The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Entertainment
  • Bob Biswas Movie Review starring Abhishek Bachchan, Chitrangada Singh, Samara Tijori and streaming on Zee5

मूवी रिव्यू: बॉब बिस्वास

क्या इस बॉब पर बिस्वास किया जा सकता है?

Advertisement
pic
3 दिसंबर 2021 (अपडेटेड: 3 दिसंबर 2021, 03:41 PM IST)
Img The Lallantop
ट्रेलर तो बढ़िया था, क्या फिल्म भी वैसी ही निकली?
Quick AI Highlights
Click here to view more
मार्च 2012 में जब सुजॉय घोष 'कहानी' लेकर आए थे, तो ढंग की हिंदी थ्रिलर फिल्म को तरसते सिनेप्रेमियों की जैसे लॉटरी लग गई थी. क्या मस्त फिल्म थी यार! विद्या बालन का जलवा तो था ही, कॉन्ट्रैक्ट किलर बॉब बिस्वास के छोटे से रोल में सास्वत चैटर्जी ने कहर ढा दिया था. वो कैरेक्टर इतना ज़्यादा पसंद किया गया कि मेकर्स ने उसे लेकर एक स्पिन ऑफ़ फिल्म ही बना डाली. 'बॉब बिस्वास' के नाम से. अभिषेक बच्चन को लीड रोल में लेकर. कैसी है 'बॉब बिस्वास'? क्या कहानी वाला एक्सपीरियंस दे पाती है? क्या इस बॉब पर बिस्वास किया जा सकता है? आइए, बात करते हैं. # 'क़ातिल-दी किलर' की कहानी बॉब बिस्वास नाम का एक कॉन्ट्रैक्ट किलर आठ साल के कोमा से जागा है. उसे कुछ याद नहीं है. ना अपना परिवार, ना अपना नाम, ना आपना काम, कुछ नहीं. भले ही उसे कुछ याद न हो, कुछ लोग हैं, जिन्हें सब याद है. वो लोग बॉब की हर हरकत पर नज़र रखे हुए हैं. उधर दूसरी तरफ कोलकाता शहर में एक नए तरह का ड्रग्स रैकेट चल रहा है. इस रैकेट से बॉब का कौन सा तार जुड़ा हुआ है. जो लोग बॉब की जासूसी में लगे हैं, वो कौन हैं? क्या चाहते हैं? बॉब का अतीत क्या उसके वर्तमान में कोई दिक्कत पैदा करता है? बॉब ने भूतकाल में ऐसा क्या कुछ कर रखा है, जिसके परिणाम उसे अब भुगतने हैं. इन सब सवालों के जवाब देखने के लिए आपको ज़ी5 पर फिल्म स्ट्रीम करनी पड़ेगी. लेकिन अगर फेयर सलाह दी जाए स्ट्रीम की जगह, स्किप भी कर सकते हैं. # फिल्म में 'कहानी' नहीं है 'बॉब बिस्वास' फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि भले ही ये 'कहानी' नाम की फिल्म से निकली हो, इसकी अपनी कोई कन्विंसिंग कहानी नहीं है. ट्रेलर जितना प्रॉमिसिंग लग रहा था, उसका पचास प्रतिशत भी फिल्म डिलीवर नहीं कर पाती. फिल्म इस वादे के साथ दर्शकों के सामने आई थी कि भोली शक्ल वाले जल्लाद की तूफानी ज़िंदगी में झाँकने का मौका देगी. यहाँ उस वाले बॉब को आप तलाशते ही रह जायेंगे. 'कहानी का 'बॉब' क्रूर था, चौंकाता था, 'बॉब बिस्वास' का बॉब कंफ्यूज्ड है, बोर करता है. यहाँ हम किरदार की बात कर रहे हैं. एक्टर की नहीं. अभिषेक बच्चन ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है. खैर उसकी बात आगे करेंगे. 