ये बात हम अपने प्लेटफॉर्म पर कई बार डिस्कस कर चुके हैं कि कंटेंट ड्रिवन फ़िल्मेंदेने में मराठी सिनेमा काफी आगे हैं. बात में अपडेट ये कि मराठी सिनेमा अपनी यहीखासियत लेकर अब वेब स्ट्रीमिंग की दुनिया में पहुंच गया है. फ़रवरी में 'फायरब्रांड'नाम की पहली नेटफ्लिक्स ओरिजिनल फिल्म आई थी. मार्च में एक और आई है, नाम है '15ऑगस्ट'.घटनाप्रधान फिल्मवो फ़िल्में आपकी उत्सुकता को होल्ड किए रहती हैं, जिसकी कहानी किसी एक अजीब घटना केइर्द-गिर्द हो. '15 ऑगस्ट' इसी तरह की फिल्म है. कहानी का केंद्र है वो हादसा,जिसमें एक बच्चे का हाथ एक गड्ढे में फंसा हुआ है. लेकिन.... सिर्फ वो बच्चा हीनहीं फंसा हुआ. और भी कई लोग फंसे हुए हैं. जैसे ज़ुई और राजू नाम का प्रेमी जोड़ा,जो भाग जाएं कि नहीं इस उलझन में फंसा है. उनके पेरेंट्स, जो टिपिकल मिडल क्लासमाइंडसेट में फंसे हैं. और गांधी चॉल के लोग जो खुद के जीवन से ज़्यादा औरों की लाइफमें झांकने की आदत में फंसे पड़े हैं.प्रेमी जोड़ा ज़ुई और राजू.कहानी है एक सुहाने दिन की. यानी 15 अगस्त की. गांधी चाल, जिसका मराठीप्रोनाउन्सेशन चाळ होता है, इंडिपेंडेंस डे सेलिब्रेशन की तैयारी कर रही है. उधरउसी दिन ज़ुई को देखने लड़का आ रहा है. लड़का एनआरआई है. दिक्कत ये है कि ज़ुई राजू सेप्यार करती है. राजू, जिसे सिवाय पेंटिंग के कुछ नहीं आता. अपने बाप समेत सबकी नज़रमें वो नाकारा है. जब पेरेंट्स को मनाने में दोनों कामयाब नहीं होते, तो भाग जानेका इरादा करते हैं. राजू एक अंगूठी भी लाया है.उधर चाळ के प्रांगण में झंडा फहराया जाना है. झंडे का पोल जिस गड्ढे में गाड़ा जानाथा, उसमें राजू की लाई अंगूठी गिर गई. और उसे निकालने के चक्कर में छोटे से बच्चेनिनाद का हाथ फंस गया. अब चाळ में दो प्रमुख गतिविधियां जारी हैं. एक तरफ ज़ुई-राजूका भागने का प्लान शेप ले रहा है, तो दूसरी तरफ तमाम चाळ वाले निनाद का हाथ छुड़ानेकी जद्दोजहद में लगे हुए हैं. ज़ुई को देखने आया लड़का और उसकी फॅमिली भी इस सर्कस काहिस्सा बन जाते हैं. आगे क्या होता है ये नेटफ्लिक्स पर जाकर देख लीजिएगा.मिडल क्लास माइंडसेटजितनी सिंपल कहानी है उतना ही सिंपल ट्रीटमेंट भी है. कोई भी किरदार ओवर ड्रामेटिकनहीं होता. मुंबई की ये चाळ एक तरह से तमाम भारतीय मिडल क्लास का मिनिएचर रूप है.यहां अपने काम से काम रखने का कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है. किसी का कोई निजी जीवननहीं है. इंडिपेंडेंस डे जैसे राष्ट्रीय त्यौहार और लड़की दिखाने के नितांत प्राइवेटफंक्शन में कोई फर्क नहीं है. सबको सब बातों की टेंशन है. '15 ऑगस्ट' भारतीयमध्यमवर्ग की इस आदत की नस बाखूबी पकड़ती है. बिना गंभीरता का चोला ओढ़े ये फिल्मकितने ही मुद्दों पर हंसते-खेलते टिप्पणी कर जाती है. चाहे आज़ादी की सटीक व्याख्याकरनी हो, या 'प्रेम या पैसा' वाले कठिन सवाल का जवाब खोजना हो.मुंबई की चाळ में भारतीय मध्यमवर्ग का सार देखा जा सकता है.कलाकारों की सहजतामराठी फिल्मों की एक खूबी ये भी होती है कि इसमें मामूली से मामूली किरदार निभानेवाले एक्टर भी एक्टिंग के फ्रंट पर मज़बूत होते हैं. सो इसमें भी तमाम आर्टिस्ट्सबढ़िया हैं. प्रेमी युगल के रोल में मृण्मयी देशपांडे और राहुल पेठे अच्छी कास्टिंगहै. राहुल तो लगते भी लुटे-पिटे चित्रकार हैं. बच्चे निनाद की भूमिका आर्यन मेंघजीने पूरी मासूमियत से निभाई है. एनआरआई अमित इनामदार बने आदिनाथ कोठारे इम्प्रेसिवहैं. उनका ठहराव भरा लहजा और आंखों की चमक ढेर प्रभावित करती है. बच्चे का हाथनिकालने के लिए एक के बाद एक सलाहों की बमबारी करने वाले गोखले जी का ज़िक्र अलग सेकरना होगा. वैभव मांगले की कॉमिक टाइमिंग ग़ज़ब की है.इस फिल्म को माधुरी दीक्षित ने प्रड्यूस किया है. 'बकेट लिस्ट' से मराठी सिनेमा मेंएक्टिंग का शुभारंभ करने के बाद अब वो मराठी फिल्म निर्माण में भी कदम रख रही हैं.फिल्म देखकर लगता है कि ठीक ही कर रही हैं. डायरेक्टर स्वप्ननील जयकर का कामसंतोषजनक है. वो फिल्म को कहीं भी बोझिल नहीं होने देते.माधुरी दीक्षित मराठी में एक्टिंग के बाद अब फिल्म निर्माण में भी उतर आई हैं.'15 ऑगस्ट' कोई महान फिल्म भले ही न हो, स्वीट फिल्म ज़रूर है. इसके साथ दो घंटेबिताए जा सकते हैं. तो अगर आपके पास नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन है तो किसी शाम देखडालिए. भाषा का लोड मत लीजिए. हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों सबटाइटल्स हैं.--------------------------------------------------------------------------------वीडियो: