जेएनयू, जहां हर स्टूडेंट एक आवाज है
जेएनयू से ये 10 बातें सीखनी चाहिए हर यूनिवर्सिटी को.

1.
जेएनयू के एंट्रेंस प्रोसेस में इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि कोई ऐसा काबिल स्टूडेंट न हो जो माइनॉरिटी या पिछड़ी हुई जगहों में रहने के कारण छूट जाए. इसलिए रिजर्वेशन के अलावा कुछ नियम बनाए गए हैं. जैसे लड़कियों और पिछड़े इलाकों से आने वालों को मिलते हैं एंट्रेंस एग्जाम में 5 पॉइंट एक्स्ट्रा. इस तरह उन स्टूडेंट्स को भी मौका मिलता है जो ऐसे घरों से आते हैं जिनके घरों की कमाई बहुत कम होती है. इनमें ऐसे भी स्टूडेंट होते हैं जो 10-10 किलोमीटर चल कर स्कूल जाया करते थे. कुछ ऐसे होते हैं जो कभी किसी बड़े स्कूल में नहीं गए होते, मदरसों में पढ़े होते हैं. शायद ही ऐसा कोई कॉलेज हो जहां देश के हर छोटे-बड़े शहर से युवा पढ़ने आते हों. हालांकि लड़कियों को एक्स्ट्रा पॉइंट देना यूनिवर्सिटी में एक बड़ा बहस का मुद्दा है.
2.
एडमिशन का तरीका जितना आसान है, कैंपस के अंदर लोग उतने ही मददगार. मिल के लगता ही नहीं सीनियर हैं. क्योंकि उनका सीनियरपन रैगिंग नहीं, मदद में दिखता है. जब तक स्टूडेंट को हॉस्टल न मिल जाए, सीनियर उसे अपने कमरे में रखते हैं. जेएनयू के दोस्त बताते हैं कि अगर रहने की जगह न मिल रही हो, तो आप किसी भी कमरे का दरवाजा खटखटा के पूछ सकते हैं कि उनके पास जगह मिल सकती है या नहीं. लोग अक्सर नए लोगों को कमरे में अटा लेते हैं.
3.
अगर आप के अंदर इतना बूता हो कि आप जेएनयू का एंट्रेंस क्लियर कर सकें, तो सरकार आगे सब हैंडल कर लेती है. मतलब ये कि आपकी पढ़ाई सब्सिडाइस्ड होती है. 250 रुपये हुई फीस. और उतना ही हॉस्टल का किराया. और सबसे बढ़िया बात यहां की मेरिट-कम-मीन्स स्कॉलरशिप. जो उन स्टूडेंट्स को मिलती है जिनके परिवार की कुल कमाई ढाई लाख रुपये साल से कम होती है.
4.
यहां ईंटा-मार पॉलिटिक्स नहीं होती. पॉलिटिक्स करने वाले वो नहीं होते जिनके बाप-दादा पक्का नेता रहे हों. पॉलिटिक्स करने वालों को देश दुनिया की समझ बनानी पड़ती है. पढ़ाई करनी पड़ती है. क्योंकि यहां नेता जाति से नहीं, दिमाग से चुने जाते हैं.
5.
इसीलिए करनी पढ़ती है पढ़ाई. क्योंकि चुनाव में खड़े होने वाले कैंडिडेटों को देनी पड़ती है स्पीच. फिर जनता यानी स्टूडेंट उनसे करते है सवाल. और आपस में भी करती है कैंडिडेट के ऊपर बहस. रात को चलती है डिबेट किसी जश्न की तरह. लोग शोर करते हैं, ढोलक बजाते हैं. और खुद का जेएनयू में होना सेलिब्रेट करते हैं.
6.
यहां पैम्फलेट सस्ते प्रचार के लिए नहीं होते. इनमें तर्क होते हैं. विचार होते हैं. और डिस्कशन के लिए मसाला होता है. इन्हें दीवारों पर चिपकाया जाता है, पर्सनली बांटा जाता है. ये अपनी बात रखने और अपना स्टैंड क्लियर करने का एक जरिया होते हैं. पैम्फलेट लिखने वाले के सेंटिमेंट होते हैं इनमें. और इन्हें कोई मौज में हवा में नहीं उड़ाता. ये सिर्फ चुनाव के समय नहीं, पूरे साल दिखते हैं. और कभी-कभी वाटर कूलर पर चिपके पैम्फलेट के बगल में चिपका "कमरा नंबर 246 से मेरी नीले रंग की रबड़ की चप्पल गायब हो गयी हैं" भी दिख जाता है. :-)
7.
सिर्फ खाना खाने के लिए नहीं होती मेस. पब्लिक मीटिंग होती हैं यहां जो शाम को या डिनर के बाद होती हैं. सारे मामले मेस में निपटने हैं. नेता हो या या अभिनेता, जेएनयू आता है तो मेस में ही स्टूडेंट्स से मिलता है. बिना परमिशन, बिना टिकट, कोई भी इन डिस्कशन में आ सकता है. अक्सर ये डिस्कशन स्टूडेंट्स से लबालब भरे रहते हैं. न स्टेज, न पेडेस्टल, सारी बातें बराबरी पर.
8.
सुकून से खाना और चाय तो ले ही सकते हैं आप यहां. इसके अलावा नए स्टूडेंट्स के लिए ये जगह बहुत कुछ सिखाती है. यहां होने वाली बातें, मिलने वाले सीनियर स्टूडेंट की ट्रेनिंग का हिस्सा बन जाते हैं. क्लासरूम से ज्यादा पढ़ाई तो ढाबों पर होती है.
9.
रात भर यहां घूम सकते हैं. पूरे कैंपस में. खासकर लड़कियां. कोई आंख उठाकर देखता भी तो तो बस हेलो करने के लिए. रात 12 बजे तो यहां शाम होती है.
10.
लड़के-लड़कियां रहते हैं एक ही बिल्डिंग में. प्रोग्रेसिव और लिबरल होने का इससे बड़ा सबूत कहीं और नहीं मिलता. और ये यहां कोई बड़ी बात नहीं है. बिलकुल नॉर्मल चीज है.
इस आर्टिकल को लिखने में मदद करने के लिए दोस्त और जेएनयू की एक्स-स्टूडेंट रीति सिंह को बड़ा वाला थैंक यू. सभी तस्वीरें फेसबुक पेज JNU New Delhi से.

