एक नये ओटीटी प्लेटफार्म opentheatre.inपर एक नई फिल्म आई है. फिल्म का नाम है 'अंडमान'. कोरोनाकाल के दौरान की कहानी है.ये शायद हिंदी की चुनिंदा फिल्मों में से एक है, जिसमें कोरोना का दौर दिखाया गयाहै. कैसी लगी हमें 'अंडमान' आइये बतलाते हैं. # कहानी अंडमान की ये कहानी है अंडमानगांव की, जहां अभिमन्यु प्रताप पंचायत सचिव के पद पर नियुक्त हुए हैं. अभिमन्युनियम-कायदों का पालन करने वाले एक जागरूक नागरिक है. पढ़ने-लिखने में हमेशा अव्वलरहे हैं. बोर्ड एग्जाम में स्टेट टॉपर रहे. यूनिवर्सिटी में भी गोल्ड मेडल जीतालेकिन IAS के इंटरव्यू में अभिमन्यु फेल हो जाते हैं. निराश होकर अब पंचायत सचिव कीनौकरी कर रहे हैं. लेकिन यहां गांव की व्यवस्था तो और भी निराशाजनक है. शहर से कटेअंडमान की हालत बदहाल है. गांव में अस्पताल तक नहीं है. शहर को जाने वाली लंबी सड़कभी जर्जर हालत में है. अभिमन्यु मुख्यमंत्री को गांव की नदी के ऊपर शहर से जोड़ताहुआ एक पुल बनाने की गुज़ारिश करती चिट्ठी लिखते हैं.इस टाइमलाइन में मार्च 2020 आ जाता है. प्रधानमंत्री देश भर में लॉकडाउन लगा देतेहैं. अभिमन्यु को शहर से कटे अंडमान गांव में क्वारंटाइन सेंटर संभालने कीज़िम्मेदारी मिलती है. लेकिन यहां अभिमन्यु को सिर्फ़ कोरोना वायरस का सामना नहींकरना पड़ रहा बल्कि गांव वालों में धंसे छूत-अछूत, हिंदू-मुसलमान और ऊंच-नीच केवायरस से भी दो-चार होना पड़ रहा है. अभिमन्यु कोरोना काल में 'अंडमान' की व्यवस्थासुचारू रूप से चला पता है या नहीं जानने के लिए opentheatre.in पर स्ट्रीम करें 'अंडमान'. #कैसा काम किया है? इस फिल्म को लिखा है आनंद राज ने. औरबहुत ही कमाल लिखा है. इस फिल्म की राइटिंग सबसे मजबूत पिलर है, जो फिल्म को अंत तकखड़ा रखने में मदद करती है. आनंद ने अपनी लेखनी में यूपी के गांव को बारीक डीटेलिंगके साथ उतार दिया है. 'अंडमान' गांव बहुत ही असल लगता है. इसके लोग भी असल लगतेहैं. शायद ये पहली फिल्म है, जिसमें लॉकडाउन का दौर दिखाया गया है. एक यूपी के गांवके क्वारंटाइन सेंटर में उस वक़्त क्या हालात रहे होंगे, इसका एकदम सटीक नहीं तोबेहद करीबी चित्रण इस फिल्म में दिखाई पड़ा. आनंद राज ने गांव की प्रधानी की 'हरिजन'सीट के लिए बाहुबलियों द्वारा की जाने वाली धांधली, जातिवाद, धर्मभेद, पढ़े-लिखेऊंचे पदों पर पहुंचे लोगों की दहेज की भूख को भी को बहुत ही वास्तविक ढंग से कहानीमें पिरोया है. हां अंत में उन्होंने भी हैप्पी एंडिंग का रूट पकड़ कर अभिमन्यु कोएक आम आदमी से 'हीरो' वाली श्रेणी में डालने की कोशिश की है. जो हल्की खटकती हैलेकिन फ़िर भी इस नायाब सोच और सब्जेक्ट के लिए बतौर राइटर आनंद राज को साधुवाद.'अंडमान' के राइटर और एक्टर आनंद राज.आनंद ने ही फिल्म में अभिमन्यु प्रताप की मुख्य भूमिका निभाई है. अभिनय के मामलेमें आनंद राइटिंग से 19 पड़ते हैं लेकिन संभाल लेते हैं. कोई ख़ास खामी नज़र नहीं आती.नियम-कायदों के सख्त पालक अभिमन्यु का सधा चित्रण करने में भी आनंद राज बहुत हद तकसफ़ल हुए हैं. फिल्म में झल्लू की भूमिका निभाने वाले जय शंकर पांडे ने भी गरीबी औरजाति के नाम पर दबाए गए अधेड़ की भूमिका शानदार ढंग से अदा की है. MLC बनने का ख्वाबदेखने वाले बाहुबली के किरदार में अंबरीश बॉबी ने भी अच्छी परफॉरमेंस दी है. हल्कूनाम के युवक के रोल में विशाल अगिरन और इसकी पत्नी झुमकी के रोल में अमृता पाल कीएक्टिंग भी अच्छी रही. फिल्म में राजेश तैलंग और संजय मिश्रा जैसे कलाकार भी गेस्टरोल में नज़र आते हैं. दोनों ही कमाल हैं .आगे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है.'अंडमान' को डायरेक्ट किया है फिल्म पत्रकार रह चुकी स्मिता सिंह ने. ये स्मिता कीपहली फिल्म है. बतौर निर्देशक ये उनकी छोटी ही सही लेकिन अच्छी शुरुआत है. एक बंधेबजट में लिमिटेड संसाधनों का इस्तेमाल कर स्मिता ने 'अंडमान' की कहानी के साथनिर्देशक के तौर पर पूरा न्याय किया है. #देखें या नहीं? 'अंडमान' प्रोडक्शन स्तरपर उतनी अपीलिंग नहीं लगती. कास्ट में भी मुख्य एक्टर्स को छोड़ बाकी एक्टर्स एवरेजअभिनय करते दिखते हैं. बावजूद इन कमियों के फ़िल्म अपनी महीन और रियलिटी के करीबराइटिंग की बदौलत अंत तक बांधे रखने में कामयाब होती है. हमारे हिसाब से तो'अंडमान' को एक बार ज़रूर देखा जाना चाहिए.