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जब दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन की फिल्म के प्रोड्यूसर भरी-दोपहरी में किडनैप हो गए

ये किडनैपिंग उस शख्स ने की थी, जिसका रोल आगे चलकर शाहरुख खान ने किया.

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4 जनवरी 2021 (अपडेटेड: 4 जनवरी 2021, 02:21 PM IST)
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फिल्म 'शक्ति' के दो अलग-अलग सीन्स में दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन.
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साल 1982 की बात है. मुंबई एयरपोर्ट पर एक रात को फिल्म 'शक्ति' का क्लाइमैक्स सीन शूट किया जा रहा था. तब नए-नए बने उस एयरपोर्ट को सहर इंटरनेशनल एयरपोर्ट कहा जाता था. फिल्म के इस सीन में अमिताभ बच्चन को मरना था. अपने पिता यानी दिलीप कुमार के हाथों गोली खाकर. बड़ा इंटेंस सीन था. तकरीबन पूरी फिल्म का सार. सीन को शूट करने से पहले अमिताभ इसकी तैयारी के लिए किनारे हो लिए. वो अकेले खड़े होकर इस सीन की रिहर्सल कर रहे थे. लेकिन वहीं पास में फिल्म का पूरा क्रू खड़ा था. इसलिए काफी हल्ला-गुल्ला हो रहा था. उस टेक में दिलीप कुमार का ज़्यादा रोल नहीं था, इसलिए वो चुपचाप बैठे हुए थे. उनकी नज़र जैसे ही अमिताभ पर पड़ी, वो पूरे क्रू पर चिल्ला पड़े. उन्होंने सबको शांत रहने के लिए कहा. साथ ही गुस्से में ये नसीहत भी दे डाली कि जब कोई आर्टिस्ट अपने शॉट की तैयारी कर रहा हो, तो उसका सम्मान करें. उसे शांति और स्पेस दें.


ये सिर्फ उस फिल्म या मोमेंट की बात नहीं थी. एक रिस्पेक्ट था, जो एक सुपरस्टार अपने उत्तराधिकारी को दे रहा था. 'शक्ति' वो पहली और इकलौती फिल्म रही, जिसमें दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने साथ काम किया. रिलीज़ के बाद फिल्म ने बहुत पैसे तो नहीं कमाए, मगर उसे हिंदी सिनेमा की कुछ शानदार फिल्मों में गिना जाता है. 1 अक्टूबर, 1982 को भारी बज़ के साथ सिनेमाघरों में उतरी थी ये फिल्म. इस मौके पर हम जानेंगे फिल्म की मेकिंग से जुड़े कुछ जबरदस्त किस्से और कहानियां.
'शक्ति' वो इकलौती फिल्म रही, जिसमें अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार ने साथ काम किया.
'शक्ति' वो इकलौती फिल्म रही, जिसमें अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार ने साथ काम किया.
