फ़िल्म रिव्यू : फैन्टास्टिक बीस्टस देखकर जादूगर ओपी शर्मा याद आता है
हैरी पॉटर लिखने वाली जेके राउलिंग की नयी कहानी.
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फोटो - thelallantop
गांव में एक बार एक जादूगर आया था. ओपी शर्मा. खूब पोस्टर लगे थे. बाकायदे रिक्शे पर माइक लेकर चलता हुआ चार लड़कों का ग्रुप दिन भर घूमा करता था. जादू देखा. मज़ा आया. बहुत मज़ा आया. ऐसा कुछ भी पहले नहीं देखा था. दिन भर उसी की बातें करते थे. स्कूल में, स्कूल के बाद. सब जगह. लेकिन घर में बड़े लोग खुश नहीं थे. कहते थे इनके बाप अच्छे जादूगर थे. ओपी शर्मा. फिर मालूम चला कि ये जो आये थे ये ओपी शर्मा जूनियर थे. बाप बेटे का नाम सेम था. जूनियर-सीनियर वाला सीन था. खैर, घरवालों का कहना था कि ओ पी शर्मा बढ़िया जादू दिखाते थे. एकदम ठस. यहां नौटंकी ज़्यादा थी. दिखावा बहुत था. पहले नहीं होता था. ओपी शर्मा जूनियर ने एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश में काम तमाम कर दिया. घर के बुजुर्गों को मालूम नहीं था कि ओपी शर्मा जूनियर अभी अपनी ज़मीन तैयार कर रहा था. वो बताना चाहता था कि वो ये भी कर सकता है और वो भी.
यही हाल है फ़िल्म फैंटास्टिक बीस्टस एंड व्हेयर टु फाइंड देम का. जिन्होंने हैरी पॉटर को तन्मयता से देखा है और देखा ही नहीं, सिर्फ जिया है, उन्हें फ़िल्म वैसी लगेगी जैसे हेरा फेरी के बाद फ़िर हेरा फेरी आई थी. या गोलमाल के बाद गोलमाल रिटर्न्स. या सिंघम के बाद सिंघम रिटर्न्स. माने रोहित शेट्टी की सारी सीक्वेल फिल्मों की बात हो रही है. खैर, फ़िल्म बनी है जे के राउलिंग के नॉवेल पर. वही जेके राउलिंग जिन्होंने दुनिया को हैरी पॉटर दिया. और आप सभी को ये अहसास दिलाया कि आप कुछ नहीं बस औसत दर्जे के मगलू हैं. मगलू यानी वो लोग जो जादू नहीं कर पाते. हॉग्वर्ट्स में पढ़ नहीं पाते. जहां तक मेरी बात है, मैं जादूगर हूं. हॉग्वर्ट्स में पढ़ता हूं. पार्ट टाइम यहां काम करता हूं. जादू दिखाने को तो दिखा देता मगर हमारे सामने ये शर्त रक्खी जाती है और ये हमारे बीच सबसे बड़ा नियम भी है कि हम जादूगर हॉग्वर्ट्स के बाहर जादू दिखा नहीं सकते. कभी हमारे स्कूल आइयेगा तो दिखाऊंगा. तब तक मानना है तो मानो, नहीं तो मोर उड़ाओ.
राउलिंग ने हैरी पॉटर वाली जादू की दुनिया को पूरी तरह से कंटिन्यू रक्खा है. और यही हाल फ़िल्म का भी है. बस इस बार जादू न्यू यॉर्क में हो रहा है. हालांकि अच्छी बात ये है कि ओपी शर्मा जूनियर की ही तरह इस बार फ़िल्म में होने वाले जादू को डार्क रक्खा गया है. इस बात की फ़िक्र नहीं की गयी है कि फ़िल्म धीमी हो रही है या क्या मामला है. बस दिक्कत तब होती है जब फिल्म का ध्यान फ़िल्म के लीड न्यूट के साथ आये अजीब-ओ-गरीब जानवरों से हटकर एक काली ताकत पर चला जाता है. उस वक़्त ऐसा लगता है कि बहुत कुछ एक ही में समेटने की कोशिश की गयी है. और यहीं ओपी शर्मा और उनके सुपुत्र ओपी शर्मा जूनियर का ध्यान आता है. अच्छी बात ये है कि फ़िल्म को समेट लिया गया. सफलतापूर्वक. वरना हमने कितने ही अच्छे प्लॉट्स को उजड़ते देखा है. जैसे खोसला साहब के प्लाट को खुराना ने कब्जिया लिया था. वैसा ही कुछ. हिन्दुस्तानी अजूबा बाहुबली का उदाहरण संलग्न है.
