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हैलो मियां चांद ! तुम सिर्फ शियाओं को ही क्यों दिखाई दिए?

बड़ी सूनी ईद है ये, बिन छोलों, बिन दोस्तों की. ईद मतलब सब गले मिलते, लेकिन मौलवियों ने दो फाड़ कर दिया.

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6 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 6 जुलाई 2016, 03:57 AM IST)
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Reuters
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हैलो चांद! क्या हाल-चाल हैं? ओह! तुम से ये क्या पूछ लिया. जो सितारों का रंगरसिया हो, उसके हालचाल तो माशाल्लाह ही होंगे. अगर सितारों से अठखेलियां करने से फुरसत मिले तो कभी हमारा भी ख्याल कर लिया करो. तुम्हें पता है रोजे कैसे रखते हैं, वो भी जून के. हालत खस्ता हो जाती है, तिश्नगी जान लेने का इरादा रखती है. करीब 16-17 घंटे तक खाना-पानी तो छोड़िए, थूक तक हलक से पार नहीं कर पाते हैं. पूरे रमजान तुम टाइम से आते हो और टाइम से ही आराम करने चल जाते हो, लेकिन जैसे ही 29 रोजे हुए, तुम्हारे नखरे शुरू. जब तुम 29वें रोजे को नहीं दिखाई देते तो लगता है बहू का मन मायके से आने का नहीं है और एक दिन बाद आने का तय कर लिया है.
दुनिया तकनीक से लैस होती जा रही है. तुममें जिंदगी बसर करने की तरकीबे ढूंढी जा रही हैं. तुम हो कि अपना मुहावरा बदलने तक को राजी नहीं हो. क्या है वो मुहावरा? हां, याद आया "ईद का चांद होना". मैं भी कितना बच्चा हूं जो तुमसे बिन सिर-पैर की बात कर रहा हूं. शायद इसलिए कि बचपन में अम्मी लोरी सुनाती थीं. "चंदा मामा दूर के, पुए पकाए बूर के. आप खाए थाली में हमें दिए प्याली में प्याली गई फूट चंदा मामा गए रूठ." अगर तुम नहीं दिखाई देते हो ये ही लगता है शायद चंदा मामा रूठ गए हैं. खैर, आप से ये बातें करना फंतासी है. बात की जाए तो मौलवी साहिबान की. उनकी बनी कमेटियों की. जो तुम्हें लेकर इतना कंफ्युजिया जाते हैं कि दो-दो ईदें मना ली जाती हैं.
ईरान से ऐलान होता है और तमाम दुनिया के शिया ईद मना लेते हैं. मुझे ये खबर तब मिलती है जब मॉर्निंग शिफ्ट के लिए ऑफिस निकल जाता हूं. इस मौके के लिए एक मिसरा याद आ रहा है पता नहीं किसका है. मुलाहयजा फरमाएं- अल्लाह जाने रातोंरात क्या नई तरकीब हुई सोये थे हम रोजा समझके, जागे तो ईद हुई मेरे मन में सवाल आता है आखिर चांद इतनी देर से क्यों निकल कर आया. क्या चांद किसी से इश्क फरम रहा था या फिर उस आशिक के लिए रुक गया था जो अपनी महबूबा से कह रहा था- "तुम कहो तो चांद सितारे तोड़कर ला दूं" अगर चांद मियां तुम टाइम पर ही आए, तो पूरी रात मौलवियों की कशमकश में क्यो गुजरी कि चांद दिखा या नहीं. ठीक है बड़ी जिम्मेदारी थी, इसलिए सोच-विचार हो रहा था. तफ्तीश हो रही थी कि किस-किस ने चांद को देखा.
अब सवाल है मियां चांद ! तुम सिर्फ शियाओं को ही क्यों दिखाई दिए. सुन्नियों से क्या कोई अदावत है जो बेचारों को एक और रोजा रखवा दिया. मियां चांद इतनी राजनीति सही नहीं है. पाकिस्तानी झंडे में आ जाने की वजह से एक तो तुम पहले ही मुस्लिम डिक्लेयर हो गए, वो भी पाकिस्तान वाले, इंडिया वाले नहीं. अब तुमने जो किया उससे लग रहा तुम शियाओं से मिले हुए हो. हैरानी तो इस बात की है कि पाकिस्तान की रूअते हिलाल कमेटी इस बार फिर फुद्दू बन गई. उसे फिर चांद नहीं दिखाई दिया, जबकि इस कमेटी के सरदार ने एक मुफ्ती साहब को लताड़ लगाई थी कि जब मुफ्ती को रमजान में कंदील बलोच दिख जाती हैं तो फिर चांद कहां दिखेगा.
ये बात सरदार ने तब कही थी जब मुफ्ती साब का एक वीडियो मॉडल कंदील बलोच के साथ वायरल हो गया था. मेरा इस कमेटी के सभा मेंबर समेत इसके सरदार से सवाल है क्या वो भी किसी से इश्क फरमा रहे थे जो उन्हें भी चांद नहीं दिखा. चलिए छोड़िए पाकिस्तान का आप से क्या जिक्र करूं. बस ये सोच रहा हूं इंडिया में भी हिलाल कमेटी है चांद देखती है. दो लोग गवाही दे दें कि चांद दिख गया तो ऐलान कर देंगे कि हां दिख गया. ईरान से लेकर इंडिया तक शिया ईद मना रहे हैं. चांद दिखा होगा तभी तो मना रहे हैं. इन्हें फिर भी यकीन नहीं कि चांद दिखा या नहीं. चांद तुमने इनकी पोल पट्टी खोल दी. ये कभी एक प्लेटफॉर्म पर नहीं आ सकते. इत्तेहाद की बात करते हैं ईद एक दिन मना नहीं सकते और क्या कर सकते हैं? मेरी दो-दो ईदें करा दीं. दो-दो ईदों से गोपी किशन फिल्म का डायलॉग याद आता है, जब सुनील शेट्टी का बेटा डबल रोल देखकर कहता है मेरे दो-दो बाप. चांद तुम सबको एक साथ क्यों दिखाई नहीं दिए. देखो मजा किरकिरा हो गया है. मेरे मकान मालिक का लड़का ईद होने के बाद भी घर में अकेला लेटा है, क्योंकि उसके सुन्नी दोस्त अमन सिद्दीकी और फराज कुरैशी रोजे से हैं. वो कल ईद मनाएंगे. अगर तुम रात साफतौर पर दिखाई दे जाते तो कम से कम अम्मी काबली चने तो पानी में भिगो कर रख देतीं, जिनके फूलने पर वो छोले बना लेतीं. बड़ी सूनी ईद है ये, बिन छोलों की, बिन दोस्तों की. ईद मतलब सब गले मिलते, लेकिन मौलवियों ने दो फाड़ कर दिया. शियाओ तुम आज खुद ही गले मिल लो, सुन्नी कल गले मिल लेंगे. खबरदार चांद जो तुमने फिर ऐसा किया. एक मौका आता है सुन्नी शिया के गले मिलने का. उसे यूं बेकार न करना. बचपन में अम्मी कहती थीं चंदा मामा गए रूठ. आज तुम्हारी इस हरकत पर मैं कह रहा हूं "ये भांजा गया रूठ" खुट्टा. हुंह. जब अगली ईद पर टाइम से आओगे तभी मानूंगा. परेशां दिल

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