'प्रशांत किशोर, नेताजी (मुलायम सिंह यादव) से मिले थे. लेकिन मेरे लिए बड़ा सवालये है कि उन्हें नेताजी से मिलवाया किसने था? वो तो कांग्रेस को आगे बढ़ा रहे थे.लेकिन लोकतंत्र में अच्छे सुझाव स्वीकार किए जाने चाहिए. मैंने उनसे कहा कि वैसे तोहम बहुमत की सरकार बना रहे हैं, लेकिन अगर आपका फॉर्मूला तैयार हो जाए, तो हम 300से ज्यादा सीटें जीतेंगे. गठबंधन में किसी न किसी को स्वीकार करना पड़ेगा कि उसकीसीटें कम होंगीं. घाटा देखेंगे, तो गठबंधन नहीं होगा. फैसला कांग्रेस को लेना है.'--------------------------------------------------------------------------------ये बयान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बीते 2 दिसंबर को दिया था.ज्यादातर मुलायम लहजे में बात करने वाले अखिलेश ने उस दिन कई कड़े संदेश दिए थे.'पीके को नेताजी से किसने मिलवाया' पूछकर वो ये जताने से हिचके नहीं कि नई सपा मेंउनकी सहमति (मंजूरी) जरूरी है.2017 आते-आते अखिलेश कुछ विवाद के साथ पार्टी अध्यक्ष हो गए हैं. शिवपाल-अमर खेमाकमजोर पड़ा है और अब सूत्रों से खबर भी आ गई है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन भी अपनेआखिरी चरण में हैं. प्रियंका-अखिलेश के बीच बातचीत हो रही है और 9 जनवरी कोराहुल-अखिलेश की मुलाकात हो सकती है.यूपी की राजनीति में एक नौजवान मोर्चा बन रहा है. इस चुनाव की दिलचस्पी 2017 से2019 तक भी जाएगी, इसकी पूरी संभावना है. लेकिन, फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि अगरसपा-कांग्रेस का गठबंधन होता है तो असल फायदा और असल नुकसान किसे होगा?आइए देखते हैं:कांग्रेस: फिलहाल कोई और विकल्प नहींसाल 1989 से कांग्रेस यूपी से साफ होना शुरू हो गई थी. उसके सिर्फ 100 विधायक बचेथे. 91 में आंकड़ा आधा रह गया और 93 में तीन दर्जन. फिर 96 में कांग्रेस ने बसपा सेगठबंधन कर लिया और ये उसकी बड़ी गलती थी. 7 साल पहले सरकार चला रही कांग्रेस, अब एक12 साल पुरानी पार्टी की जूनियर पार्टनर थी. इस बार भी कमजोर संभावनाओं की मारीकांग्रेस फिर जूनियर पार्टनर बनने को आतुर है. 96 में विधायकों के लिहाज से तोकांग्रेस को कोई नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन हर जिले-तहसील में उसके संगठन को झटकालगा था. उसके नेता ऐसी सीटें ढूंढ रहे थे, जहां कोई साझेदार दावा न करे और उसकावोटर छितरा चुका था.फिर भी, सपा से गठबंधन कांग्रेस के लिए एक असरदार एंटीबायोटिक साबित हो सकता है.बीमारी दूर नहीं होगी, पर क्षणिक आराम मिल सकता है. अगर सपा की पिछलग्गू बनकर वहसरकार में पार्टनर बन जाए, या केवल भाजपा को सत्ता से दूर ही रख सके तो बड़ी बातहोगी. गठबंधन की सूरत में कांग्रेस को 90-105 सीटें मिलेंगी ही. हो सकता है कि वो2012 चुनावों से बेहतर कर जाए. लेकिन दूरगामी भविष्य की बात करें तो जूनियर पार्टनरके तौर पर अपना वजूद स्वीकारना कोई अच्छा संकेत तो नहीं है. पर राहुल गांधी करेंक्या? अभी भाजपा को रोकना जरूरी है और इसके लिए जैसा एंटीबायोटिक लेना हो, वह तैयारहैं. कांग्रेस ने सोच-समझकर ब्राह्मण को मुख्यमंत्री कैंडिडेट बनाया है, ताकिभाजपा के पारंपरिक वोट काटे जा सकें. मुस्लिम या दलित वोट तोड़ने में उसकी खासदिलचस्पी नहीं है. वह पहले से ही भाजपा विरोधी पार्टियों की मदद करती दिखती है.