1. दिलीप कुमार के साथ काम करने में 'शोले' का डायरेक्टर डर क्यों रहा था? 'शोले' की बेशुमार सफलता के बाद रमेश सिप्पी दो प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे. अपने प्रोडक्शन हाउस में वो 'शान' बनाना चाहते थे और प्रोड्यूसर मुशीर-रियाज़ के लिए 'शक्ति' डायरेक्ट करने वाले थे. सिप्पी हमेशा से दिलीप कुमार के साथ काम करना चाहते थे. 1976 में आई 'बैराग' के बाद दिलीप कुमार ने काम करना कम कर दिया था. या यूं कहें कि ब्रेक पर थे. 80 के दशक की शुरुआत में उनकी दो फिल्में 'क्रांति' और 'विधाता' रिलीज़ हो चुकी थीं. सिप्पी को 'मदर इंडिया' बहुत पसंद थी और उन्हें लगता था कि उसी लेवल की फिल्म दिलीप साहब के कद के साथ न्याय कर पाएगी. अगर सिप्पी के शब्दों में कहें, तो वो दिलीप कुमार के साथ फादर इंडिया बनाना चाहते थे. यानी एक ऐसे इंसान की कहानी, जो अपने सिद्धांतों पर टिके रहने के लिए बेटे तक की कुर्बानी दे सकता है. उन्हीं दिनों रमेश सिप्पी ने 'थंगा पटक्कम' नाम की तमिल फिल्म देखी थी. उस फिल्म में शिवाजी गणेसन ने बाप और बेटे का डबल रोल किया था. राइटर जोड़ी सलीम-जावेद और प्रोड्यूसर्स मुशीर-रियाज़ से इस फिल्म की चर्चा करने के बाद इसके राइट्स खरीद लिए गए. मगर सलीम-जावेद ने उस फिल्म को फ्रेम टू फ्रेम रीमेक करने की बजाय एक नई कहानी लिख दी. दोनों कहानियों में समानता सिर्फ इतनी थी कि दोनों में ही बाप अपने बेटे को मार देता है. स्क्रिप्ट के लिखे जाने के बाद दिलीप कुमार को इसमें लिए जाने की बात चली.
'थंगा पथक्कम' का पोस्टर, वो फिल्म जिससे प्रेरित होकर शक्ति बनी थी.
'थंगा पथक्कम' का पोस्टर, वो फिल्म जिससे प्रेरित होकर शक्ति बनी थी.

उन दिनों मार्केट में दिलीप कुमार के बारे में कई तरह की बातें चला करती थीं. जैसे ये कि उनका स्टारडम खत्म हो गया है. दबी जुबान में खबरें चलतीं कि इन दिनों दिलीप कुमार फिल्म में कुछ ज़्यादा ही इन्वॉल्व हो जाते हैं. कई फिल्ममेकर्स इसे अपने काम में खलल मानते थे. रमेश सिप्पी इस चीज़ से डर रहे थे. कि अगर दिलीप कुमार उनके काम में इंटरफेयर करने लगे, तो वो उन्हें कुछ कह भी नहीं पाएंगे. जैसे-तैसे उनकी ये चिंता दिलीप साहब तक पहुंचाई गई. वो अपने बारे में इस तरह की अफवाहें सुनकर चौंक गए. दिलीप कुमार ने कहा कि वो कभी इस तरह की चीज़ें नहीं करते. ना कभी करेंगे. बात पक्की हो गई. दिलीप कुमार को फिल्म 'शक्ति' में DCP अश्विनी कुमार के रोल में कास्ट कर लिया गया.
दिलीप कुमार बहुत झोल-तमाशे के बाद डीसीपी अश्विनी कुमार के रोल में कास्ट किए गए.
दिलीप कुमार बहुत झोल-तमाशे के बाद डीसीपी अश्विनी कुमार के रोल में कास्ट किए गए.