'बॉब बिस्वास' में नैरेटिव के इतने सिरे खुल जाते हैं कि कुछ वक्त बाद आप परवाह करना बंद कर देते हैं. आपको नहीं पता कि पुलिसवाले जो कर रहे हैं, वो क्यों कर रहे हैं? धोनू नाम का एक किरदार कभी भला मानुस, कभी विलेन लगता है, तो इसके पीछे लॉजिक क्या है! एक ड्रग्स सिंडिकेट चलाने वाला बंदा दबंग विलेन लगने की जगह किसी सड़कछाप गुंडे की साइडकिक क्यों लगता है? रिएलिटी शोज़ से पॉपुलर हुआ गायक अचानक मर गया, तो किसी को कोई फर्क क्यों नहीं पड़ा? सवाल और भी हैं. इतने कि इस रिव्यू को 'बॉब बिस्वास देखकर मेरे मन में ये 25 सवाल आए' जैसी हेडिंग से भी चलाया जा सकता था. खैर. # जो वादा किया वो, निभा-ना सके 'बॉब बिस्वास' में भरोसा करने वाली ऑडियंस वही है, जो हिंदी में एक ढंग की थ्रिलर फिल्म देखने की मासूम ख्वाहिश रखती है. बॉब के पहले से एस्टैब्लिश्ड किरदार ने और अच्छे से काटे गए ट्रेलर ने उनकी उम्मीदों को ज़मीन दी थी. फिल्म उस ज़मीन को खींच लेती है और दर्शक धड़ाम से आ गिरते हैं. फिल्म वादा सा करती प्रतीत होती थी कि कुछ बढ़िया देखने को मिलेगा. ये वादा निभाया नहीं गया है. न तो कोई ड्रामा ढंग से क्रिएट होता है, न कोई सस्पेंस है, ना ही थ्रिल. फिल्म ज़्यादातर वक्त याददाश्त से जूझते बॉब का कन्फ्यूजन ही दिखाती रहती है. और जब उसे चीज़ें याद आ भी जाती हैं, तो वो कुछ ऐसी होती हैं कि आप सोचते हैं इससे अच्छा तो मेमरी लॉस ही था. स्क्रिप्ट के नाम पर राइटर्स ने खिचड़ी परोसी है. ड्रग्स का धंधा भी हो रहा है, सुपारी किलिंग भी हो रही है, करप्ट कॉप्स का नेक्सस भी चल रहा है, महिलाओं का वर्क प्लेस पर होने वाला हैरसमेंट भी कवर हो रहा है और फैमिली स्ट्रगल भी है. और यकीन जानिए कोई भी सब-प्लॉट आपको बांधकर नहीं रखता. # समारा तिजोरी का प्रॉमिसिंग डेब्यू एक्टिंग के फ्रंट पर बात की जाए, तो अभिषेक बच्चन ऑनेस्ट लगते हैं. उनकी मेहनत दिखती है. मुझे लगता है कि अभिषेक बच्चन पर किस्मत हमेशा थोड़ी कम मेहरबान रही है. उन्होंने हर्षद मेहता टाइप रोल किया, तो उसे प्रतीक गांधी से कम्पेयर किया गया. यहाँ भी उन्हें सास्वत चैटर्जी की अपार लोकप्रियता के साए में परफॉर्म करना था. वो करिश्मा कर भी जाते अगर उन्हें अच्छी राइटिंग का साथ मिल पाता. अभिषेक के बाद जिस एक एक्टर को आप इम्प्रेसिव काम करता पाएंगे, वो हैं समारा तिजोरी. मिनी के रोल को उनका डेब्यू बड़ा प्रॉमिसिंग है. वो काफी सारे अन्य स्टार-किड्स की तरह जबरिया एक्टर नहीं लगतीं. लगता है कि वो तैयारी से आई हैं. उन्हें आगे भी देखना अच्छा लगेगा. इन दोनों के अलावा वेटरन बंगाली एक्टर परन बंदोपाध्याय अपना काम बढ़िया ढंग से कर गए हैं. इन फैक्ट, उनका निभाया काली दा का किरदार फिल्म का इकलौता किरदार है जिसे स्पष्ट ढंग से लिखा गया है. इसी बंदे को सही से पता होता है कि उसे करना क्या है. चित्रांगदा सिंह का किरदार विचित्र ढंग से लिखा गया है. उनके करने के लिए कुछ ख़ास था नहीं. वो बस फिल्म में उपस्थित हैं. कुल मिलाकर 'बॉब बिस्वास' आपको बांधकर नहीं रख पाती. इसके लिए दिया अन्नपूर्णा घोष के डायरेक्शन को ज़िम्मेदार मानना है या सुजॉय घोष की बिखरी हुई स्क्रिप्ट को, ये आपके विवेक पर छोड़ देते हैं. वैसे भी इस हफ्ते देखने के लिए इतना कुछ नया रिलीज़ हुआ है. ऐसे में 'बॉब बिस्वास' पर दो घंटे ग्यारह मिनट खर्चने की सलाह देना, हमें तो ज़्यादती लगती है बॉस! बाकी आपकी मर्ज़ी.

Advertisement

Advertisement

()