एक आदमी है. मुंबई में रहता है. किसी अच्छे बैंक में वाइस प्रेसिडेंट है. पैसे वालाहै. डॉक्टर के पास जाता है. मालूम पड़ता है कि जो पेट का अल्सर समझा जा रहा था, असलमें कैंसर था. पेट का कैंसर. आदमी परेशान. उसने जीवन में 'कुछ नहीं किया था.' इतनीअच्छी डायट फॉलो करता था की परफेक्शन भी शर्मा जाए. लेकिन उसको कैंसर निकल आया. अबक्या करे? उसके पास 3 महीने हैं जीने के लिए. लेकिन इस समय में वो जीना चाहता है.वैसे नहीं जैसे वो अब तक जीता आया है. बल्कि वैसे जैसे जीने में उसे मज़ा आए.क्यूंकि अब उसका डर ख़त्म हो चुका था. इस दौरान वो क्या क्या करता है, इसकी कहानी हैकालाकांडी. एक लड़का है, एक लड़की है. दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं. लड़की अमरीकाजा रही है अपनी पीएचडी करने. जाने से पहले वो एक बर्थडे पार्टी में जाते हैं. किसीक्लब में. वहां पुलिस की रेड पड़ जाती है जो ड्रग्स की तलाश में है. पुलिस लड़की कोघंटे भर में फ्लाईट पकड़नी है लेकिन पुलिस है कि पूरी जांच किये बिना जाने नहींदेगी. वो और उसके दोस्त कैसे निकलते हैं, आगे क्या होता है, इसकी कहानी हैकालाकांडी. दो फुकरे हैं. एक डॉन के लिए काम करते हैं. उसका रुपया इधर से उधर करतेहैं. दोनों महत्वाकांक्षी हैं. उन्हें भी बड़ा आदमी बनना है. पैसा कमाना है. खूबसारा. वो चट चुके हैं अपने सेठ के लिए पैसा लाते-लाते. प्लान बनाते हैं कि पैसा उड़ादेंगे. कैसे उड़ायेंगे, उड़ा पाएंगे भी या नहीं, इसकी कहानी है कालाकांडी. ये तीनोंकहानियां समानांतर रूप से चलती रहती हैं. और जैसे दो समानांतर रेखाएं इन्फिनिटी परजाकर एक दूसरे को काटती हैं, ये तीनों कहानियां भी एक जगह पर आकर एक दूसरे कारास्ता काटती हैं. इस पूरे झोल की कहानी है कालाकांडी. सैफ़ अली खान ने पहली बार ऐसाकुछ काम किया है. बल्कि हिंदी फ़िल्मों में पहली बार ऐसा काम हुआ है. एसिड/एलएसडी(एक तरह का साइकेडेलिक ड्रग) इस फ़िल्म का ख़ास हिस्सा है. साल 1998 में एक अंग्रेजीफ़िल्म आई थी - फ़ियर एंड लोदिंग इन लास वेगस. फ़िल्म में जॉनी डेप थे जो एलएसडी केनशे में लास वेगस में घूम रहे थे. सैफ़ अली खान उसी जॉनी डेप की तरह मुंबई की सडकोंपर घूम रहे थे. उन्हें मालूम चल चुका था कि मरने वाले हैं तो वो सब कुछ ट्राई करनाचाहते थे. इस चक्कर में उन्होंने एक लो-प्रोफाइल ट्रांसजेंडर सेक्स वर्कर को साथ लेलिया क्यूंकि वो नहीं जानते थे कि उसका 'प्राइवेट पार्ट' कैसा दिखता है. इस पूरेक्रम में काफ़ी ऐसी बातें होती हैं जो अलग ही लेवल का ह्यूमर लेकर आती हैं. फ़िल्मबहुत ही हाई क्लास है. इसे लिखने वाले वही हैं जिन्होंने डेल्ही-बेली जैसीमहाअश्लील और बढ़िया फ़िल्म लिखी थी - अक्षत वर्मा. इन्होंने ही इसे डायरेक्ट भी कियाहै. डेल्ही-बेली के विपरीत फ़िल्म की सिचुएशन काफ़ी इंग्लिश पिक्चर है. इससे छोटे शहरवाली जनता कतई कनेक्ट नहीं करेगी. हिंदी फ़िल्मों के हिसाब से ये अच्छा एक्सपेरिमेंटज़रूर है लेकिन इससे बहुत ज़्यादा रिटर्न की कोई गुंजाइश नहीं है. ज़मीनी चीज़ों,किरदारों की कमी और अंग्रेजी के भारी मात्रा में इस्तेमाल के चलते ज़्यादातर जगहोंपर इसे कूड़ा कहकर नकार दिया जाएगा. हां, दीपक डोबरियाल और विजय राज़ के सीक्वेंसकाफ़ी मज़ेदार हैं. ये दोनों डायलॉग धकेलने में माहिर हैं और दोनों को एक साथ बातेंकरते हुए इधर उधर फैल रही फ़िल्म में कुछ मज़ेदार पल मिलते हैं. अक्षत वर्मा को इसीलाइन पर एक फ़िल्म इन दोनों के साथ बनानी चाहिए. इसके साथ ही एक बार फिर ये स्थापितहो गया कि हिंदी गालियों के साथ विजय राज़ के सिवा और कोई न्याय नहीं कर सकता. आपअगर किसी के मुंह से गाली सुनना चाहेंगे तो वो विजय राज़ हैं और कोई भी नहीं. फ़िल्मथोड़ी ढीली है. काफ़ी शहरी है, उतनी कनेक्टिंग नहीं है. अच्छी बात ये है कि उन चीज़ोंको खंगाला गया है जहां अभी तक किसी ने हाथ नहीं डाला था. इस लिहाज़ से ये एक अच्छीशुरुआत है. संस्कारी परिवार के साथ देखना तो दूर उनके सामने इसका नाम भी न लें.दोस्तों के साथ जाना चाहें तो जा सकते हैं. वो भी तब जब आप मुक्काबाज़ पहले ही देखचुके हैं और करने के लिए उर कोई काम नहीं है. बाकी सब ठीक है. आशा है वहां भी सबअच्छा होगा.-------------------------------------------------------------------------------- ये भी पढ़ें:फ़िल्म रिव्यू - मुक्काबाज़ : देशप्रेम में लोटती अनुराग कश्यप की फ़िल्मबॉलीवुड की सबसे मशहूर मां के बच्चे किस बात पर झगड़ रहे हैं?सपना चौधरी बदल गई हैंउस रात की पूरी कहानी, जब शास्त्री की मौत हुई