2. दिलीप कुमार का नाम सुनकर अमिताभ ने खुद को फ़िल्म में कास्ट कर लिया 'शक्ति' बाप-बेटे की कहानी थी. मगर बाप वाला रोल फिल्म का सबसे मजबूत और प्रभावशाली किरदार था. वो दिलीप कुमार कर रहे थे. सलीम-जावेद एक नाटक देखने गए थे, जहां उन्हें एक लड़के का काम बहुत पसंद आया. लड़के का नाम -  राज बब्बर. राइटर जोड़ी दिलीप कुमार के सामने उनको चाहती थी. ताकि दिलीप साहब वाला किरदार उभकर सामने आए. मगर तभी इस फिल्म की खबर अमिताभ बच्चन को लगी. अमिताभ तब तक देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बन चुके थे. 1981 में उनकी 'याराना', 'नसीब', 'लावारिस' और 'कालिया' समेत 8 फिल्में रिलीज़ हो चुकी थीं. साथ ही रमेश सिप्पी की 'शान' में भी शत्रुघ्न सिन्हा और शशि कपूर के साथ अमिताभ लीड रोल में नज़र आए थे. इस फिल्म की चर्चा सुनते ही उन्होंने इसके मेकर्स से पूछा कि इस फिल्म में उन्हें क्यों नहीं लिया गया? मेकर्स ने कहा कि बेटे वाला रोल उनके लायक नहीं है. अमिताभ, दिलीप कुमार को अपनी इंस्पिरेशन मानते थे और तब तक दोनों ने साथ में कभी कोई फिल्म नहीं की थी. सिर्फ दिलीप कुमार के साथ काम करने के लालच में अमिताभ ये फिल्म करने को तैयार हो गए. यही चीज़ राखी के साथ भी हुई. 'कभी कभी', 'त्रिशूल' और 'बरसात की एक रात' समेत कई फिल्मों में अमिताभ की लव इंट्रेस्ट का रोल करने वाली राखी, इस फिल्म में उनकी मां बनने को तैयार हो गईं. क्योंकि वो भी दिलीप कुमार की फिल्म का हिस्सा बनना चाहती थीं.
रमेश सिप्पी ने दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन को एक साथ ही फिल्म का नरेशन दिया यानी पूरी स्क्रिप्ट सुनाई. ताकि दोनों सुपरस्टार्स खासकर अमिताभ को ये क्लैरिटी रहे कि वो जो किरदार निभाने जा रहे हैं, वो कैसा है. अमिताभ को पता था कि ये फिल्म पूरी तरह से दिलीप कुमार की होने वाली है. बावजूद इसके उन्होंने 'शक्ति' में काम करने का अपना फैसला नहीं बदला. इसका खामियाज़ा उन्हें फिल्म की रिलीज़ के बाद भुगतना पड़ा.
दिलीप कुमार की वजह से ही इस फिल्म में राखी और अमिताभ बच्चन काम करने को तैयार हुए.
दिलीप कुमार की वजह से ही इस फिल्म में राखी और अमिताभ बच्चन काम करने को तैयार हुए. फिल्म में इन तीनों ने बाप-मां और बेटे का रोल किया था. 
3. जब दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन को नाश्ते में खा गए ये वाली लाइन हिंदी में थोड़ी अजीब लग रही है न? एक्चुअली हुआ ये कि शक्ति को बड़े शानदार रिव्यूज़ मिले. फिल्म की कहानी से लेकर उसके ट्रीटमेंट तक को खूब सराहा गया. फिल्म में दिलीप कुमार की परफॉरमेंस भी काफी चर्चा का विषय रही. एक मशहूर फिल्म समीक्षक ने अपने रिव्यू की हेडलाइन में लिखा-  Mr Kumar has Mr Bachchan for breakfast. उनके कहने का मतलब ये था कि अमिताभ, फिल्म में दिलीप कुमार के सामने टिक नहीं पाए. लगातार हो रही इस तरह की बातों से अमिताभ भी थोड़े परेशान होने लगे थे. उन्हें लगने लगा कि कहीं इस फिल्म में काम करके उन्होंने कोई गलती तो नहीं कर दी. फिल्म से जुड़े दूसरे लोग अमिताभ के बचाव में उतर आए. रमेश सिप्पी ने दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन को एक साथ स्क्रिप्ट सुनाई थी. इसलिए अमिताभ ये बिलकुल नहीं कह सकते थे कि फिल्म में उनका रोल काट दिया गया या उनके साथ धोखा हुआ है.
