"अच्छा चलता हूं, दुआओं में… " हिंदी सिनेमा के लिए अरिजीत सिंह होना क्या मायने रखता है
Arijit Singh Retirement: अरिजीत सिंह ने फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग से दूरी बनाने का संकेत दिया है. यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस आवाज़ की कहानी है जिसने करोड़ों दिलों के जज़्बात गाए. संघर्ष से शिखर तक और फिर “अच्छा चलता हूं” कहकर ठहर जाने तक का सफर.

तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल... फिल्म ऐ दिल है मुश्किल के गाने की ये लाइनें, महज किसी गीत के बोल भर नहीं हैं. ये तो अब जरिया बन चुकी हैं लाखों दिलों के हाल-ए-दिल बयां करने का…या फिर आज की तारीख में बात करें तो दर्द-ए-दिल बयां करने का… जी हां, दर्द क्योंकि जिस आवाज़ के सहारे लोगों ने अपने सबसे निजी जज़्बातों को शब्द दिए, उसी आवाज़ ने कहा है कि अब वो फिल्मों के लिए नहीं गाएगी.
बॉलीवुड के दिग्गज गायक अरिजीत सिंह ने प्लेबैक सिंगिंग से संन्यास लेने का ऐलान किया है.
ये खबर किसी ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह नहीं आई. ये धीरे-धीरे दिल में उतरी. पहले यकीन नहीं हुआ. फिर एक अजीब सा खालीपन महसूस हुआ. और फिर हर किसी ने अपने-अपने तरीके से ये मान लिया कि अब कुछ बदल गया है.
क्योंकि अरिजीत सिंह सिर्फ एक सिंगर नहीं थे. वो एक आदत थे. एक सहारा थे. एक ऐसा नाम थे, जो लोग अपने सबसे कमजोर लम्हों में याद करते हैं.
अब तो आदत सी है मुझको, ऐसे जीने में...
शुरुआत - जहां आवाज़ थी, लेकिन पहचान नहींथोड़ी जगह दे दे मुझे, तेरे पास कहीं रह जाऊं मैं... पश्चिम बंगाल का जियागंज. छोटा सा कस्बा. एक साधारण सा घर. मां शास्त्रीय संगीत सिखाती थीं. नानी लोकगीत गाती थीं. सुर घर में सांसों की तरह चलते थे.
अरिजीत ने संगीत को कभी शोहरत का रास्ता नहीं माना. संगीत उनके भीतर था. बिना शोर के. बिना दावे के. लेकिन इस देश में हुनर से पहले पहचान मांगी जाती है. और पहचान उनके पास नहीं थी.
शायद इसी कमी ने उनकी आवाज़ में वो ठहराव पैदा किया, जो बाद में लाखों लोगों का सहारा बना.

हार के जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं... फेम गुरुकुल में पहुंचे. कैमरे थे. रोशनी थी. उम्मीद थी. लेकिन जीत नहीं थी.
शो खत्म हुआ. मंच खाली हुआ. दुनिया अगले एपिसोड में चली गई. अरिजीत वहीं खड़े रह गए. हाथ में सपना. आंखों में सवाल.
कुछ हारें शोर नहीं करतीं. वो बस इंसान को चुप रहना सिखाती हैं.
मुंबई - सपनों का शहर और सन्नाटाखामोशियां, आवाज़ हैं…अरिजीत की ज़िंदगी उन्हें मुंबई ले आई. शहर बड़ा था. सपने उससे भी बड़े. लेकिन जगह बहुत छोटी थी. कमरे छोटे थे. जेब हल्की थी. दिन स्टूडियो में कटता था. रातें इंतज़ार में.
जिंगल्स गाए. बैकग्राउंड वॉयस दी. म्यूज़िक अरेंज किया. दूसरों के लिए सुर सजाए.
कई बार थिएटर में गाना बजता था. दिल पहचान जाता था. लेकिन स्क्रीन पर नाम किसी और का होता था.
पहला ब्रेक - बिना जश्नफिर ले आया दिल... काम मिला. लेकिन वो काम नहीं, जो जिंदगी पलट दे. अरिजीत ने इंतज़ार किया.
क्योंकि उन्हें पता था, आवाज़ का सफर जल्दी खत्म नहीं होता.

तुम ही हो, अब तुम ही हो… आशिकी 2. एक गाना. और अचानक हर दिल को अपनी बात कहने का तरीका मिल गया.
लोगों ने अरिजीत को नहीं सुना. लोगों ने खुद को सुना.
कामयाबी - हर इमोशन में अरिजीतअगर तुम साथ हो... अरिजीत के चाहने वालों के लिए उनके गानों का साथ कुछ ऐसा ही था.
शादी में - रातां लंबियां.
ब्रेकअप में - चन्ना मेरेया.
दोस्ती में - तेरा यार हूं मैं.
अकेलेपन में - ऐ दिल है मुश्किल.
अरिजीत हर जगह थे. बिना दिखे. बिना बोले. जब एक आवाज़ हर किसी की बन जाए, तो खुद की आवाज़ कहीं पीछे छूट जाती है.
विवाद - एक माफी और लंबा सन्नाटाचुप रहना भी एक जवाब होता है... एक अवॉर्ड शो. एक हल्का-सा मज़ाक. कुछ सेकेंड की बात. लेकिन असर लंबा.
सोशल मीडिया पर माफी आई. शब्द सीधे थे. लहजा झुका हुआ था. लेकिन उसके बाद जो आया, वो शब्दों में नहीं था.
ऐसा नहीं है कि फर्क नहीं पड़ा. फर्क तो पड़ता है- पड़ा भी… कुछ दरवाज़े जो पहले खुले थे, अब उतनी आसानी से नहीं खुले. कुछ फोन जो पहले बजते थे, अब देर से बजने लगे.
अरिजीत ने कभी सफाई नहीं दी. कभी शिकायत नहीं की. उन्होंने सिर्फ गाना चुना.

