काबिल. बचपन से ये शब्द सुना है. इस काबिल हो, इस काबिल नहीं हो. अब इस नाम कीफिल्म आई है. ऋतिक रोशन हैं. साथ में यामी गौतम, रोहित रॉय, रोनित रॉय.ऋतिक रोशन यानी रोहन. रोहन यानी अकेले रहने वाला एक लड़का जो देख नहीं सकता. वॉकिंगस्टिक के भरोसे चलता है. लेकिन बाकी सेन्स बहुत तेज़ काम करते हैं. जो देख नहीं सकतेउनके साथ ऐसा होता ही है. उनके बाकी सेंसेज़ और भी शार्प हो जाते हैं. यामी गौतमयानी सुप्रिया और रोहन मिलते हैं. साथ में डांस करते हैं. प्यार होता है और शादी होजाती है. साथ में रहने लगते हैं. इन दोनों के जीवन में कुछ ऐसी बातें होती हैं किसुप्रिया की मौत हो जाती है. पुलिस बहुत साथ नहीं देती है. रोहन खुद को बांध के रखनहीं सकता. इसलिए बदला लेने निकल पड़ता है. इतना तो ट्रेलर देख के ही समझ में आ गयाथा कि बदला रोहित और रोनित रॉय से लिया जा रहा था. रोहन को पुलिस से भी बैर है. उनपर से भरोसा उठ चुका है. अब बदला लेने को घूम रहा है. इसी प्यार, प्यार खोने से आएअंधेरे और उससे उपजी बदले की कहानी का नाम है 'काबिल'.फिल्म शुरू होती है तो 30 मिनट में रोहन और सुप्रिया एक ब्लाइंड डेट पर मिलते हैं.कई बार और मिलते हैं. साथ साथ डांस करते हैं. फिर प्यार करने लग जाते हैं. फिर एकगाना होता है. उसी गाने में अंगूठी पहनाई जाती है. शादी हो जाती है. सब कुछ फिल्मशुरू होने के 30 मिनट के अन्दर. सब कुछ बहुत जल्दी में चलता हुआ दिखाई देता है. ऐसालगता है जैसे कोई ऐड चल रहा हो और बगल में बैठा दोस्त ऐड खत्म होने से पहले सारीकहानी बता देना चाहता है. क्योंकि उसके बाद सीरियल शुरू होगा. और होता भी यही है.जल्दबाज़ी इसलिए की गई क्योंकि मुद्दे पर आना था. मुद्दा था बदले का. एक एेसे इंसानके बदले का जो देख नहीं सकता. उसकी न देख सकने वाली बीवी को मार दिया जाता है. औरवो उसी का बदला चाहता है.--------------------------------------------------------------------------------फ़िल्म में जितनी भी मार-पीट दिखाई गयी है, फॉर-अ-चेंज, बनावटी नहीं लगती. लगता हीनहीं कोई बॉलीवुड की फिल्म चल रही है. और इसे ऋतिक की एक्टिंग और भी असली व पचानेलायक बना देती है. जिस अतिश्योक्ति के साथ फाइट सीक्वेन्स दिखाया गया है, वो फिल्मको और भी अच्छा बना देता है. क्योंकि एक्स्ट्रा एफ़र्ट के साथ और बहुत डिज़ाइनरस्टंट, फिल्मों पर से आपका विश्वास उठा देते हैं और आपको बोरियत महसूस होने लगतीहै. लेकिन वैसा इस फ़िल्म में कतई नहीं है. --------------------------------------------------------------------------------बस रंज होता है तो इस बात का कि एक लड़का जो घर में अकेला है, देख नहीं सकता है,कैसा भी नाश्ता बनाकर खाता है, टटोल-टटोल कर अपने ही घर में जीता है, वो हमेशाटिप-टॉप क्यों और कैसे बना रहता है? फिल्म के बाकी हिस्सों की तरह लॉजिक यहां कामनहीं करता. उसके कपड़े एकदम चाक-चौबस्त रहते हैं. बाल इतने करीने से बने हुए कि मेरामन भी वैसे ही बाल रखने का करने लगा. पूरे वक़्त साफ़ चेहरा. साफ़ घर. एकदम सजा हुआ.कैसे? कपड़े तो चलो इस्त्री वाला कर जाता होगा लेकिन बाकी सब कैसे? वही हाल कन्या काभी. हालांकि वो अकेले रहती थी या नहीं, ये नहीं मालूम चला. फ़िल्म में जितनी भी एक्टिंग है, सॉलिड है. ऋतिक रोशन ने एक न देख पाने वाले कीखतरनाक एक्टिंग की है. और इस खतरनाक 'विशेषण' को बुरे अर्थों में न लिया जाए.