वहीं जावेद अख्तर का मानना था कि अमिताभ ने शक्ति में जो रोल किया, वो उनके लिए लिखा ही नहीं गया था. जब वो सलीम खान के साथ मिलकर इस फिल्म की स्क्रिप्ट लिख रहे थे, तब किसी के भी दिमाग में ये बात नहीं थी कि बेटे वाला किरदार अमिताभ बच्चन निभा सकते हैं. इसलिए उसे अति-रियलिस्टिक रखा गया. 'शक्ति' को शुरू से ही दिलीप कुमार की फिल्म की तरह देखा और बनाया जा रहा था. जावेद अख्तर ने ये भी कहा कि अमिताभ का शक्ति में होना, फिल्म के खिलाफ चला गया. क्योंकि लोगों को 'दी अमिताभ बच्चन शो' देखने की आदत हो गई थी. जिस फिल्म में अमिताभ होते, तो लोग उम्मीद करते कि उस फिल्म में कॉमेडी, एक्शन, इमोशन और नाच गाना सब होगा. मगर 'शक्ति' में ऐसा कुछ नहीं था. वो एक गंभीर सिनेमा था. 'शक्ति' की रिलीज़ के कई साल बाद अमिताभ को ये रियलाइज़ हुआ कि लोग चाहे जो कहें 'शक्ति' उनके करियर के सबसे शानदार कामों में से एक है.
इस फिल्म में अमिताभ ने दिलीप कुमार के बेटे का रोल किया था. अमिताभ तब देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बन चुके थे. इसलिए वो राज बब्बर के लिए लिखे गए रोल में भी काम करने को तैयार हो गए.
इस फिल्म में अमिताभ ने दिलीप कुमार के बेटे का रोल किया था. अमिताभ तब देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बन चुके थे. इसलिए वो राज बब्बर के लिए लिखे गए रोल में भी काम करने को तैयार हो गए. मगर पब्लिक को ये बात पसंद नहीं आई. 
4. 'शक्ति' की रिलीज़ से ठीक पहले फिल्म के प्रोड्यूसर किडनैप हो गए जैसा कि हमने आपको पहले बताया रमेश सिप्पी डायरेक्टेड फिल्म 'शक्ति' में प्रोड्यूसर जोड़ी मुशीर आलम और मोहम्मद रियाज़ ने पैसा लगाया था. इससे पहले ये जोड़ी राजेश खन्ना की 'सफर' और दिलीप कुमार की 'बैराग' जैसी फिल्में प्रोड्यूस कर चुकी थी. 22 सितंबर, 1982 शाम 4:30 बजे प्रोड्यूसर मुशीर आलम अपने वरली ऑफिस एम.आर. प्रोडक्शन से निकले. वो अपनी सफेद फिएट से एक मीटिंग के लिए साउथ बॉम्बे जा रहे थे. अभी वो अपने ऑफिस से कुछ ही दूर एनी बेसेंट रोड पहुंचे थे कि उनकी कार के रास्ते में एक तेज रफ्तार सफेद एम्बैसेडर आकर रुक गई. इससे पहले कि मुशीर कुछ समझ पाते, उस गाड़ी से तीन लोग बाहर निकले. उन्होंने मुशीर को घसीटकर फिएट से निकाला और एम्बैसेडर में बिठा दिया. उनकी आंख पर एक सफेद पट्टी बांधी गई और गाड़ी चलने लगी. दो मिनट के भीतर एक भीड़-भाड़ वाले इलाके में मुंबई की सबसे बड़ी किडनैपिंग हो चुकी थी. मुशीर को किडनैप करने वाले अंडरवर्ल्ड के लोग थे. इसमें अमीरज़ादा, आलमज़ेब, शहज़ाद खान और अब्दुल लतीफ जैसे गैंगस्टर शामिल थे. ये वही अब्दुल लतीफ था, जिसका रोल 2017 में आई फिल्म 'रईस' में शाहरुख खान ने किया था.
ओरिजिनल अब्दुल लतीफ, जिसका रोल शाहरुख खान ने फिल्म रईस में किया था. चश्मे से तो पहचान ही गए होंगे.
ओरिजिनल अब्दुल लतीफ, जिसका रोल शाहरुख खान ने फिल्म रईस में किया था. चश्मे से तो पहचान ही गए होंगे.

