"हीरो हो तो दूसरों को ख़ुद से नीचा मत समझो, मैंने देखा है, कई एक्टर्स जूते भी..."
राकेश बेदी ने सुनाए इंडस्ट्री में हीरो और बाक़ी एक्टर्स के बीच भेदभाव के किस्से. जब ज़रूरत बताकर मांगने पर भी उन्हें उनके हक़ का पैसा नहीं मिला.

Ranveer Singh स्टारर Dhurandhar ने Rakesh Bedi को वो शोहरत दिलाई है, जिसके हक़दार वो हमेशा से थे. वो जहां भी जा रहे हैं, उनकी तारीफ़ हो रही है. लोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं. उनका ऑटोग्राफ़ ले रहे हैं. बड़े-बड़े एक्टर्स-फिल्ममेकर्स उन्हें फोन करके ‘धुरंधर’ में उनके काम की बढ़ाई कर रहे हैं. मगर एक दौर ऐसा भी रहा है, जब तारीफ़ तो दूर, काम के बदले मिलने वाली फीस के लिए भी तरसना पड़ता था. मेकर्स को बार-बार या दिलाना पड़ता था. ज़ूम को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अपने उस दौर के कुछ किस्से सुनाए. राकेश बेदी ने कहा,
“मुझे याद है, एक बार मैं शूटिंग कर रहा था और मुझे पैसों की बहुत ज़रूरत थी. उसमें एक बड़ा हीरो था, मैं नाम नहीं लूंगा. तो प्रोड्यूसर सेट पर आया तो उसके हाथ में रुपयों से भरा एक पैकेट था. मैंने देख लिया था कि उसमें पैसे हैं. तो मैंने कहा- सर मेरी इंस्टॉलमेंट ड्यू है, मुझे पैसे चाहिए. उन्होंने कहा- यार, अभी तो पैसे नहीं हैं. तो मेरे मुंह से निकल गया कि पैसे तो हैं. वो बोले, हीरो को देने हैं ये. ऐसा कई बार हुआ. और तब मुझे एहसास हुआ, कि यहां ऐसा ही होता है.”
राकेश बेदी ने कहा कि हर चीज़ की एक इक्विटी होती है. और ये लगातार बदलती रहती है. मगर राकेश के अपने कुछ उसूल हैं. और वो उन्हीं पर चलते आए हैं. इस बारे में उन्होंने कहा,
“उस समय मैंने खुद को समझा लिया था कि यही इंडस्ट्री का कायदा है. और इसी के साथ जीना पड़ेगा. लेकिन मैं ये भी कहूंगा, कि अगर मुझे या किसी और एक्टर को टीम के बाक़ी लोगों से ऊपर रखा जा रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि मैं दूसरे वाले को कम समझूं. या फिर नीचे समझूं, या उसके साथ अमानवीय व्यवहार करूं. मैं किसी भी ड्रेसमैन से अपने जूते नहीं पहनवाता. ज़्यादातर एक्टर्स पहनवाते हैं. मुझे लगता है ये अपमानजनक है.”
राकेश बेदी FTII ग्रेजुएट हैं. फिल्मों में उनकी शुरुआत संजीव कुमार स्टारर फिल्म ‘हमारे तुम्हारे’ से हुई. हालांकि उन्हें ‘एहसास’ पहले मिली थी. जो GP सिप्पी ने उन्हें FTII के कॉन्वोकेशन में ही दे दी थी. मगर ‘हमारे तुम्हारे’ पहले रिलीज़ हुई. फिर ‘चश्म-ए-बद्दूर’ और ‘एक दूजे के लिए’ ने उन्हें पहचान दिलाई. उनके टीवी सिटकॉम ‘श्रीमान श्रीमती’ और ‘यस बॉस’ भी सफल रहे. राकेश बेदी मानते हैं कि उनका हर काम, कहीं न कहीं उनकी लाइब्रेरी में स्टोर हो रहा है. और किसी दिन कोई आएगा, और इस लाइब्रेरी के किसी शेल्फ़ से उनका कोई काम निकाल कर देखेगा. वो काम यादगार होना चाहिए. इसलिए वो हर काम पूरी शिद्दत से करते हैं. भले ही वो तीन घंटे की फिल्म में चंद डायलॉग्स ही क्यों न हों. वो मानते हैं कि डायरेक्टर आपसे जितना मांगे, उसे उससे ज्यादा दो. तभी तो आपकी मौजूदगी दर्ज होगी.
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