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एनिमल - मूवी रिव्यू

'एनिमल' बहुत प्रॉब्लमैटिक फिल्म है, मगर वो खटकने वाले हिस्से फिल्म पर इतने भारी नहीं पड़ते कि उसे बुरी फिल्म बताकर खारिज कर दिया जाए.

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'एनिमल' के एक सीन में रणबीर कपूर.
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1 दिसंबर 2023
Updated: 1 दिसंबर 2023 18:09 IST
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'एनिमल' में रणबीर के किरदार को कई सारी गोली लगी होती है. उनकी डॉक्टर बताती हैं कि इससे उनकी मौत भी हो सकती थी. मगर उनका एड्रेनलीन इतना हाई था कि उन्हें दर्द महसूस ही नहीं हुआ. इस एक लाइन में 'एनिमल' का रिव्यू समेटा जा सकता है. क्योंकि ये बहुत प्रॉब्लमैटिक फिल्म है. मगर वो खटकने वाले हिस्से फिल्म पर इतने भारी नहीं पड़ते कि उसे बुरी फिल्म बताकर खारिज कर दिया जाए. अगर आपने इस पिक्चर की टिकट खरीदी है, इसका मतलब आपको पता है कि फिल्म में क्या देखने को मिलने वाला है. ओवरऑल ये एंटरटेनिंग फिल्म साबित होती है.

संदीप रेड्डी वांगा ने अपने करियर में दो फिल्में बनाई हैं. टेक्निकली वो एक ही फिल्म है. वांगा की सबसे खास बात ये है कि वो जो कहना चाहते हैं, वो कहते हैं. समाज और आइडियलिज़्म की परवाह किए बिना. वो क्रिटिक्स से बिगाड़ के डर से दर्शकों से 'अपने' ईमान की बात कहने में नहीं कतराते. आपको उस ईमानदारी के लिए उन्हें अंक देने होंगे. क्योंकि इंडिया में अभी के समय में शायद ही कोई फिल्ममेकर है, जो इतने रॉ और ऑथेंटिक तरीके से अपनी बातों को रखता है. मगर आप उनकी फिल्में देखते हुए ये भी फील करते हैं कि वो अपनी पिछली गलतियों से सीख नहीं रहे हैं.  

'एनिमल' की कहानी विजय नाम के एक लड़के के बारे में है. आई रिपीट ये कहानी सिर्फ इसी लड़के के बारे में है. वो अपने पिता बलबीर सिंह के प्रेम का भूखा है. बचपन से ही ये चीज़ उसके ज़हन में घर कर जाती है कि उसके पिता ने उसे उसके तरीके से प्रेम नहीं किया. मगर वो अपने पिता को बेटे के प्रेम की कमी नहीं खलने देगा. एक बार बलबीर सिंह पर हमला हो जाता है. इसके बाद विजय पिता की सुरक्षा के नाम पर कत्ल-ए-आम मचा देता है. ये इस फिल्म की मूल कहानी है. जिसे ढेर सारी हिंसा, अतार्किक किस्म के प्रेम, सनक, ईमानदारी और स्त्रीविरोध के ज़रिए दिखाया गया है. 

वांगा की फिल्मों के नायक इमोशनली अन-स्टेबल होते हैं. अच्छी बात ये है कि इस फिल्म में उसे कॉल आउट किया गया है. जिस तरह से दर्शक विजय को हैरत भरी निगाहों से देखते हैं. मसलन फिल्म में एक सीन है, जब बलबीर सिंह अपने बेटे को कातर नज़रों से देखता है. उसे ये अहसास हो चुका है कि उसका बेटा क्रिमिनल है. मानसिक रूप से परेशान है. इसके लिए वो खुद को सबसे बड़ा दोषी मानता है. मगर स्वीकार नहीं करता. क्योंकि इससे उसकी मर्दानगी आहत हो जाएगी.  

'एनिमल' कई मौकों पर ‘गॉडफादर-इश’ फील देने की कोशिश करती है. आप दोनों फिल्मों के नायकों (माइकल और विजय) में कई समानताएं नोटिस कर सकते हैं. कुछ भी हो जाए, फैमिली पर आंच नहीं आनी चाहिए. या जीजा वाला एंगल. कमोबेश 'गॉडफादर' की ही तरह कार ब्लास्ट वाला सीन भी यहां देखने को मिलता है. 'फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे' की माफिक यहां भी विजय अपनी प्रेमिका को फ्लाइट में लेकर जाता है. एनिमल के प्री-टीज़र में जो कुल्हाड़ी वाला सीन था, वो काफी हद तक पार्क चान वूक की 'ओल्डबॉय' से प्रेरित लगता है. हालांकि इसे कॉपी-पेस्ट नहीं कहा जा सकता. वांगा ने उसे और वीभत्स और दमदार बनाने की कोशिश की है.

'एनिमल' का फर्स्ट हाफ टाइट है. इसलिए लंबा होने के बावजूद खटकता नहीं है. कहानी एस्टैब्लिश होती है. 18 मिनट लंबा प्री-इंटरवल सीन फिल्म में आग फूंक देता है. इस सीक्वेंस की कोरियोग्राफी तोड़फोड़ है. मगर उस सीन को एलीवेट करता है हर्षवर्धन रामेश्वर का बैकग्राउंड म्यूज़िक. इनफैक्ट फिल्म का BGM इकलौती चीज़ है, जिसमें आप फिल्म के किसी हिस्से में कोई खामी नहीं पाएंगे. मगर सेकंड हाफ में कुछ फैमिली वाले सीन्स ड्रैग लगते हैं. खासकर रश्मिका मंदन्ना के निभाए गीतांजलि के कैरेक्टर वाले सीन्स. संदीप वांगा की कोशिश रही है कि इस फिल्म को अपने स्तर पर पर्सनल और इंटीमेट रख सकें. मगर इसके लिए वो दुनियावी और तार्किक तरीके नहीं चुनते हैं. यहीं से चीज़ें प्रॉब्लमैटिक होनी शुरू होती हैं.