मुशीर ने आंख पर बंधे कपड़े के नीचे से झांककर ये देखने की कोशिश की कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है. मगर उनकी नज़र में सिर्फ 'शोले' फिल्म का एक बड़ा सा पोस्टर आया. उन्हें एक ऐसी लोकेशन पर ले जाया गया, जहां बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं. उनकी आंख पर कपड़ा बंधा था, इसलिए सीढ़ियों और रेलिंग के आने पर उन्हें बताया जा रहा था कि संभलकर चलें. सीढ़ियां चढ़ने और कुछ कदम चलने के बाद वो एक खाली कमरे में पहुंचे. वहां उन्हें एक तस्वीर दिखाई दी. फिर उस कमरे में अगले कुछ घंटों तक उन्हें मारा-पीटा और धमकाया गया. थोड़ी देर के बाद अमीरज़ादा ने मुशीर से कहा-

'हमें सिर्फ 25 लाख चाहिए'.

मुशीर ने कहा कि रुपयों का इंतज़ाम करने के लिए उन्हें अपने साले और बिज़नेस पार्टनर मोहम्मद रियाज़ को टेलीफोन करना होगा. रियाज़ को फोन कर मुशीर ने कहा कि अपने पास जितना भी कैश है, उसे एक जगह पर तैयार करके रख लें. थोड़ी देर बाद उन्हें वो पैसे किसी बताई गई जगह पर पहुंचाने होंगे. रियाज़ मान गए. रियाज़ को दोबारा फोन कर लोकेशन बताई गई. रात 9 बजे रियाज़ प्रोड्यूसर हरीश सुगंध के साथ 2 लाख 80 हज़ार रुपए लेकर बताई जगह पर पहुंच गए. वो इतने कम समय में इतनी ही रकम इकट्ठी कर पाए थे. इसके बाद किडनैपर्स ने मुशीर को आज़ाद कर दिया.
24 सितंबर, 1982 को मुशीर और रियाज़ के साथ दिलीप कुमार मुंबई पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचे. कमिश्नर जूलियो रिबेरो को पूरी कहानी सुनाई गई. रिबेरो ने ये केस इंस्पेक्टर झेंडे को सौंप दिया. इस मामले की इन्वेस्टिगेशन टीम का हिस्सा इशाक बागवान भी थे. इशाक ने झेंडे के ऑर्डर पर मुशीर से कुछ सवाल पूछे. जैसे लोकेशन और टाइमिंग वगैरह. मुशीर फिल्ममेकर थे, डिटेलिंग का ध्यान रखना उनका पेशा था. उन्होंने बागवान को बताया कि रास्ते में उन्हें 'शोले' का बड़ा पोस्टर नज़र आया. इसके 10-12 मिनट के बाद वो उस लोकेशन पर पहुंच गए, जहां उन्हें कमरे में रखा गया. सीढ़ियों की संख्या, लकड़ी की रेलिंग और कमरे में तस्वीर वाली बात पुलिस को बता दी गई.
कमिश्नर जुलियो रीबेरो ने दिलीप कुमार से पूरा मामला सुनने के बाद ये केस इंस्पेक्टर जेंदे को सौंप दिया. इस इन्वेस्टिगेशन टीम का हिस्सा इशाक बागवान भी थे.
कमिश्नर जुलियो रीबेरो ने दिलीप कुमार से पूरा मामला सुनने के बाद ये केस इंस्पेक्टर जेंदे को सौंप दिया. इस इन्वेस्टिगेशन टीम का हिस्सा इशाक बागवान भी थे.

