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  • Film Review: Fukrey Returns starring, Pulkit Samrat, Pankaj Tripathi, Richa Cahddha, Varun Sharma, Manjot SIngh directed by Mrighdeep Singh Lamba

फ़िल्म रिव्यू : फ़ुकरे रिटर्न्स

आ गई भोली पंजाबन.

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8 दिसंबर 2017 (अपडेटेड: 8 दिसंबर 2017, 08:36 AM IST)
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"मम्मियों को कुछ नहीं मालूम अपनी दोस्ती के बारे में. वो अपनी जगह सही हैं और हम अपनी जगह."

वो साला बचपन ही नहीं जिसमें घरवालों और बाकी दुनिया ने आपको फुकरा न कहा हो. आप पंजाबी नहीं होंगे तो कुछ और ही कहा होगा लेकिन उसके मायने यही होंगे. ये कहानी ऐसे ही फुकरों की है. जिन्होंने इसकी पहली किस्त देखी है उन्हें तो ये बात बाकायदे मालूम ही होगी. भोली पंजाबन जेल से बाहर निकल जाती है और चूचा, हन्नी, ज़फ़र और लाली के साथ साथ पंडित जी की फिर से रेल बनाने को तैयार है. साथ में मंत्री जी भी हैं जो भोली का तेल निकालने को आतुर हैं. नेता जी की आंखें पैसे पे लगी हुई है. इसी टोली का सारा खेला है फुकरे रिटर्न्स में.

फ़िल्म में कास्ट वही है. एकदम वही. बस नेता जी नए हैं. राजीव गुप्ता को इतने बड़े रोल में देखके बढ़िया लगता है. एकदम फबते हैं. उन्हें और काम मिलना चाहिए. एकदम दबा के. ये उन लोगों में हैं जिन्हें बढ़िया से खंगाला नहीं गया है. बाकी, पुलकित सम्राट, वरुन शर्मा, अली फ़ज़ल, मनजोत सिंह, प्रिय आनंद, विशाखा सिंह, पंकज त्रिपाठी और ऋचा चड्ढा तो हैय्ये हैं.


चार फ़ुकरे
चार फ़ुकरे

फ़िल्म बनाने वालों को ये समझ में आ गया था कि भोली पंजाबन हिट हो चुकी है इसलिए इस बार उन्हें स्क्रीन पर भरपूर टाइम मिला है. चूचा मज़े देता रहता है. लाली की ज़िन्दगी अभी भी 'रंगीनियत' से कोसों दूर है. हनी ने होने वाले ससुर से भी बात कर ली है. ज़फ़र नई जगह सेता हो जाना चाहता है और पंडित जी कॉलेज के गेट पर अभी भी मौजूद हैं. लेकिन फिर भी फ़िल्म में वो रस नहीं मिल पाता है जो पहली किस्त में था. अक्सर पहली फ़िल्म की कामयाबी पर दूसरी बनाने में यही होता ही है. ये फ़िल्म अगर पहली किस्त होती तो इससे बेहतर मज़ा देती.

फ़िल्म में कुछ चीज़ें हैं जो बेवजह होती रहती हैं. बस यूं ही. शेर के बच्चे को चूचा यूं ही सहलाता रहता है. उसकी कोई वजह नहीं है. वैसा न भी होता तो भी चलता. लेकिन क्या है कि ये थोड़ा अजीब लगता है. बंद हो चुके चिड़ियाघर में ये 5 ही घुस पाते हैं. और कोई नहीं आता. कभी भी नहीं. और ये जब मर्ज़ी आ-जा  रहे हैं. कुछ क्लियर नहीं होता.

फ़िल्म में पिछवाड़े पर सांप के काटने से, झाड़ी में दो लड़कों के टट्टी करने से, हनी के आवाज़ करते हुए पेशाब करने से हंसी क्रियेट करने की कोशिश की गई है.




फ़िल्म में एक कैरेक्टर जो अपने चेहरे, टाइमिंग से हंसी लाता है - पंडित जी. पंडित जी यानी पंकज त्रिपाठी. न्यूटन के वक्त सोच में डूब गया था कि कैसे वासेपुर का सुल्तान जो भैंसा और आदमी एक ही जैसा काटता था, आत्मा सिंह बन जाता है. अब यही कहानी आगे बढ़ती है और आत्मा सिंह पंडित जी बन गया है. क्या कमाल का वेरिएशन है. ये आदमी सिर्फ अपनी टूटी अंग्रेजी और फूटी किस्मत के दम पर हंसाता है. जनता इस ऐक्टिंग की कायल होने वाली है. एक सीक्वेंस में ऋचा चड्ढा और पंकज, दोनों की बातचीत दिखाई गई है. वहां इन दोनों ने खूब नम्बर कमाए हैं.



पंडित जी.
पंडित जी.

फ़िल्म का ऐसा है कि देख ली जाए तो कुछ बुरा नहीं होगा. लेकिन पिछली फुकरे का भार इसपर न लादा जाए तो ही गनीमत रहेगी. इसमें वो दिल्ली नहीं है जो पहली फ़िल्म की आधी जान थी. इसमें वो प्यार नहीं है जिसने अम्बरसरिया को हर दूसरे फ़ोन की कॉलरट्यून बना दिया था. इसमें ह्यूमर है मगर उसे स्क्रीन पर लाने की वो ईमानदारी गायब है. और इसकी कमी खलती है.




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