इस हफ्ते दो मराठी फिल्मों के रीमेक आ रहे हैं. एक तो 'मुळशी पैटर्न' का रीमेक है,जिसे हिंदी में 'अंतिम' नाम से बनाया गया है और जिसमें सलमान ख़ान हैं. दूसरी फिल्महै 'छोरी'. ये भी 2016 में आई एक मराठी फिल्म 'लपाछपी' का रीमेक है. अमेज़न प्राइमवीडियो पर रिलीज़ हुई है. 'अंतिम' का रिव्यू तो हमारे साथी यमन आपको देंगे, हमनेदेखी 'छोरी'. नुसरत भरुचा के कंधों पर टिकी ये हॉरर फिल्म दर्शकों को डराने मेंकामयाब हुई या नहीं, आज इसी पर बात करेंगे. # चिड़िया के घर में अंडे रखने वाले कौवेकी कहानी 'छोरी' की कहानी शहर में शुरू होकर क्विकली गांव पहुंच जाती है. हेमंत औरसाक्षी नाम का एक कपल है. साक्षी प्रेग्नेंट है. हेमंत ने कभी बिज़नेस के लिए लोनलिया था. बिज़नेस डूब गया तो लोन चुका नहीं सका. अब लोन वाले उसकी जान के ग्राहक बनेहुए हैं. पति-पत्नी डिसाइड करते हैं कि कुछ दिन के लिए किसी गुमनाम जगह जाकर रहाजाए. जो जगह चुनी जाती है वो उनके ड्राइवर का गांव है. 300 KM दूर. साक्षी और हेमंतगांव पहुंचते हैं. जहां पहुंचते है वो बड़ी रिमोट जगह है. आसपास कोई बस्ती नहीं.उन्हें रिसीव करती है ड्राइवर की पत्नी भन्नो देवी, जो फेस वैल्यू पर ही गड़बड़ इंसानलगती है. वहां रहते-रहते साक्षी को अचानक से लोरी की आवाज़ सुनाई देने लगती है, कुछबच्चे दिखाई देने लगते हैं. क्या है इन बच्चों की मिस्ट्री? लोरी का क्या राज़ है?क्या कोई साक्षी से कुछ कहना चाहता है? इन सारे सवालों के जवाब जानने के लिए आपकोफिल्म देखनी पड़ेगी.खौफ़ की आग.# एक्टर्स ने नहीं, लोकेशन और कैमरा वर्क ने डराया फिल्म जहां फिल्माई गई है, वोलोकेशन बहुत उम्दा है. इन फैक्ट डराने का ज़्यादातर काम लोकेशन ने ही किया है. अच्छीलोकेशन के साथ बढ़िया जुगलबंदी रही है कैमरा वर्क की. गन्ने के खेत, बीचोबीच स्थितइकलौता मकान, भुतहा कुआं सब ऐसे ढंग से फिल्माए गए हैं कि बड़ी सहजता से डरावनाइफेक्ट पैदा करते हैं. कई बार तो भूतों की चौंकाने वाली एंट्री से ज़्यादा गन्ने केखेत में तेज़-तेज़ घूमता कैमरा डराता है. ड्रोन शॉट्स चिलिंग माहौल बनाते हैं. इसफ्रंट पर फिल्म में अच्छा काम हुआ है. अंशुल चौबे का काम काबिलेतारीफ़ है. फिल्म काBGM भी कुछ हद तक कहानी को कॉम्प्लीमेंट करता दिखाई देता है.हालांकि फिल्म के कुछ सीक्वेंस बड़े अतार्किक लगते हैं. जैसे पहली बार आप किसी अनजानगांव जाओगे, तो कोई पति अपनी प्रेग्नेंट पत्नी को बीच जंगल छोड़कर घर तलाशने तो नहींही जाएगा. ऐसे ही कोई आधी रात को बैग उठाकर नहीं चल देगा, जब उसे पता हो कि शहरबहुत दूर है और आसपास किसी वाहन का अस्तित्व नहीं है. फिल्म में 'औरत ही औरत कीदुश्मन होती है' जैसे महा-क्लीशे डायलॉग्स भी हैं, जो लेखन की कमज़ोरी को और भीउजागर करते हैं.नुसरत.# नुसरत पास, मीता क्लास एक्टिंग फ्रंट पर बात की जाए तो लगभग सभी कलाकारों ने अपनाकाम संतोष जनक ढंग से किया है. वैसे ज़्यादातर स्क्रीन स्पेस सिर्फ दो कलाकारों केहिस्से आया है. नुसरत भरुचा और मीता वशिष्ठ. नुसरत ने अपना काम काफी हद तक अच्छेढंग से लिया है. वो ये आश्वासन देती हैं कि उन्हें अच्छा रोल मिले, तो वो और निखारला सकती हैं. मीता वशिष्ठ ने अपने कैलिबर के साथ न्याय करते हुए बेहद उम्दापरफॉरमेंस दी है. कुछेक सीन तो शानदार किए हैं उन्होंने. जैसे एक जगह वो नुसरत कोकौवे और नागिन की कहानी सुनाती हैं. वो सीन दमदार है. उन्हें परफॉर्म करते देखकर मनमें ख़याल आता है कि हिंदी सिनेमा वाले इनकी प्रतिभा को सही से इस्तेमाल नहीं कर पाएहैं. हेमंत के रोल में सौरभ गोयल और ड्राइवर कजला के रोल में राजेश जैस ने अपना कामअच्छे ढंग से किया है.