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फिल्म रिव्यू- भूत बंगला

अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की नई फिल्म 'भूत बंगला' कैसी है, जानने के लिए देखें ये रिव्यू.

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17 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 17 अप्रैल 2026, 08:51 PM IST)
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'भूत बंगला' को प्रियदर्शन ने डायरेक्ट किया है. जो अक्षय के साथ 'हेरा फेरी', 'भूल भुलैया' और 'खट्टा मीठा' जैसी फिल्में बना चुके हैं.
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फिल्म- भूत बंगला
डायरेक्टर- प्रियदर्शन
एक्टर्स- अक्षय कुमार, वामिका गब्बी, तबू, जिशू सेनगुप्ता, राजेश शर्मा, ज़ाकिर हुसैन, मिथिला पालकर
रेटिंग- 2 स्टार

***

अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की Bhooth Bangla पिछले कुछ समय में आई सबसे डरावनी फिल्म है. क्योंकि ये आपके मन में इस जॉनर के प्रति डर बैठा देती है. कुछ चीज़ों को छेड़ना नहीं, छोड़ देना चाहिए. मसलन, 'भूल भुलैया'. अरे सॉरी! 'भूत बंगला'. ये चित्त नहीं, वित्त वाली फिल्म है. चूंकी 'भूल भुलैया' की कल्ट फैन-फॉलोइंग है. इसलिए मेकर्स को लगा कि इस नॉस्टैल्जिया को कैश-इन किया जाना चाहिए. इसलिए उन्होंने इस फिल्म में हर वो फॉर्मूला लगाया, जो 'भूल भुलैया' में था. बस दिमाग लगाना भूल गए. अव्वल, तो 'भूल भुलैया' कोई हॉरर-कॉमेडी फिल्म नहीं थी. वो साइकोलॉजिकल कॉमेडी थी. वो फिल्म कहती है कि भूत-वूत कुछ नहीं होता. ये सब दिमाग का वहम है. मगर जैसा कि मैंने पहले कहा, वहम होने के लिए दिमाग चाहिए. वो 'भूत बंगला' के पास है नहीं!

हम आपको संक्षेप में इस फिल्म की कहानी बताना चाहते हैं. मगर कैसे बताएं, ये समझ नहीं आ रहा है. ख़ैर, आइए ट्राय करते हैं. अर्जुन नाम का एक लड़का है. जो अपने पिता और बहन के साथ लंदन में रहता है. अच्छे घर का है. मगर उसके ऊपर बहुत उधारी है. उसकी बहन की शादी होने वाली है. इस शादी के लिए वो लोग अपने गांव यानी मंगलपुर जाते हैं. जहां उनका पुश्तैनी महल है. फिल्म बताती है कि ये इलाका नॉर्थ इंडिया में कहीं पड़ता है. अर्जुन अपनी फैमिली से पहले वहां पहुंच जाता है. ताकि शादी के लिए महल को तैयार कर सके. यहां आने के बाद उसे मालूम पड़ता है कि ये हवेली भूतिया है. और उसकी बैकस्टोरी की भी एक बैकस्टोरी है. ये सब जानने के बाद भी वो अपने बहन की शादी वहीं से करेगा या नही? क्या वो हॉरर और कॉमेडी के ट्रेंड के चक्कर में अपनी बहन की ज़िंदगी में खतरे में डालेगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब आपको फिल्म देती है. मगर क्या ये सवाल इतने अहम हैं, जिनके जवाब के लिए आपको अपना इंटेलेक्ट गिरवी रखना पड़े? तो जवाब है- नहीं. अब आगे हम जो भी बात करेंगे, उसमें इसी 'नहीं' को जस्टिफाई करेंगे.

'भूत बंगला' एक आउटडेटेड, झिलाऊ, थकाऊ और अटपटी फिल्म है. इस फिल्म को खुद नहीं पता कि ये क्या करना चाहती है. ये बात हमें कैसे मालूम? क्योंकि इस फिल्म को देखते हुए आपके जेहन में 'भूल भुलैया', 'स्त्री', 'मुंज्या', 'थामा' जैसी हाल-फिलहाल में आईं तमाम हॉरर-कॉमेडी फिल्मों का ख्याल आता है. ये फिल्म वही दोहाराना चाहती है, जो हो चुका है. या यूं कहें कि जो हिट हो चुका है.

