The Lallantop
Advertisement

डेली सोप के दौर में 'की एंड का' एक अच्छी कोशिश है

फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए. हर उम्र के लोगों को.

Advertisement
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
pic
प्रतीक्षा पीपी
1 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 12 मई 2016, 12:32 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
फिल्म रिव्यू: की एंड का कास्ट: करीना कपूर, अर्जुन कपूर डायरेक्टर/कहानी: आर बाल्की रनिंग टाइम: 2 घंटे 6 मिनट
  फिल्मों में इश्क-मोहब्बत जब सूरज बड़जात्या के 'विवाह' से आगे बढ़ा तो 'कॉकटेल' जैसी फिल्म तक पहुंचा. जहां सेक्स है, शराब है, पर फिल्म खत्म होने तक मानो हीरो-हिरोइन बड़े हो जाते हैं. जिम्मेदार हो जाते हैं. हमारी फिल्मों के रोमैंस शादियों पर ख़त्म होते आ रहे हैं. प्रेम कहानियां तभी सार्थक हो पाती है जब वो शादी में बदल जाएं. 'की एंड का' एक ऐसा रोमैंस है जो शादी से शुरू होता है. कबीर और किया की पहली मुलाक़ात में ही कबीर सिसक-सिसक कर रो रहा होता है. और किया एक बिजनेस मीटिंग के लिए जा रही होती है. कबीर जी भर के रोता है, मरी हुई मां को याद करता है. लड़की के देख लेने से शर्मिंदा महसूस नहीं करता. 'मर्दानगी' के स्टीरियोटाइप को तोड़ती हुई जब हीरो और हिरोइन की ये पहली मुलाकात होती है, हम समझ जाते हैं कि फिल्म में आगे कुछ अच्छा, कुछ प्रोग्रेसिव होने वाला है. और आखिरी सीन तक फिल्म आपकी आंखें पर्दे की ओर खींचे रहती है. फिल्म में दो अलग दुनिया हैं. एक कबीर के पिता की दुनिया, जहां औरत मर्द की जिम्मेदारी होती है. जहां औरत भले की कितनी भी भारी नौकरी कर ले, उसके पति का घर बैठना गाली जैसा होता है. और दूसरी दुनिया है किया की मां की. जिसमें कोई मर्द नहीं है. मां और बेटी मिल कर कमाती हैं. घर के काम बाई करती है. कबीर अपनी मां जैसा बनना चाहता है. 'मकानों' को 'घर' बनाना चाहता है. किया एक बड़ी कंपनी की CEO बनना चाहती है. दोनों एक दूसरे के लिए परफेक्ट हैं. पर क्या ये रिश्ता उनके घर के बाहर जिंदा रह पाएगा? लोग सवाल पूछते हैं कि तुम्हारा पति क्या करता है. तो किया के लिए ये बताना मुश्किल होता है कि वो घर के काम करता है. किया हर रोज बिजनेस के लिए अलग अलग मर्दों से मिलती रहे, तो कभी तो ऐसा दिन आएगा कि कबीर इनसिक्योर महसूस करेगा. कभी ऐसा भी होगा कि किया की तनख्वाह पूरी नहीं पड़ेगी, और कबीर को काम करना शुरू करना पड़ेगा. कबीर के घर पर रहने से जो संतुलन बना रहता था, वो जब बिगड़ेगा, तो किया को फ्रस्ट्रेशन होगी. एक वक़्त ऐसा आएगा कि किया बिलकुल वैसी हो जाएगी जैसा इंडिया का टिपिकल पति होता है. और कबीर एक टिपिकल पत्नी. ऐसी स्थिति में पितृसत्ता मातृसत्ता में बदल जाएगी. सत्ता फिर भी रह जाएगी. ऐसी कई मुश्किलों से कबीर और किया बस प्यार और विश्वास के दम पर कैसे जीतते चले जाते हैं, इसकी कहानी है 'की एंड का'. कई स्टीरियोटाइप हैं जो फिल्म तोड़ती है. जैसी शादी के बाद पति या पत्नी का एक-दूसरे पर आश्रित होना जरूरी नहीं. बल्कि पति और पत्नी यहां एक दूसरे का सपोर्ट सिस्टम बन कर उभरते हैं. दोनों एक दूसरे के साथ मुकम्मल महसूस करते हैं. पर दोनों की पहचान अलग अलग है. दोनों अलग अलग भी अपने आप में पूरे हैं. फिल्म इस पॉपुलर मान्यता को तोड़ती है कि शादी के बाद सिंगल होने का सुख खत्म हो जाता है. किया कबीर से बड़ी है. किया की मां एक शादीशुदा बेटी के होते हुए भी इश्क करती है. इश्क को स्कूल-कॉलेज के लड़के-लड़कियों से निकाल कर एक मैच्योर सेटअप में पेश किया जाए, ऐसा मेनस्ट्रीम बॉलीवुड सिनेमा में कम दिखता है. जिसके लिए फिल्म को एक्स्ट्रा मार्क्स मिलने चाहिए. फिल्म को देखकर ये समझ आता है कि सिर्फ पति का घर पर, और औरत का बाहर काम करना शादीशुदा लोगों की जिंदगी में चल रही दिक्कतों का समाधान नहीं है. किसी मैरिज को बचाने के लिए काम बांटने जितना ही जरूरी है एक-दूसरे की खुशी में खुश होना. और एक दूसरे के डरों और दिमाग में बसे डाउट्स को समझना. कबीर औरतों पर एक स्पीच से रातोंरात स्टार बन जाता है. फिर सेमिनार और कांफ्रेंस में जाने लगता है. टीवी पर आ जाता है. इससे सोशल मीडिया पर चल पड़े नए ट्रेंड पर भी कमेंट मिलता है. किस तरह किसी आमदी की पर्सनल चॉइस दुनिया के लिए एक बड़ी बात बन जाती है. और प्राइवेट और पब्लिक के बीच की रेखा हल्की पड़ते ही रिश्ते बिखरने लगते हैं. फिल्म में कई सीन ऐसे हैं जिन्हें शायद बॉलीवुड में पहले ही आ जाना चाहिए था. जैसे किया का नाचने का जी नहीं करता तो सहेली के पति से ये कहने में नहीं हिचकिचाती कि उसे पीरियड हो रहे हैं. कबीर वर्कआउट भी करता है, किटी पार्टी में भी जाता है. किया बिजनेस मैगजीन के कवर पर छपती है, कबीर गृहशोभा जैसी मैगजीन के कवर पर. किया की मां चाहती है कि सेक्स शादी के पहले हो चुका हो. कबीर घर का बजट बनाता है तो ज़रूरी खर्चों में व्हिस्की के खर्च को शामिल करता है. आदर्श परिवारों की खोखली नैतिकता को टाटा कह दिया आर बाल्की ने. अच्छा लगा. एक सवाल जरूर रह गया दिमाग में. कि अगर कबीर एक अमीर खानदान से न होता, तो भी क्या होममेकर बनने का सपना देख पाता? क्या जेंडर से जुड़ी क्रांति केवल अमीर खानदानों के लिए है? पर फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए. हर उम्र के लोगों को. कहानी बढ़िया है. जो लोग करीना कपूर और अर्जुन कपूर की केमिस्ट्री देखने के लिए फिल्म की राह देख रहे थे, वो निराश नहीं होंगे. उसी पॉपुलर कल्चर, जिसका हिस्सा औरतों को घर की सीमाओं में बांधते डेली सोप हैं, को 'की एंड का' जैसी कहानी देना एक अच्छी कोशिश है.

Advertisement

Advertisement

()