सिर्फ मलेरिया नहीं मच्छर काटें तो आपका ये हाल भी हो सकता है
आज विश्व मलेरिया दिवस है, मसहरी लगाने वालों, तुमको लगता है मच्छर तुमको छोड़ देगा?
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फोटो - thelallantop
25 अप्रैल वर्ल्ड मलेरिया डे होता है. इसका मतलब ये नहीं कि जाकर मच्छरों से खुद को कटाना है और मलेरिया कराना है. इसका मतलब ये है कि मच्छरों से बचिए. ऐसे उपाय कीजिए कि मलेरिया न होने पाए. मच्छर जो काट ले और अपना असर छोड़ जाए तो टेस्ट और ब्लड काउंट के लिए इतने इंजेक्शन लगते हैं कि हाथ, हाथ न होकर हवामहल बन जाता है. और मच्छरों से सिर्फ डेंगू-मलेरिया नहीं बड़े-बड़े रोग होते हैं, जान लीजिए.
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चिकनगुनिया
चिकनगुनिया स्वाहिली शब्द है. जिसका अर्थ है ''जो मुड़ जाता है." चिकनगुनिया के बाद गठिया सरीखे मुड़े शरीर को देखकर लगता भी है कि सही नाम है. चिकनगुनिया मादा एडीस मच्छर के काटने से होता है. इसके लच्छ्न जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, मितली, उल्टियां, ठंड लगना, चकत्ते और जीभ बेस्वाद हो जाना आते हैं. ये फैलता है, भारतीय उपमहाद्वीप में और दक्षिण पूर्व एशिया में भी पाया जाता है.फाइलेरिया
फाइलेरिया या कहें हाथीपांव. वुचेरेरिया वानक्रोफ़टी नाम के परजीवी की बला से फैलता है. इसे फैलाते हैं क्यूलेक्स नाम के मच्छर. पहले तो पता नहीं चलता लेकिन जब हाथ, पैर या स्तन फूलने लग जाएं तो हाथीपांव का पता लगता है. इस रोग में गुर्दों के क्षतिग्रस्त होने का खतरा सबसे ज्यादा होता है. भारत में इसका सबसे ज्यादा असर बिहार, केरल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में होता हैपीला बुखार
यलो फीवर होता है बन्दर-मच्छरों के काटने से. टेक्निकली इन मच्छरों को स्टैगोमिया मच्छर कहा जाता है. पर चूंकि ये ज्यादातर बंदरगाहों के आस-पास पाए जाते है. इसलिए चालू भाषा में बन्दर-मच्छर कहा जाता है. पीत ज्वर के लक्षण कुछ-कुछ पीलिया जैसे होते हैं. इस बीमारी के लक्षणों में बुखार, सिर और पीठ में दर्द, मितली, और उल्टी हैं. इसका असर लीवर पर सबसे ज्यादा पड़ता है. बीमारी बढ़ने पर खून की उल्टियां आने लगती हैं. हमारे यहां ये बीमारी पश्चिम भारत के टापू तक सीमित है.पश्चिम नील नदी वायरस
ये भी मच्छर के काटने से होने वाला रोग है. इसका सबसे पहला असर पश्चिम नील नदी क्षेत्र के देश युगांडा में 1937 में पाया गया था. जाहिर है वहीं से इसका नाम भी पड़ा होगा. आजकल इसका प्रकोप उत्तरी अमेरिका में ज्यादा देखा जाता है.जापानी इन्सेफेलाइटिस
ये दिमागी बुखार का एक प्रकार है. जो सूअरों और मच्छरों से फैलता है. शरीर के संपर्क में आते ही वायरस दिमाग की ओर जाने लगता है. जिसका असर सोचने, समझने, देखने और सुनने की ताकत पर पड़ता है. इसका असर 1 से 14 साल के बच्चों और 65 से ज्यादा की उम्र के सयानों पर ज्यादा होता है. बालकों में इसके लक्षण ज्यादा देर तक रोना, भूख की कमी, बुखार और उल्टी के रूप दिखते हैं. सयानों में इसके लक्षण बुखार, सिरदर्द, गरदन में अकड़, कमजोरी के रूप में दिखते हैं. इससे बचाव और इससे डरना जरुरी इसलिए भी है क्योंकि इससे ग्रसित 50 से 60 प्रतिशत लोगों की मौत हो जाती है. भारत में इसका असर बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और अरुणाचल प्रदेश में ज्यादा दिखता है.ये भी पढ़ें:
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