विजय और गीतांजलि एक ही स्कूल में पढ़े हैं. मगर सालों बाद विजय, गीतांजलि से उसकी सगाई के दिन मिलता है. और कहता है कि बच्चे पैदा करने के लिहाज से उसकी शारीरिक बनावट सही है. इस सब के बावजूद गीतांजलि उससे शादी करने को मान जाती है. फिल्म में एक और सीन है, जो बहुत ही इंसेंसिटिव है. विजय एक फाइट में बुरी तरह घायल हो गया है. उसका इलाज चल रहा है. ऐसे में वो गीतांजलि के पीरियड्स और ब्लड लॉस की तुलना अपनी चोट से कर देता है. ये बहुत ही ऑकवर्ड सीन है. और फिल्म में ऐसे कई सीन और संवाद हैं, जो आपको हैरान-परेशान छोड़ देते हैं.  

रणबीर कपूर ने फिल्म में रणविजय बलबीर सिंह नाम का किरदार निभाया है. ये फिल्म पूरी तरह से उन्हीं के कंधों पर धरी हुई है. क्योंकि किसी और एक्टर को उनके सामने पनपने का मौका नहीं दिया गया है. रणबीर ने धुआं उड़ा दिया है. ये संभवत: 'बर्फी' के बाद उनके करियर का सबसे अच्छा काम है. उनकी इंटेंसिटी डरावनी है. उनकी आंखें इस किरदार के भीतर घुसने में मदद करती हैं. वो किन भावों से गुज़र रहा है, वो आपको वहीं नज़र आता है. बेसिकली आप इस रोल में किसी और एक्टर को इमैजिन ही नहीं कर सकते. इसमें ज़ाहिर तौर पर लेखन और डायरेक्टर की भूमिका अहम होती है. मगर आप इस वजह से एक्टर का क्रेडिट नहीं छीन सकते.

विजय के पिता बलबीर सिंह का रोल किया है अनिल कपूर ने. बलबीर और विजय के बीच जो भावनात्मक खाई है, वो आपको दिखाई नहीं जाती है. मगर एक्सपेक्ट किया जाता है कि आप खुद समझ जाएं. प्लस बलबीर के किरदार की कोई बैकस्टोरी नहीं बताई गई है. ऐसा लगता है कि this is Vijay's world, everybody else is just living in it. इसलिए अनिल की भी परफॉरमेंस का स्कोप जाता रहता है. फिल्म के आखिरी सीन में आपको उनका रेंज देखने को मिलता है. जहां उन्हें सिर्फ 'पापा-पापा' बोलना था. रश्मिका मंदन्ना का हिंदी एक्सेंट पूरा साफ नहीं है. इसलिए कई मौकों पर उनके डायलॉग्स साफ-साफ सुनाई नहीं आते. जिसकी वजह से उनकी परफॉरमेंस के नंबर कट जाते हैं. बॉबी देओल को संदीप रेड्डी वांगा ने जिस तरह से बर्बाद किया है, उसके लिए उन्हें अलग से एक अवॉर्ड मिलना चाहिए.

फिल्म में दो-तीन एक्टर्स हैं, जो कम स्क्रीनटाइम के बावजूद चमकते हैं. पहली हैं, 'सोनी' फेम सलोनी बत्रा, जिन्होंने विजय की बहन रीत का रोल किया है. जितने भी किरदार इस फिल्म में हैं, उनमें रणबीर के बाद सबसे ज़्यादा फुटेज उन्हें ही मिली हैं. वो बहुत नैचुरल लगी हैं. दूसरे एक्टर सौरभ सचदेवा. उन्होंने 'सेक्रेड गेम्स' में सुलेमान ईसा का रोल किया था. 'एनिमल' में वो बॉबी देओल के करीबी दोस्त बने हैं. फिल्म में बमुश्किल उनके दो-तीन सीन्स हैं. इसमें उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर आप अच्छे एक्टर हैं, तो एक सीन में आपका काम नोटिस में आ जाएगा. तीसरी एक्टर हैं तृप्ति डिमरी. तृप्ति को अगले कुछ सालों में इस दौर की सबसे अच्छी एक्टर्स में गिना जाएगा. इसकी शुरुआत 'लैला मजनू' और 'बुलबुल' से हो चुकी है. 'एनिमल' में उनका रोल कुछ खास नहीं है. बावजूद इसके उनका काम बहुत इंप्रेसिव है.

देखिए कुल जमा बात ये है कि 'एनिमल' क्रिटिक्स और रिव्यू प्रूफ फिल्म है. संदीप रेड्डी वांगा ने वो फिल्म बनाई है, जो वो बनाना चाहते थे. इसमें तमाम खामियां हैं. एक लाइन की स्टोरी है. इमोशनल डेप्थ नहीं है. मिसोजिनी का छिड़काव रही-सही कसर पूरी कर देता है. इन वजहों से इसे एक संजीदा फिल्म नहीं कहा जा सकता. बावजूद इसके 'एनिमल' आपको बोर नहीं करती. इसे खालिस एंटरटेनमेंट के मक़सद से देखा जाना चाहिए. सिनेमा मानकर. उससे ज़्यादा अगर आप कुछ एक्स्पेक्ट कर रहे हैं, तो ये फिल्म आपके लिए नहीं है. 

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