दिल्ली में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं. तीनों पर सांसद कांग्रेस के थे.(उनके नाम- परवेज़ हाशमी, करण सिंह और जनार्दन द्विवेदी) ये तीनों थे ही रहेंगे,क्योंकि अब कांग्रेस के पास दिल्ली विधानसभा में ज़ीरो सीट हैं. तीन भी तिली-लिलीधप्पू बराबर हैं, इसीलिए बीजेपी भी खींसे निपोरे. 67 के साथ आम आदमी पार्टी के पासतीनों सीटें जानी तय हैं. जो विधायक नाराज हैं, वो भी कुछ न कबाड़ पाएंगे, क्योंकिव्हिप मने चाबुक की चुस्की उनको भी चखनी होगी.पर मसला ये है कि पिछले दो हफ्ते से ये तीन तेरह में बदल चुके हैं. नए-नए नाम चलरहे हैं. चलवाए जा रहे हैं. हमने सब झारन-पछोरन एक जगह कर दी. आप भी देख लो. कित्तेसांसदाकांक्षी हैं आम आदमी पार्टी में. और इसमें हमने RBI के पूर्व गवर्नर रघुरामराजन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर का नाम नहीं रखा है, क्योंकिवो लोग केजरीवाल को 'थैंक्यू वेरी मच, एम नॉट इंटरेस्टेड' कह चुके हैं.तो ये रहे 13 नाम, जिन्हें खूब उछाला गया. बाकी तो अरविंद केजरीवाल और मनीषसिसोदिया अंडमान निकोबार में पार्टी कर रहे हैं. जब लौटेंगे, तब पार्टी को भभ्भड़का नया मसाला देंगे. तीन तिलंगे चुनकर.#1. मीरा सान्यालमीरा सान्यालएक्स बैंकर. रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की मुखिया रहीं. पिता जी वाइस एडमिरल रहे. खूबप्रतिष्ठित फौजी. मीरा एनजीओ में खूब सक्रिय हैं. 2014 में साउथ मुंबई की लोकसभासीट से चुनाव लड़ीं और हारीं. 'आप' की नेशनल एग्जिक्यूटिव की मेंबर हैं. मगर इसकीदिल्ली वाली सियासत में न तो दखल रखती हैं और न ही दिलचस्पी दिखाई है पिछले तीनसालों में.एक बात और- 2014 मीरा का पहला चुनाव नहीं था. बैंक की नौकरी में रहते हुए भी वह2009 में साउथ मुंबई की सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ी थीं. उन्होंने मुरली देवड़ा केबेटे मिलिंद देवड़ा को चुनौती दी थी और 10 हजार से ज्यादा वोट पाए थे.#2. इमरान प्रतापगढ़ीइमरान प्रतापगढ़ीउर्दू के कुमार विश्वास. हालांकि, इमरान इस परिचय को पसंद नहीं करते. असली नाममोहम्मद इमरान खान. रहने वाले यूपी के प्रतापगढ़ जिले के हैं, सो वही तखल्लुस में आजुड़ा. जैसे कुमार विश्वास शुरुआती दौर में कैंपस में पॉपुलर हुए, फिर सोशल मीडियाने उन्हें लोकप्रिय बनाया, वैसा ही ग्राफ इमरान का बन रहा है.कुमार की तरह इमरान ने भी हिंदी साहित्य की पढ़ाई की है. उनकी दोनों भाषाओं मेंअच्छी पकड़ है और देश-विदेश के मुशायरों में खूब धमक है. कपिल मिश्रा के ट्वीट केबाद उनके नाम पर खूब चर्चा छिड़ गई. पर ज़्यादातर लोग इसे भी सोशल मीडिया का एकसुरगा भर मानते हैं.