न्यूट बने एडी रेडमेन
फिल्म में काम जोरदार किया गया है. ऐक्टर ऐसे हैं कि जिन्हें आप जानते पहचानते नहीं होंगे. लेकिन यही तो हाल हैरी पॉटर की पहली फिल्म में भी था. और फिर डेनियल रैडक्लिफ़, एमा वाटसन, एलेन रिकमैन हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए. यही हाल हो सकता है एडी रेडमेन (न्यूट) के साथ. बाकी, ओपी शर्मा जूनियर ज़्यादा कुछ कर नहीं पाए. जब तक वो अपनी मार्केट बनाते, इन्टरनेट - ऑरकुट, यूट्यूब, फेसबुक, मोबाइल फ़ोन की आंधी आई और उनका तम्बू गड़ने से पहले ही उखड़ गया. राउलिंग की मार्केट अभी भी सजी है. सधी है. उनके पास अभी भी स्कोप लग रहा है. लोग तैयार भी हैं. बशर्ते, कुछ नया मिले. जो लग भी रहा है.
हैरी पॉटर सीरीज़ की अंतिम चार फ़िल्में बनाने वाले डायरेक्टर डेविड येट्स इस बार भी सारा जोर लगाते हुए दिखे हैं. कसर कोई नहीं छोड़ी है. थ्री-डी में फ़िल्म कई जगहों पर चौंका देती है. अच्छी बात है. डॉक्टर स्ट्रेंज की भव्य थ्री-डी एक रिफरेन्स पॉइंट बन चुका है. लेकिन इसमें भी जोर पूरा है. स्कोप के हिसाब से काम हुआ है. बाकी, घर के बड़ों का क्या है, ओपी शर्मा की माला जपें. :P
डेविड येट्स
फैंटास्टिक बीस्टस एंड व्हेयर टु फाइंड देम देखने जाइए. मज़ा आएगा. हैरी पॉटर दिमाग में तो रखिये मगर उसे हावी मत होने दीजिये. नए के लिए जाइए. ये समझिये कि उसी दुनिया की एक नयी कहानी मिलेगी. नए कैरेक्टर्स मिलेंगे. जो बीत गया उसे बस नॉस्टेल्जिया में जगह दीजिये. दोस्तों के साथ उसकी बातें करिए.
https://www.youtube.com/watch?v=Vso5o11LuGU
यही हाल है फ़िल्म फैंटास्टिक बीस्टस एंड व्हेयर टु फाइंड देम का. जिन्होंने हैरी पॉटर को तन्मयता से देखा है और देखा ही नहीं, सिर्फ जिया है, उन्हें फ़िल्म वैसी लगेगी जैसे हेरा फेरी के बाद फ़िर हेरा फेरी आई थी. या गोलमाल के बाद गोलमाल रिटर्न्स. या सिंघम के बाद सिंघम रिटर्न्स. माने रोहित शेट्टी की सारी सीक्वेल फिल्मों की बात हो रही है. खैर, फ़िल्म बनी है जे के राउलिंग के नॉवेल पर. वही जेके राउलिंग जिन्होंने दुनिया को हैरी पॉटर दिया. और आप सभी को ये अहसास दिलाया कि आप कुछ नहीं बस औसत दर्जे के मगलू हैं. मगलू यानी वो लोग जो जादू नहीं कर पाते. हॉग्वर्ट्स में पढ़ नहीं पाते. जहां तक मेरी बात है, मैं जादूगर हूं. हॉग्वर्ट्स में पढ़ता हूं. पार्ट टाइम यहां काम करता हूं. जादू दिखाने को तो दिखा देता मगर हमारे सामने ये शर्त रक्खी जाती है और ये हमारे बीच सबसे बड़ा नियम भी है कि हम जादूगर हॉग्वर्ट्स के बाहर जादू दिखा नहीं सकते. कभी हमारे स्कूल आइयेगा तो दिखाऊंगा. तब तक मानना है तो मानो, नहीं तो मोर उड़ाओ.