जब मैं ये फिल्म देख रहा था, तो मुझे लगा कि जब आप ये कहानी पेपर पर पढ़ेंगे, तो बड़ी एंबिशस और फन फिल्म लगेगी. क्योंकि इसमें बहुत सारे एलीमेंट्स हैं. मगर वो स्क्रीन पर वैसे ट्रांसलेट नहीं हो पाती. क्योंकि सबकुछ रीहैश किया हुआ था. ये फिल्म भी उसी हवेली में घटती है, जो 'भूल भुलैया' में दिखी थी. जिस होटल में इस फिल्म को शूट किया गया है, उसका नाम है 'चोमू पैलेस'. ये सिर्फ एक जानकारी है, इसे अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए.

'भूत बंगला' हॉरर-कॉमेडी वाले खांचे में भी फिट नहीं होती. क्योंकि फिल्म के शुरुआती 20-25 मिनट में आपको कॉमेडी देखने को मिलती है. बाकी फिल्म सीरियस टोन लिए हुए है. मसला ये है कि वो डरावनी भी नहीं है. वही टिपिकल जंप स्केयर्स. अजीबोगरीब दिखने वाले भूत. एक मायथोलॉजिकल एंगल. जबरदस्ती का डला रोमैंटिक ट्रैक. और डबल मीनिंग या यूं कहें कि सेक्शुअल-अनफनी जोक्स.

जब आप थोड़े गहरे उतरते हैं ये ढूंढने के लिए कि ये फिल्म क्यों बनी, तो आपका सामना कुछ अन-कंफर्टेबल ट्रूथ से होता है. अगर आप अक्षय कुमार की पिछली और अगली फिल्म का लेखा-जोखा देखें, तो इस फिल्म को बनाने का मक़सद काफी हद तक क्लीयर हो जाता है. अक्षय की पिछली कुछ फिल्में नहीं चली हैं. ऐसे में उन्होंने अपनी पुरानी-हिट फिल्मों के सीक्वल्स पर दांव लगाया है. इस कड़ी में 'भूत बंगला' पहली फिल्म है. आने वाले दिनों में आप उन्हें 'वेलकम 3', 'हेरा फेरी 3' में भी देखेंगे. बेसिकली, वो ट्रायड एंड टेस्टेड वाला फॉरमूला लगा रहे हैं. क्योंकि उन फिल्मों की रिकॉल वैल्यू इतनी तगड़ी है कि पब्लिक उसका बुरा से बुरा सीक्वल भी एक बार तो थिएटर्स में देखेगी ही.

राजपाल यादव और असरानी. इस फिल्म में दो ही ऐसे लोग हैं, जो फिल्म को देखने लायक बनाते हैं. वो जिन भी सीन्स में होते हैं, वो मज़ेदार लगते हैं. उसमें लिखाई के साथ-साथ परफॉरमेंस की भी बड़ी भूमिका है. अक्षय कुमार अपनी कॉमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं. मगर वो टाइमिंग तब काम आएगी, जब आपको राइटिंग डिपार्टमेंट से थोड़ा-बहुत सपोर्ट मिले. मगर अक्षय यहां वही पुराने घिसे-पिटे पंचलाइन्स बोलते रहते हैं, जिस पर कुछ सालों पहले पब्लिक हंसा करती थी. मगर अब टाइम और गेम, दोनों चेंज हो चुका है. शायद ये बात इस फिल्म के मेकर्स को किसी ने बताई नहीं.

'भूत बंगला' देखते हुए मेरे दिमाग में लगातार कई सवाल कौंध रहे थे. मगर सबसे बड़ा सवाल ये था कि तबू ने ये फिल्म करना क्यों चुना? क्योंकि ये फिल्म उनके कैलिबर तो छोड़िए, उन्हें सही तरीके से यूटीलाइज़ भी नहीं कर पाती. तिस पर यहां इतनी सारी चीज़ें हो रही हैं कि आप ट्रैक ही नहीं रख पाते. शॉडी CGI वर्क इतना कमज़ोर है कि आप उसकी आलोचना भी नहीं करना चाहते. फिल्म के लिए जो कलर पैलेट चुना गया है, वो भी बड़ा अजीब है. जो फिल्म देखने के एक्सपीरियंस में बाधा तो नहीं पहुंचाता, मगर उसे रिच भी नहीं बनाता. 

'भूत बंगला' पर प्रियदर्शन की छाप नज़र आती है. क्योंकि इस फिल्म में उन्होंने वही किया है, जो वो अपनी पिछली फिल्मों में करते आए हैं. वही इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी है. क्योंकि प्रियदर्शन पिछले 30 सालों से फिल्में बना रहे हैं. उनका चश्मा भले बदल गया हो, मगर नज़रिया सेम है. 'भूत बंगला' शायद अक्षय और प्रियदर्शन के करियर की सबसे कमज़ोर फिल्मों गिनी जाएगी. अगर आने वाले समय में ये लोगों को याद रही तब....

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