एक बात और- मर्द-ए-मुजाहिद, अकबरुद्दीन ओवैसी के लिए शेर पढ़ते हुए ये कहते थेइमरान. बाद में कांग्रेस के खेमे में चले गए और ओवैसी की जोरदार मुख़ालफत करने लगे.#3. कुमार विश्वासअरविंद केजरीवाल के साथ कुमार विश्वासपिलखुवा के लाल. 47 साल के हो गए हैं. 47 में देश आजाद हुआ था. क्या अब कुमार भी'आप' से आजाद होंगे. नाराज मत होइए, कुमार विश्वास यूं ही तुक बनाते हैं. वहीइकलौते बचे हैं 'आप' और उसकी नियंता संस्था PAC में, जो अरविंद केजरीवाल को अरविंदकहते हैं और मनीष सिसोदिया को मनीष. 'जी' का भी लोड नहीं. काहे? क्योंकि मनीष बकौलविश्वास, 'बचपन का यार है'.यार और प्यार अपनी जगह, कुमार को 'आप' में खुड्डेलाइन कर दिया गया है. वह ट्विटर परलिखते हैं, 'मैं अभिमन्यु'. औऱ लिखते हैं, 'पहले देश, फिर दल, फिर व्यक्ति'. इनसबसे सहानुभूति और रिट्वीट मिलते हैं, अरविंद केजरीवाल का आशीर्वाद नहीं. और उसकेबिना राज्यसभा नहीं.कई कहते हैं कि केजरीवाल अपनी पार्टी में किसी भी और भीड़-खींचक को तभी तक झेलेंगे,जब तक वह उनके झंडे तले रहे. वरना सिपहसालार निपटा देंगे. कभी अमानतुल्ला खान, कभीदिलीप पांडे बयान बाण मार छलनी किए रहते हैं कुमार को. अब उनकी गति प्रशांत भूषण औरयोगेंद्र यादव होने की आ गई है, ऐसा भी सुधीजन मानते हैं.अमानतुल्लाह खानएक बात और- कुमार विश्वास बीजेपी को वोट देते हैं. ये बात हम नहीं कह रहे. उन्होंनेकही थी. एक जलसे में वह बोले थे, 'राजनाथ सिंह को सांसद बनाने में एक वोट मेरा भीहै और यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं'. फिर वह आम आदमी पार्टी में आ गए औरशाज़िया इल्मी उम्मीद करती हैं कि 2014 में उन्हें वह वोट मिला होगा.#4. अरुण शौरीअरुण शौरी76 साल के धुरंधर. जालंधर की पैदाइश. दिल्ली और विदेश की पढ़ाई. वर्ल्ड बैंक कीनौकरी करते थे. तभी इंडियन एक्सप्रेस में लिखना शुरू किया. फिर इसी के संपादक होगए. निर्भीक पत्रकारिता की. कई मुख्यमंत्री और मंत्री निपटे उनके दौर में. रेमनमैगसेसे अवॉर्ड पाया संपादक बनने के तीन साल के अंदर. साल था 1982.एनडीए के दौर में खुलकर सियासत में आए. यूपी से दो बार बीजेपी ने राज्यसभा भेजा.1998 से 2010 तक. विनिवेश मंत्री के तौर पर अटल सरकार में शानदार काम किया. 2009में आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए हारा, तो सवाल उठाए. मोदी का शुरुआती दौर मेंस्वागत किया, मगर अब उनकी सरकार को यूपीए प्लस काऊ कहते हैं. 'आप' के डिजिटल कमांडरअंकित लाल की किताब के विमोचन पर अरविंद केजरीवाल के साथ मंच शेयर किया. उसके बादही उनको 'आप' की तरफ से राज्यसभा भेजने की बात शुरू हो गई.एक बात और- शौरी ने अपने दो टर्म की पूरी सांसद निधि IIT कानपुर को दे दी थी. पहलेटर्म में इस पैसे से बायो साइंस के डिपार्टमेंट बने. दूसरे टर्म से एनवायरनमेंटसाइंस के.