राउलिंग ने हैरी पॉटर वाली जादू की दुनिया को पूरी तरह से कंटिन्यू रक्खा है. और यही हाल फ़िल्म का भी है. बस इस बार जादू न्यू यॉर्क में हो रहा है. हालांकि अच्छी बात ये है कि ओपी शर्मा जूनियर की ही तरह इस बार फ़िल्म में होने वाले जादू को डार्क रक्खा गया है. इस बात की फ़िक्र नहीं की गयी है कि फ़िल्म धीमी हो रही है या क्या मामला है. बस दिक्कत तब होती है जब फिल्म का ध्यान फ़िल्म के लीड न्यूट के साथ आये अजीब-ओ-गरीब जानवरों से हटकर एक काली ताकत पर चला जाता है. उस वक़्त ऐसा लगता है कि बहुत कुछ एक ही में समेटने की कोशिश की गयी है. और यहीं ओपी शर्मा और उनके सुपुत्र ओपी शर्मा जूनियर का ध्यान आता है. अच्छी बात ये है कि फ़िल्म को समेट लिया गया. सफलतापूर्वक. वरना हमने कितने ही अच्छे प्लॉट्स को उजड़ते देखा है. जैसे खोसला साहब के प्लाट को खुराना ने कब्जिया लिया था. वैसा ही कुछ. हिन्दुस्तानी अजूबा बाहुबली का उदाहरण संलग्न है.
न्यूट बने एडी रेडमेन
फिल्म में काम जोरदार किया गया है. ऐक्टर ऐसे हैं कि जिन्हें आप जानते पहचानते नहीं होंगे. लेकिन यही तो हाल हैरी पॉटर की पहली फिल्म में भी था. और फिर डेनियल रैडक्लिफ़, एमा वाटसन, एलेन रिकमैन हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा बन गए. यही हाल हो सकता है एडी रेडमेन (न्यूट) के साथ. बाकी, ओपी शर्मा जूनियर ज़्यादा कुछ कर नहीं पाए. जब तक वो अपनी मार्केट बनाते, इन्टरनेट - ऑरकुट, यूट्यूब, फेसबुक, मोबाइल फ़ोन की आंधी आई और उनका तम्बू गड़ने से पहले ही उखड़ गया. राउलिंग की मार्केट अभी भी सजी है. सधी है. उनके पास अभी भी स्कोप लग रहा है. लोग तैयार भी हैं. बशर्ते, कुछ नया मिले. जो लग भी रहा है.
हैरी पॉटर सीरीज़ की अंतिम चार फ़िल्में बनाने वाले डायरेक्टर डेविड येट्स इस बार भी सारा जोर लगाते हुए दिखे हैं. कसर कोई नहीं छोड़ी है. थ्री-डी में फ़िल्म कई जगहों पर चौंका देती है. अच्छी बात है. डॉक्टर स्ट्रेंज की भव्य थ्री-डी एक रिफरेन्स पॉइंट बन चुका है. लेकिन इसमें भी जोर पूरा है. स्कोप के हिसाब से काम हुआ है. बाकी, घर के बड़ों का क्या है, ओपी शर्मा की माला जपें. :P
डेविड येट्स
फैंटास्टिक बीस्टस एंड व्हेयर टु फाइंड देम देखने जाइए. मज़ा आएगा. हैरी पॉटर दिमाग में तो रखिये मगर उसे हावी मत होने दीजिये. नए के लिए जाइए. ये समझिये कि उसी दुनिया की एक नयी कहानी मिलेगी. नए कैरेक्टर्स मिलेंगे. जो बीत गया उसे बस नॉस्टेल्जिया में जगह दीजिये. दोस्तों के साथ उसकी बातें करिए.
https://www.youtube.com/watch?v=Vso5o11LuGU

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