इशाक बागवान अपने समय के जुगाड़ू पुलिस अफसरों में गिने जाते थे. उनके खबरी हर इलाके में हुआ करते थे. उन्होंने अपने एक खबरी से इन इलाकों की डीटेल मांगी. पता चला मुशीर को मुंबई के मशहूर रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा की कादर बिल्डिंग के एक कमरे में रखा गया था. जब बागवान वहां अपनी टीम के साथ पहुंचे, तो सलीम नाम के लड़के के अलावा कोई नहीं मिला. सलीम, अमीरज़ादा और आलमज़ेब के कादर बिल्डिंग वाले ऑफिस की साफ-सफाई का काम करता था. मगर सलीम ने पुलिस को कहा कि उसे उन दोनों के बारे में कुछ नहीं पता. इस बारे में आलमज़ेब का बाप बता सकता है. आलमज़ेब के पिता से पुलिस को पता लगा कि अमीरज़ादा और आलमज़ेब अहमदाबाद में हैं. बिना देरी किए एक टीम अहमदाबाद भेजी गई, जहां से उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. इशाक बागवान वही पुलिस ऑफिसर हैं, जिन्होंने वडाला कॉलेज में गैंगस्टर मन्या सुर्वे का एनकाउंटर किया था. फिल्म 'शूटआउट ऐट वडाला' में इशाक का रोल अनिल कपूर ने किया था.
ओरिजिनल इशाक बागवान और उनका फिल्मी वर्ज़न, जो कि अनिल कपूर ने निभाया था.
ओरिजिनल इशाक बागवान और उनका फिल्मी वर्ज़न, जो कि अनिल कपूर ने निभाया था.
5. जब इराक़ में किडनैप हुए हुसैन ज़ैदी की जान अमिताभ बच्चन ने बचाई फिल्म शक्ति से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा सुनिए. जब इराक़ में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर सद्दाम हुसैन का राज खत्म किया, तब मशहूर जर्नलिस्ट एस. हुसैन ज़ैदी इराक़ गए हुए थे. वो बगदाद में सद्दाम के करीबी लोगों से बात करना चाहते थे. अपनी इसी कोशिश में वो धर लिए गए. कुछ लोगों ने उन्हें बंधक बनाकर एक कमरे में बंद कर दिया. थोड़ी देर बाद दो लोग आए. उन्होंने ज़ैदी से पूछा कि क्या वो पाकिस्तानी हैं? ज़ैदी ने कहा- नहीं. मैं इंडिया से हूं. इसके बाद उस शख्स ने अरबी भाषा में कुछ कहा, जो ज़ैदी को समझ नहीं आया. कुछ समय के बाद उस शख्स ने हुसैन ज़ैदी से पूछा कि क्या वो अमीषा बक्कान को जानते हैं? ज़ैदी ने कहा कि वो सिर्फ एक ही अमीषा को जानते हैं, अमीषा पटेल. इस बात से वो आदमी नाराज हो गया. वो अंदर कमरे में गया और एक फोटो निकालकर लाया. वो फोटो फिल्म 'शक्ति' में अमिताभ बच्चन के किरदार की थी. वो तस्वीर देखते ही ज़ैदी खुशी के मारे चिल्ला पड़े. वो समझ गए कि सामने वाला आदमी अमीषा बक्कान नहीं, अमिताभ बच्चन की बात कर रहा हैं. ज़ैदी को खुशी में उछलता देख उस आदमी को लगा कि हुसैन ज़ैदी, अमिताभ बच्चन के दोस्त हैं. उसने ज़ैदी से एक कागज़ पर लिखवाया कि जब भी वो कभी मुंबई आएगा, तो ज़ैदी उसे अमिताभ से मिलवाएंगे. इस नोट को लिखने बाद उसने हुसैन ज़ैदी को छोड़ दिया और वो सही सलामत वापस इंडिया लौट आए.
एक इवेंट के दौरान हुसैन ज़ैदी और अमिताभ बच्चन.
एक इवेंट के दौरान हुसैन ज़ैदी और अमिताभ बच्चन.

तो ये थे 1982 में रिलीज हुई फिल्म शक्ति के बॉलीवुड किस्से. वो इकलौती फिल्म, जिसमें दो लैजेंड्री एक्टर्स दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन ने साथ काम किया.

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