#5. यशवंत सिन्हायशवंत सिन्हापटना यूनिवर्सिटी से 1958 में पॉलटिकल साइंस में एमए किया, फिर दो साल वही सब्जेक्टवहीं पढ़ाया. IAS बने. बिहार, दिल्ली और विदेश रहे. रिटायर होने के पहले ही इस्तीफादे दिया. चंद्रशेखर के खास थे, सो जनता पार्टी में आ गए. 1988 में राज्यसभा सांसदबने और 1990 में चंद्रशेखर की सरकार में वित्त मंत्री. कुछ बरस बाद बीजेपी में आगए. अटल ने उन्हें 1998 से 2002 तक वित्त मंत्री रखा. संघ उन्हें हटाने पर अड़ा, तोविदेश महकमा दे दिया. हजारीबाग को भी पिया बिदेसिया लगे और 2004 में चुनाव हरादिया. 2014 में बेटे के लिए सीट छोड़ी. बेटा जीता, मंत्री बना, मगर बाप बागी होगया. अरुण शौरी की लीग में आ गया.'आप' को आर्थिक मामलों का जानकार चाहिए. रघुराम नहीं, तो शौरी सही. शौरी नहीं, तोयशवंत सही. लेट्स सी. हालांकि, उम्मीद कम है.एक बात और- यशवंत सिन्हा ने बजट से जुड़ी एक फालतू परिपाटी खत्म की थी. पहले बजटहमेशा शाम के 5 बजे पेश होता था. क्यों, क्योंकि आजादी के पहले बजट ब्रिटेन कीसहूलियत के हिसाब से पेश किया जाता था. ब्रिटिश पार्लियामेंट में उस वक्त सुबह के11.30 बज रहे होते थे. सिन्हा ने 53 साल पुरानी रवायत को खत्म किया और सुबह बजट पेशकिया.#6. आशुतोषआशुतोषपैदाइश या मार्क्सशीट का नाम, आशुतोष गुप्ता. जाति-विरोधी सो गुप्ता त्याग दिया.केजरीवाल के खास. राजनीतिक आका इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में थे और आशुतोष के पापाभी. ये जबरदस्ती का कनेक्शन है. असल मामला ये है कि आशुतोष ने JNU से पढ़ाई की. फिरआज तक में आ गए. उसके बाद तरक्की हुई और IBN 7 के मैनेजिंग एडिटर हो गए.इसी दौरान अन्ना आंदोलन शुरू हुआ. आशुतोष ने जोरदारी से कवरेज की. फिर किताब भी लिखडाली अन्ना क्रांति के नाम से. फिर जनवरी 2014 में 'आप' में शामिल हो गए. खूबइल्ज़ाम लगे कि संपादक रहते हुए निष्पक्ष कैसे रहे होंगे. आशुतोष को फर्क नहींपड़ा. कुछ महीने बाद चांदनी चौक से लोकसभा के लिए मैदान में थे. हारे, मगर कपिलसिब्बल को तीसरे नंबर पर धकेल दिया.उसके बाद लगातार केजरीवाल के लिए निष्ठावान रहे. उनके फैसलों पर उंगली नहीं उठाई,संगठन के लिए काम किया और अब इनाम की उम्मीद कर रहे हैं.एक बात और- शुरुआती टीवी दौर में आशुतोष की एक पहचान कांशीराम से तमाचा खाने वालेपत्रकार की भी रही. वह आज तक में थे और कांशीराम के आवास पहुंचे थे. तभी नेता औरपत्रकार के बीच ये टकराव हुआ. हालांकि, बाद में दोनों में सुलह हो गई.#7. संजय सिंहसंजय सिंहसुल्तानपुर के रहने वाले. कोई कहता है कि मकैनिकल इंजीनियरिंग की, कोई कहता है किमाइनिंग में डिप्लोमा किया. NGO सेक्टर के जरिए राजनीति बनाई. इंडिया अगेंस्टकरप्शन के दौरान अन्ना हजारे से जुड़े. फिर वहां से अरविंद केजरीवाल की तरफ सरकलिए. कभी चुनाव नहीं लड़े और संगठन का काम करने के नाम पर बॉस के खास हो गए. कितनेखास? PAC में हैं. पंजाब के प्रभारी रहे और अब सबसे पहला नाम उन्हीं का फाइनल हुआबताया जा रहा है.