फ़िल्म रिव्यू : भूमि
संजय दत्त की रिहाई के बाद आई उनकी पहली फ़िल्म.

यही छल संजय दत्त की फ़िल्म भूमि में भी हुआ. ट्रेलर देखा तो लगा कि पिंक 2.0 आ रही है. एक लड़की जिसका रेप हो जाता है. संजय दत्त उसका बाप है. वो अदालत जाता है. अदालत में उस लड़की को कैरेक्टर-लेस लड़की साबित करने की कोशिश की जाती है. बाप अदालत में रोता-गिड़गिड़ाता है. थोड़ी बहुत मार-पीट भी दिखाई गई थी. एकदम पिंक वाला फ़ील आ रहा था. लग रहा था कि एक और स्त्री-विमर्श टाइप फ़िल्म आएगी.
फ़िल्म असल में छीछालेदर है. जैसी छीछालेदर मैं अक्सर किचन में कर देता हूं. खाना बनाना पसंद है लेकिन सिर्फ एक बर्नर पर. गैस के दो बर्नर पर अगर दो अलग अलग चीज़ें एक ही साथ चढ़ी हैं तो अपन सब गोबर कर देते हैं. वही हाल इस फ़िल्म में हुआ है. बहुत सारे डिस्कोर्स को एक साथ 2 घंटे में निपटाने की कोशिश की गई है. चाहा ये गया कि वो जनता जो 'नो मीन्स नो' को आत्मसात करने में वक़्त लगा रही थी वो इतनी सारी चीज़ें एक साथ देखे और समझे.
आई तो सब फुस्स हो गया. संजय दत्त यानी अरुण की आगरा में एक बड़ी फ़ेमस जूते की दुकान है. सब कुछ बढ़िया चल रहा है. उसकी बेटी है भूमि. भूमि यानी अदिति राव हैदरी. भूमि अपने बाप की शराब पीने आदत से परेशान है. उसके बाप का एक दोस्त उसकी शराब पीने की आदत में उसका साथी है. शेखर सुमन. शेखर सुमन दोबारा से फ़िल्मों में आने की कोशिश कर रहे हैं. भूमि की शादी तय हो चुकी है. शादी के दो दिन पहले उससे एकतरफ़ा प्यार करने वाला लड़का शहर के गुंडों के साथ मिलकर उसका रेप कर देता है. रेप बेहोशी की हालत में हुआ इसलिए लड़की को मालूम नहीं था कि कौन-कौन शामिल था. शादी से ऐन पहले लड़की अपने होने वाले पति को सब कुछ बता देती है. बारात बैरंग लौट जाती है. बाप थाना-पुलिस करता है. मुकदमा चलता है. लड़की को कैरेक्टर-लेस घोषित करने की कवायद शुरू हो जाती है. कानून से भरोसा उठ जाता है और फिर बाप-बेटी मिलकर दानवों का नाश करने निकल पड़ते हैं.
भूमि असल में संजय दत्त को रिवाइव करने के लिए बनायी मालूम देती है. इसका उस डिस्कशन से कोई वास्ता ही नहीं है जिसे पिंक ने शुरू किया था. पिंक अगर एफ़िल टॉवर है तो भूमि मोबाइल टॉवर. बस नवरात्र के दूसरे दिन इसे रिलीज़ कर दिया गया और अंत में जब संजय दत्त रेपिस्ट को मारता है तो पीछे "जय माता दी! जय माता दी!" का जाप चल रहा होता है.
भूमि में कुछ एक चीज़ें हैं जो असल में मारक हैं. मसलन लड़की का देर रात तक बाहर निकले रहना कोई बुरी बात नहीं है और उसे कोई आई लव यू बोले तो वो उसे मना कर सकती है. बस. अब सोच रहा हूं तो यही याद आ रहा है. गजब! ससुरी फ़िल्म में तो कोई डिस्कोर्स ही नहीं है. कोई डिस्कशन नहीं. बस पिक्चर बनी, चली और खतम हो गई. संजय दत्त ने लड़ाई की. संजय दत्त हीरो बन गए. संजय दत्त ने आखिरी में गाना गया. खतम. संजय दत्त! संजय दत्त!
संजय दत्त एक बाप के रोल में सही लग रहे हैं. बूढ़े हो ही गए हैं. दाढ़ी भी सफ़ेद हो गई है. एकदम फिट हैं. लेकिन ये बाप बहुत फ़िल्मी है. चाट है. बाप-बेटी के बीच कुछ डायलॉग्स ऐसे हैं कि बेचैनी होने लगे. ज़ोर से सांस लेने के लिए बड़ा मुंह खोलना पड़े. शेखर सुमन शराबी की ऐक्टिंग करते वक़्त फ़नी हो जाते हैं. कुछ ज़्यादा ही. अपचनीय टाइप्स. विलेन के रोल में शरद केलकर हैं. टीवी पर खूब दिखे हैं. अब फ़िल्म में आये हैं. लेकिन संजय दत्त के सामने बचकाने लगते हैं. इसके साथ ही हिंदी फिल्में न जाने कब विलेन से 'म्हारे' 'थारे' 'छोरी' 'मड्डर' जैसी बोली बोलवाना बंद करेंगी. फ़िल्में इस एक्सेंट से अभिशप्त हो गई हैं. इसका कोई इलाज ढूंढा जाए.

टीवी पर खूब दिखने वाले शरद केलकर
कोई कनपटी पे बन्दूक तान दे और कहे कि भूमि देखो तो उससे भिड़ जाना. उसको उठा के पटक देना. उसका कलेजा बाहर निकालने की कोशिश करना. न हो पाए तो गोली खा लेना. लेकिन भूमि मत देखना. कहीं से कुछ भी शुरू हो जाता है. कहीं से कुछ भी खतम हो जाता है. ये बात सच है कि आई लव यू को नकारने वाली लड़कियों या कैरेक्टर-लेस लड़कियों (अगर ऐसा कुछ होता भी है तो) का रेप नहीं कर दिया जाना चाहिए. लेकिन ये सब बताने के लिए ऐसी फ़िल्म भी तो नहीं बनानी चाहिए. ये फ़िल्म वो पान है जिसने चूना बहुत ज़्यादा लगा दिया है.
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