फिर भी तुमको चाहूंगा... क्योंकि कभी-कभी इंसान को खुद को बचाने के लिए बहस नहीं, खामोशी चाहिए. और उस खामोशी ने उनकी आवाज़ को और गहरा कर दिया.
लाइव कॉन्सर्ट - जब आवाज़ सामने आईइलाही मेरा जी आए आए... हज़ारों मोबाइल लाइट्स. एक स्टेज. और एक आदमी.
कोई ड्रामा नहीं. कोई दिखावा नहीं. सिर्फ आवाज़. लोग रोते थे. मुस्कुराते थे. एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते थे.
भीड़ के बीच खड़े होकर भी कोई कितना अकेला हो सकता है, ये वहीं समझ आता है.
फैंस - अनकही बातचीतकिसी ने कहा - आपके गाने ने मुझे टूटने से बचा लिया.
किसी ने कहा - आपकी आवाज़ में मैंने खुद को पहचाना.
किसी ने कहा - आपके बिना मेरी शादी अधूरी थी.
जब लोग आपको अपना मान लें, तो आप खुद के नहीं रह जाते.
परिवार - जहां अरिजीत रुकते हैंघर…मां. बहन. पत्नी. बच्चे. जियागंज. स्टार बनकर भी वहीं लौट जाना, जहां से चले थे. यही उनका सबसे बड़ा बयान था.
कभी-कभी सबसे बड़ी कामयाबी यही होती है कि इंसान अपने घर जैसा बना रहे. अरिजीत के लिए भी कामयाबी की परिभाषा कुछ ऐसी ही थी.

अच्छा चलता हूं, दुआओं में याद रखना… ये लाइन कभी किसी फिल्म के किरदार ने कही थी. लेकिन आज ये लाइन अरिजीत सिंह की आवाज़ से निकलकर करोड़ों लोगों की आवाज़ बन गई है.
नए प्लेबैक असाइनमेंट नहीं लेने का फैसला अचानक लिया गया फैसला नहीं लगता. इसमें थकान नहीं है. इसमें नाराज़गी नहीं है. इसमें कोई शिकायत नहीं है.
इसमें एक लंबा सफर है. एक ऐसा सफर, जिसमें तालियां भी मिलीं, सन्नाटा भी मिला. जिसमें प्यार भी मिला, दबाव भी मिला. जिसमें हर तरफ आवाज़ गूंजी, लेकिन भीतर कहीं एक आदमी चुपचाप चलता रहा.
अरिजीत फिल्मों से जा रहे हैं. दिलों से नहीं. क्योंकि दिलों से कोई कैसे जाए. जिसकी आवाज़ पर किसी ने पहली बार रोना सीखा. जिसकी आवाज़ पर किसी ने खुद को संभाला. जिसकी आवाज़ पर किसी ने किसी को माफ़ किया.
ये विदाई उस तरह की नहीं है, जहां दरवाज़ा बंद हो जाता है. ये विदाई उस तरह की है, जहां इंसान थोड़ा पीछे हटकर सांस लेना चाहता है.
शायद अब वो गाएंगे, लेकिन कैमरे के लिए नहीं. शायद अब वो गाएंगे, लेकिन किसी कहानी के लिए नहीं. शायद अब वो गाएंगे, सिर्फ अपने लिए.
और जब कभी सालों बाद कहीं अचानक कोई गाना बज जाए. किसी चाय की दुकान पर. किसी बस स्टॉप पर. किसी पुराने फोन की प्लेलिस्ट में. और आंखें बिना वजह नम हो जाएं. तो समझ लेना कि ये विदाई नहीं है. फिर ले आया दिल...

अरिजीत सिंह होना मतलब सिर्फ सुर में गाना नहीं. अरिजीत सिंह होना मतलब किसी और का दर्द अपनी आवाज़ में ढोना. मतलब भीड़ के सामने खड़े होकर भी खुद से लड़ते रहना. मतलब शोहरत के बीच सादगी को बचाए रखना.
इस देश में बहुत से सिंगर आए. बहुत सी आवाज़ें आईं. लेकिन कुछ आवाज़ें आदत बन जाती हैं. कुछ आवाज़ें छूटती नहीं. अरिजीत सिंह वैसी ही आवाज़ हैं. जो फिल्मों में भले न गूंजे. लेकिन जब भी दिल भारी होगा, कहीं न कहीं कोई न कोई गुनगुनाएगा.
तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल…
वीडियो: अरिजीत करोड़ों के गाने क्यों ठुकरा देते हैं? अमाल मलिक ने बताई वजह

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