संजय हमेशा फुल टाइम राजनीति करना चाहते थे और यह उनके लिए बड़ी सफलता है. तमामइल्ज़ाम एक तरफ, केजरीवाल का साथ एक तरफ. कभी सपा के सुल्तानपुर से विधायक रहे अनूपसंडा के खास थे. संडा अब विधायक भी नहीं और उनका पूर्व चेला सांसदी की तैयारी मेंहै.एक बात और- दिल्ली के सुरगेबाज कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल से संजय सिंह को कुमारविश्वास ने मिलवाया था. मनोज तिवारी की गाड़ी में बिठाकर रामलीला मैदान ले गए थेसंजय को अरविंद. आज देखिए वक्त का सितम.#8. आतिशी मरलेनाआतिशी मरलेनामम्मी हिंदू कॉलेज में पढ़ाती थीं. बेटी भी अकैडमिक-एक्टिविस्ट होना चाहती थी. मगरऑक्सफर्ड की पढ़ाई बीच में छोड़ आ गई. असल भारत में काम करने. आंध्र प्रदेश के ऋषिवैली स्कूल में अध्यापक बनीं और जीवनसाथी से भी मिलीं. शिक्षा के क्षेत्र मेंप्रयोग करती रहीं. फिर समझ आया कि नीचे से कितना बदलाव करें, जब ऊपर पहाड़ जमा हो.आम आदमी पार्टी से जुड़ीं. एंट्री हुई प्रशांत भूषण के जरिए. योगेंद्र यादव कासंरक्षण हासिल हुआ. मगर जब इन्हीं दोनों की कट्टी हो गई केजरीवाल से, तो आतिशी काभी प्रवक्ता पद चला गया. मगर वह जुटी रहीं और फिर से केंद्र के करीब आ गईं. अबडिप्टी सीएम की अडवाइज़र हैं और दिल्ली के स्कूलों में अच्छा काम कर रही हैं.एक बात और- आतिशी जब ऑक्सफर्ड में थीं, तब एंटी वॉर प्रोटेस्ट में शामिल हुईं.लाखों लोग लंदन में सड़कों पर उतरे. फिर भी इराक वॉर हुआ. उनका मन खिन्न हो गया औरपीएचडी अधूरी छोड़ भारत लौट आईं.#9. दिलीप पांडेदिलीप पांडेहॉन्गकॉन्ग के IT एक्सपर्ट. अन्ना आंदोलन के दौरान सक्रिय हुए. लोकसभा चुनाव के बाददिल्ली का कनवीनर बनाया गया. यानी 67-3 वाली जीत में उनका भी रोल रहा. जब अप्रैल2017 में आप MCD हारी, तो नैतिक जिम्मेदारी ईटीसी हुई और दिलीप ने इस्तीफा दिया.पार्टी प्रवक्ता अब भी हैं और PAC में भी हैं. केजरीवाल की शह पर दिग्गजों कोदुरुस्त करते रहते हैं बयान देकर. मसलन, कुमार विश्वास पर इल्ज़ाम लगाया कि वहवसुंधरा सरकार के खिलाफ पर्याप्त आक्रामक नहीं हैं.एक बात और- आंदोलन के दौरान अपनी पत्नी प्रियंका से मिले. आंदोलन और इश्क पर नॉवेलभी लिख मारा- दहलीज पर दिल.#10. दुर्गेश पाठकदुर्गेश पाठकगोरखपुर के शिकोहरा गांव के रहने वाले. 