प्यारे पापा, वो आपकी लड़की है, लकड़ी की हांडी नहीं कि दे दोगे
बात एक विज्ञापन की जो बहुत अच्छा मेसेज देता है तो बहुत ढीला भी.
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विज्ञापन का एक दृश्य.
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हम जब घर का परदा, सोफा या पलंग खरीदते हैं तो पहले चार दुकानों में जाकर 'देखते' हैं. जब नई गाड़ी खरीदते हैं, 'चार-पांच' मॉडल शॉर्टलिस्ट करते हैं. फिर एक लास्ट वाला सलेक्ट करते हैं. कुछ यही हाल हमारे यहां अरेंज्ड मैरिज का है. लड़के वाले लड़की को 'देखते' हैं. फिर और लड़कियों को देखते हैं. फिर एक पर रुकते हैं. डील होती है. और सबकुछ ठीक रहता है तो शादी हो जाती है.
धीरे-धीरे टाइम बदलने लगा और लड़की वाले भी लड़के 'देखने' लगे. पहले लड़कियों की राय मांगना जरूरी नहीं समझा जाता था. अब उनसे भी पूछ लिया जाता है कि लड़का पसंद है या नहीं.
बीबा का एक ऐड देखा. हालांकि 7 महीने पुराना है. पर देखकर लगा इसके बारे में बात करनी चाहिए.
शादी को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है. कुछ लोग कहते हैं कि 'लव मैरिज' ही सही मैरिज है. क्योंकि जरूरी है शादी का रिश्ता दो अनजान लोगों के बीच नहीं, दो ऐसे लोगों के बीच हो जिन्हें आपस में प्यार हो. लेकिन बीबा का ये ऐड लव और अरेंज्ड मैरिज के बीच की कोई जगह खोजने की कोशिश कर रहा है.
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ये कहानी पायल की है. रिश्ता लेकर आई फैमिली के सामने खुद को 'दिखाने' के लिए वह सज रही है. पिता से कहती है, कैसे सिर्फ (लड़के वालों को) समोसे खिला कर तय कर लूं कि शादी करनी है. लेकिन बाद में मेहमानों के आगे ड्रॉइंग रूम में पिता का रूप बिलकुल बदल जाता है. कहते हैं, उस लड़के को अपनी बेटी कैसे सौंप दें, जिसे खाने के नाम पर सिर्फ नूडल्स बनाने आते हों. लेकिन लड़का भी तय करता है कि 10 दिनों में वो अपनी होने वाली बीवी के लिए सबकुछ सीख लेगा.
ऐड दावा करता है, Change is beautiful. यानी बदलाव सुंदर है. ऐड में दो लोग बदल रहे हैं. एक वो पिता, जो शादी में लड़के और लड़की को बराबरी की बात कर रहा है. दूसरा लड़का, जो ये सीखता है कि उसकी भी पत्नी के प्रति उतनी ही जिम्मेदारी होनी चाहिए जितनी पत्नी की पति के प्रति.
शादी में बराबरी की ओर संकेत करता ये ऐड लेकिन उतना भी ब्यूटीफुल नहीं है, जितना ये दावा करता है. बताते हैं कैसे.
1. लड़के वाले पसंद कर लें इसलिए लड़की को सजना पड़ता है. समोसे बनाकर सर्व करने पड़ते हैं. जैसे किसी चीज की नुमाइश हो.
2. परिवार का मुखिया पिता है. वही शादी तय करेगा. और कोई बदलाव आएगा तो भी उसी की मर्जी से आएगा. बेटी शादी का कोई विरोध नहीं करती. बस हलकी सी अर्जी देती है. और लड़की की मां तो फ्रेम में है ही नहीं. हमें बस इतना मालूम है कि पीली साड़ी में कोई औरत बैठी है. इस परिवार में औरतें मानों पुरुषों के करम, उन्हीं के फैसलों पर जी रही हैं.
3. बदलाव केवल खाना पकाने के सामर्थ्य से आता है. लड़की को केवल उसकी सूरत और खाना पकाने की क्षमता की वजह से पसंद किया गया है. तो वही नियम लड़के को भी पसंद करने में लगाए जा रहे हैं. लड़के और लड़की की पसंद-नापसंद, दिमाग और सोच, और फ्यूचर के फैसले इस रिश्ते में कोई महत्व रखते नहीं दिख रहे हैं.
4. लड़का ठीक हुआ तो हम लड़की 'देंगे'. जैसे लड़की, लड़के को देने 'वस्तु' हो.
कुल मिलाकर ऐड ये कहता है, कि शादी घर वालों की मर्जी से करो. और शादी के सेटअप में अगर कोई बदलाव आएगा, तो पुरुष के फैसलों से ही आएगा. लड़की पहले भी चुप थी, अब भी चुप है. और शादी में प्रेम का क्या? वो तो शादी हो जाने के बाद हो जाएगा.