ट्रेलर में देखकर आपको भले ही विश्वास करने लायक न लग रहा हो लेकिन फ़िल्म में मामलापीठ ठोकने लायक है.ऋतिक ने इससे पहले भी एक विशेष शरीर वाले की एक्टिंग की है. फिल्म थी संजय भंसालीकी 'गुज़ारिश'. उसमें भी वो शानदार थे. इसमें भी हैं. यामी गौतम भी. उनकी ज़रूरत ऋतिकको एक मिमिक्री आर्टिस्ट से एक डेड-मैन-वॉकिंग में बदलने के लिए थी.लड़की का चक्कर बाबू भइय्या. लड़की का चक्कर!खैर, बात मजाक की नहीं है. फ़िल्म में मौके पर बहुत दर्दनाक मामला था. पैरों कीअंगुलियां आपस में बिंधने लगती हैं. आप कुर्सी के किनारे पहुंच जाएंगे.फ़िल्म में जो बदले की भावना है उसे बहुत अच्छे से दिखाया है. पिछली बार ऐसा'बदलापुर' में दिखा था. ऋतिक रोशन ने खूब पॉइंट कमाए हैं.एक और खंबा है जिस पर फिल्म खड़ी होती है - वो हैं रोनित रॉय. माधवराव शेल्लर.बम्बइया कॉर्पोरेटर. मराठी मानुस. आधी बात मराठी में करता है. उसका छिछोरा छोटा भाईअमित यानी रोहित रॉय. रोनित को हमारी फ़िल्में भुना नहीं पा रही हैं. वो गुस्से सेभरे इंसानों का रोल करते करते चुक जाएंगे. लेकिन मांग ये हो कि यही रोल सही, उन्हेंऔर रोल दिया जाए. उनकी स्क्रीन पर मौजूदगी पसंद आती है. उनके किरदार से नफरत होनेलगती है. आप उसके नाश की कामना करने लगते हैं. मुझे नहीं लगता अच्छी एक्टिंग की कोईऔर पहचान हो सकती है. एक सीक्वेंस में अपने मरे भाई की फ़ोटो के सामने बैठे रोनितरॉय शराब में डूबी हुई, आंसुओं में तैरती हुई लाल आंखें लेकर गुस्से में खड़े होतेहैं, टेबल पर पूरे दम से अपना फैलाया हुआ पंजा दो बार पीटते हैं और मराठी में कहतेहैं कि "बाद में नहीं. अभी." उस एक सीक्वेंस के लिए तालियां पीटी जानी चाहिए.रोनित रॉय और गिरीश कुलकर्णीइसके अलावा एक नाम और. गिरीश कुलकर्णी. ये वही हैं जो पुलिसवाले बनकर फिल्म 'अग्ली'में राहुल भट्ट के किरदार से पूछते हैं "अमिताभ बच्चन को घर में क्या बुलातेहैं?" बेहतरीन एक्टिंग. बेहतरीन से कम कुछ भी नहीं. हिंदी फिल्मों में इनके छोटे हीरोल दिखे हैं. लेकिन वो काम ऐसा है कि उसमें एक पैसे की गुंजाइश नहीं बचती दिखतीहै.बॉलीवुड को इस फिल्म से सबक लेना चाहिए और याद कर लेना चाहिए कि स्कॉर्पियो को दसमीटर हवा में उड़ा देना ही एक्शन नहीं कहलाता है. ब्रूस विलिस के फिल्म 'रेड' मेंगाड़ी से उतरने वाले सीक्वेंस का सस्ता रिप-ऑफ ही एक्शन नहीं हो जाता. एक्शन वो भीहो सकता है जहां एक नेत्रहीन बत्तियां बुझा कर, ज़मीन पर चिप्स फ़ैला कर, अपनी बीवीके कातिल को तब तक पीटे जब तक उसके शरीर में हरकतें बंद न हो जाएं. उस वक़्त, उसपिटाई में आप भी शामिल होते हैं. उस वक़्त आप किसी तरह से खुद को रोक रहे होते हैंथियेटर में चीखने से. उस वक्त आप ही रोहन होते हैं. और आप ही के मुक्के अमित केदोस्त वसीम की छाती को चीर देना चाहते हैं. डायरेक्टर संजय गुप्ता ने इसी जगह परसारे पैसे लूट लिए हैं. उन्होंने फ़िल्म में रोहन या ऋतिक को हटाकर आप को भर दियाहै. पिक्चर हमारी तरफ से ओके है. बाकी, आपकी मर्ज़ी.इतिश्री.https://www.youtube.com/watch?v=nubDFeiUAsI--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:फिल्म रिव्यू: रईस