40 एकड़ खेती वाले काश्तकार. बाबू जी कासपना कि बेटा IAS बने. बेटा दुर्गेश इलाहाबाद से इंग्लिश में MA कर दिल्ली आ गए.UPSC की तैयारी करने. फिर अन्ना आंदोलन, फिर अरविंद. शुरुआती दौर में ट्यूशन कर कामचलाया. कमरे का खर्चा बचाने के लिए पार्टी दफ्तर में रहे. पंजाब में पहला बड़ा रोलमिला. संगठन प्रभारी बना भेजे गए. सुच्चा सिंह छोटेपुर से भिड़ गए. अरविंद का पूराहाथ और साथ रहा. संजय सिंह के भी खास हैं. इसीलिए 'आप' की टॉप बॉडी यानी PAC केसबसे यंग मेंबर हैं.एक बात और- दुर्गेश चे ग्वेरा के भारी फैन हैं. हर जगह उनकी तस्वीर. मगर अरविंदकेजरीवाल को चे ग्वेरा से ज़्यादा महान मानते हैं. बकौल दुर्गेश, अरविंद ने अहिंसकढंग से क्रांति की इसलिए.#11. नारायण गुप्तानारायण गुप्ताCA हैं. CA लोगों के नेता भी. इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया के वाइसचेयरमैन. कई किताबें भी लिखीं. अपने ही ट्रेड में. GST के बड़े जानकार माने जातेहैं एनडी गुप्ता. 68 साल के हैं. अरविंद केजरीवाल के साथ NGO परिवर्तन के वक्त सेजुड़े हुए हैं. दो साल से AAP का खाता-बही देख रहे हैं. आर्थिक मामलों वाली लिस्टमें ये नया नाम उछला है, 3 जनवरी की मीटिंग से 24 घंटे पहले. खासी जोरदारी से.#12. सुशील गुप्तासुशील गुप्तादिल्ली छाप समाजसेवी. स्कूल-अस्पताल चलाते हैं. बिरादरी वाले संगठनों में भी सक्रियहैं. इनका पूर्व कांग्रेसी हैं. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव हार चुके हैं. दिल्लीमें इनके करीब 10 चैरिटेबल हॉस्पिटल चलते हैं. कहा ये भी जा रहा है कि इन्हें 2013में AAP ने मोतीनगर सीट से टिकट का ऑफर दिया था, जिसे इन्होंने मना कर दिया था.इनका नाम भी इधर 24 घंटे में ही आया. और आए ट्विटर पर पुराने फोटो. जिसमें वह'केजरीवाल हिसाब दो' वाले बैनर में बतौर निवेदक दर्ज हैं.#13. अरविंद केजरीवालअरविंद केजरीवालदिल्ली की गप्प है, सुन लेनी चाहिए. अरविंद केजरीवाल दिल्ली सौंपें मनीष सिसोदियाको. खुद पहुंचें राज्यसभा में. नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ हमलावर हों और खुद कोतीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर स्थापित करें. मोर्चे को एक सिटिंग सीएम चाहिए.हिंदी पट्टी का. नीतीश कुमार तो एनडीए में चले गए. ममता दीदी को कौन सुनेगा औरअखिलेश यादव एक्स हो गए.एक बात और- राघव चड्ढा बुरा न मानें. दावेदार वह भी हो सकते थे, मगर राज्यसभा कासदस्य बनने के लिए 30 साल का होना ज़रूरी है.--------------------------------------------------------------------------------यहां तक आए हैं, तो ये भी पढ़ें:किसानों के हक में खड़े यशवंत सिन्हा की गिरफ्तारी बताती है कि देश में रामराज्य आगया हैएक इंटरव्यू और कुमार विश्वास ने बीजेपी, कांग्रेस, राहुल, लालू, केजरीवाल सबको धोडालाकश्मीर, कुलभूषण और केजरीवाल पर कुमार विश्वास का 'बोल्ड' वीडियोAAP के नेता दुर्गेश पाठक कौन हैं, जिनसे मिलने के 10 लाख रुपये लगते हैं!