मूल मराठी फिल्म के डायरेक्टर विशाल फुरिया ने नही 'छोरी' को डायरेक्ट किया है.उन्होंने अपनी कामयाब फिल्म को हिंदी में उसी इंटेंसिटी से बदला है. दिक्कत सिर्फइतनी है कि बीते पांच सालों में उनकी फिल्म का सब्जेक्ट कमज़ोर हो गया है. इसकॉन्टेक्स्ट में मुझे आर माधवन की कही एक बात याद आती है. 'रहना है तेरे दिल में'जब हिट हुई थी, तब माधवन से किसी रिपोर्टर ने पूछा था कि आपने ओरिजिनल फिल्म में भीकाम किया था, हिंदी रीमेक में काम करके कैसा लगा? माधवन का ऑनेस्ट जवाब था, "बहुतबोर हुआ यार! वही सब रिपीट करना पड़ा". मैं क्यूरियस हूं कि क्या डायरेक्टर विशालफुरिया को भी ये फिल्म दोबारा बनाने में बोरियत हुई होगी? खैर.'छोरी' फिल्म का डरावना सीन.# डर के आगे मैसेज है फिल्म पर आगे बात करने से पहले एक यूनिवर्सल बात कहनाचाहूँगा. दुनिया भर में जितनी भी सिनेमा इंडस्ट्रीज़ हैं, उनमें सबसे ज़्यादा भेडचालकी शिकार कोई इंडस्ट्री होगी, वो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ही होगी. हिंदी वाले हमेशाफ़ॉर्मूले के पीछे भागते हैं. किसी थीम पर एक-दो फ़िल्में चल जाएँ बस! थोक के भाव मेंवैसी फ़िल्में बनने लगती हैं. इस दौर का फ़ॉर्मूला है सोशल मैसेज वाली फ़िल्में.रोमांटिक फिल्म हो, कॉमेडी हो, ड्रामा हो, हॉरर हो सबमें सोशल मैसेज का तड़का लगायाजा रहा है. शायद मेकर्स को लगता होगा कि मैसेजिंग के सहारे नैया पार लग जाएगी. इसभेड़चाल में कई बार ओरिजिनल काम ही रह जाता है. अच्छी फिल्म बनाना.'छोरी' भी एक ज़रूरी मैसेज देने की कोशिश करती है. दिक्कत ये है कि ये मैसेज थोड़ापुराना हो गया है. 2016 में शायद ये रिलेवंट रहा हो, लेकिन 2021 आते-आते इस पर बहुतकुछ कहा-सुना जा चुका है. तबसे अब के बीच में OTT नाम की क्रान्ति हुई है और सोशलमैसेजिंग वाली दर्जनों फ़िल्में लोगों ने देख डाली है. ना तो सोशल मेसेज देती हॉररफिल्म का कांसेप्ट नया है, ना ही जिस मुद्दे पर फिल्म बात करती है वो पहली बारदिखाया जा रहा है. इसलिए 'छोरी' का मैसेजिंग वाला तड़का दर्शकों के लिए उतना कामनहीं करता. हाँ हॉरर एलिमेंट में फिल्म ज़रूर थोड़ा-बहुत स्कोर कर जाती है. पहले हाफमें कहानी का सेटअप बड़े प्रॉमिसिंग ढंग से एस्टैब्लिश होता है. लेकिन सेकंड हाफ मेंप्रेडिक्टेबल चीज़ों की भरमार थोड़ा निराश कर देती है. आखिर में जो बड़ा ट्विस्ट आताहै, वो भी आप घंटे भर पहले भांप चुके होते हैं. फिल्म की लेंथ भी थोड़ी ज़्यादा लगतीहै. ये और छोटी हो सकती थी.ओवरऑल हमारी राय ये बनी कि नुसरत-मीता की परफॉरमेंस के लिए देखना चाहें तो देख सकतेहैं. हॉरर आपका पसंदीदा जॉनर हैं, तो भी देख डालिए. ज़्यादा अच्छी न सही, बुरी भीनहीं लगेगी. लेकिन 'स्त्री' या 'बुलबुल' जैसी उम्मीदें लेकर जाते हैं तो निराश होसकते हैं.