantop
फिल्म रिव्यू: मदर्स डे
डायरेक्टर: गैरी मार्शल
कास्ट: जूलिया रॉबर्ट्स, जेनिफर ऐनिस्टन, केट हडसन, जेसन सूडिकिन
झेलने का टाइम: 2 घंटे
फिल्म का नाम है मदर्स डे. जाहिर सी बात है फिल्म माओं पर है. तो फिल्म में क्या है, बहुत सारी माएं हैं. कुंवारी मां से तलाकशुदा मां तक. लेस्बियन मां से ले कर मरी हुई मां तक. चूंकि फिल्म औरतों पर है, माओं पर है, टूटते-जुड़ते रिश्तों पर है, उम्मीद की जा सकती है कि कॉमेडी होते हुए भी फिल्म में गहराई होगी. चूंकि फिल्म में लेस्बियन हैं, ब्लॉन्ड औरतों के बीच एक काले बालों और गहरी चमड़ी वाला इंडियन है, उम्मीद की जा सकती है कि फिल्म कॉमेडी होते हुए भी संवेदनशीन होगी. लेकिन मदर्स डे में आपको ऐसा कुछ भी नहीं मिलता. और कमाल की बात ये है कि कॉमेडी भी नहीं मिलती.
कहानी का प्लॉट ये है कि इसमें बहुत से प्लॉट हैं. सैंडी (जेनिफर ऐनिस्टन), जिन्हें हम इंडिया वाले सबसे ज्यादा 'फ्रेंड्स' टीवी शो की 'रेचल' के रूप में पहचानते हैं, एक तलाकशुदा मां बनी हैं. उनको अपने एक्स हसबैंड की बीवी से जलन होती है. डर लगता रहता है कि वो उसके बच्चों को सम्मोहित कर अपने पाले में मिला लेगी. (मिरांडा) जूलिया रॉबर्ट्स एक स्टार उपन्यासकार हैं. इतनी पॉपुलर हैं कि उनके नाम भर से उनका जूलरी ब्रांड मार्केट में बिक जाता है. फिर हैं जेस (केट हडसन) जो एक भारतीय लड़के से शादी कर चुकी हैं. जेस की बहन है गेबी (सारा चाक) जो एक लेस्बियन है. और... क्या, थक गए? ये तो बस आधी कास्ट है.
तो ऐसी ही दर्जन भर माएं हैं फिल्म में. प्लस, एक मरी हुई मां जिसका पति अब मां का फ़र्ज़ अदा कर रहा है. और फिल्म में हैं लगभग दो दर्जन बच्चे. तो ये सभी लोग एक दूसरे से मिलते हैं. कभी दोस्ती के नाते, कभी रिश्तेदारी के नाते, तो कभी बस संयोग के चलते. और सबकी पर्सनल लाइफ में कुछ न कुछ चल रहा है. छोटी-छोटी ट्रेजेडीज जो हास्यास्पद हैं. माओं के रोजमर्रा के जीवन के छोटे-छोटे फ्रस्ट्रेशन जिन्हें देख आपकी हंसी छूट जाए. ऐसा मानना है फिल्म बनाने वालों का. क्योंकि हमें तो कहीं भी हंसी नहीं आई.
अच्छा हां, सबसे मेन बात. ये सब लोग तैयारी कर रहे हैं आने आले मदर्स डे की. फिल्म का नाम भी यही है तो जाहिर है फिल्म का प्लॉट इसी दिन पर ख़त्म होगा. और हर किरदार का इस दिन तक का सफ़र आप आसानी से प्रेडिक्ट कर सकते हैं. प्लॉट में ऐसा कोई भी मोड़ नहीं है जो आपको कोंचे. इसलिए आधी फिल्म तक पहुंचने तक बेचैनी होने लगती है. कि फिल्म में कोई तो धमाका हो.
ख़तम होने के पहले फिल्म आपके ऊपर एक हजार चार सौ बत्तीस घटिया जोक जबरन थोप चुकी होगी. और जिस तरह शेक्सपियर की कॉमेडी में 'फूल' यानी एक ऐसा मसखरा होता है जो बड़ी-बड़ी और गहरी बातें कर कॉमेडी को सीरियस बनाता रहता है. वैसा ही एक जोकर आपको इस फिल्म के एक सीन में मिलेगा. लेकिन तकलीफदेह ये है कि उसकी बातें सुन कर भी आपके इमोशन नहीं जागते. आलम ये है कि फिल्म में स्टैंड अप कॉमेडियन जैक (जैक वाइटहॉल) के जोक्स पर भी हंसी नहीं आती. कुल मिला कर किसी अमेरिकी सिटकॉम का गरीब वर्जन लगती है मदर्स डे.
और हां, फिल्म में केट हडसन के पति रसेल (आसिफ मांडवी) के किरदार को देख तो आपना इंडिया पर से भरोसा ही उठ जाना है. रसेल एक सेंटी टाइप का पति है. जो सफ़ेद गंजी के ऊपर चमकता गुलाबी रोब पहनता है. जिसकी मां गहनों और सिल्क के कपड़ों से लदी रहती है. मानो भारतीय होने का मतलब केवल चमकदार कपड़े पहन बेवकूफाना बातें करना हो.
फिल्म एक ही सूरत में देखें. अगर घर पे लाइट चली गई हो. भयानक गर्मी लग रही हो, और आपको 200 रुपये लगा कर 2 घंटे AC की हवा खानी हो.

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