कांग्रेस अभी स्वतंत्र तौर पर 'कांग्रेस मुक्त भारत' का प्रतिवाद करने की स्थितिमें नहीं है. उसके लिए यह कुर्सी की लड़ाई है ही नहीं, इसलिए ज्यादा कुछ खोने केलिए नहीं है. बचा-खुचा बचा लेने की लड़ाई है, बस.बीजेपी: थोड़ा सा नुकसान होगा, पर उतना ही काफी होगाभाजपा कभी नहीं चाहेगी कि सपा और कांग्रेस का गठबंधन हो. भाजपा का प्रदर्शन कुछ हदतक इस पर निर्भर करता है कि प्रदेश के 18 फीसदी मुसलमान वोट सपा-बसपा में बंटें.लेकिन सपा-कांग्रेस मिल जाते हैं तो परसेप्शन के लिहाज से मुसलमानों के लिए ये एकविश्वसनीय मोर्चा हो सकता है. तब बहुत संभावना है कि ज्यादातर मुसलमान सपा-कांग्रेसगठबंधन के पक्ष में जाएं. भाजपा के लिए ये अप्रिय स्थिति होगी.चाल तो चाल है. खेल दी गई तो आपको प्रतिचाल के बारे में सोचना है. गठबंधन के बादभाजपा के लिए एकमात्र सुखद स्थिति तब बनेगी जब मुस्लिम-यादव गठजोड़ के पैरलल किसीतरह हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए. मुसलमान अगर गठबंधन की तरफ जाएगा तोभाजपा ओबीसी और अन्य हिंदुओं को किसी तरह आकर्षित करना चाहेगी.ये गठबंधन न हो पाए तो प्रदेश में मुस्लिम वोटों के तीन अलग दावेदार होंगे.सपा-कांग्रेस और बसपा. ऐसे में भाजपा की राह आसान होगी. विधानसभा चुनावों मेंदो हजार वोट भी काफी वज़न रखते हैं.बीएसपी: सबके भरोसेअखिलेश के मजबूत होने से बसपा की संभावनाएं कमजोर हुई हैं. मायावती का जोरमुसलमानों और सवर्णों पर हैं. उन्होंने 113 सवर्णों, 106 ओबीसी, 97 मुसलमानों और 87दलितों को टिकट दिए हैं. 113 सवर्णों में से 66 ब्राह्मण हैं. मायावती अपनी पार्टीको 'बहुजन' से 'सर्वजन' की तरफ ले जा रही हैं और हर वोट बैंक में सेंध मारना चाहरही हैं.अगर सपा बिखरे और कमजोर हो जाए तो बसपा को बिलाशक फायदा है. उसे कुछ मुसलमान वोटमिल सकते हैं. तब वह भाजपा के साथ मुख्य मुकाबले में आ सकती है. लेकिन मायावती कीमुश्किल ये है कि सपा टूट के साथ अखिलेश की छत्रछाया में मजबूत होती दिख रही है.कांग्रेस और सपा के गठबंधन से भाजपा के साथ बसपा को भी काफी नुकसान होने के आसारहैं.अभी के चुनावी समीकरणों के मुताबिक, बीएसपी का भविष्य उसकी खुद की रणनीतियों पर कमऔर दूसरी पार्टियों को हश्र पर ज्यादा निर्भर है.सपा: पार्टी से ज्यादा अखिलेश को फायदासपा की संभावनाएं तलाशने से पहले बड़ा सवाल यही है कि पार्टी किसके हाथ में रहेगी.अगर सपा टूटी तो इससे सिर्फ अखिलेश को फायदा होता दिख रहा है. वो बीजेपी के खिलाफएक मजबूत स्तंभ बन जाएंगे और अगर उन्हें कांग्रेस का साथ मिला, तो वो 2019 मेंबीजेपी-विरोधी अलायंस का चेहरा भी बन सकते हैं. पिता से अलग होकर अखिलेश के पासयुवाओं और महिलाओं के वोट मांगने का भी मौका होगा, क्योंकि अभी तक उन्होंने लैपटॉप,साइकल और विकास की ही 'राजनीति' की है.सपा टूटती है तो मुलायम-अमर-शिवपाल कैंप बेहद कमजोर हो जाएगा और काफी हद तक चुनावमें दर्शक की भूमिका में होगा. मौजूदा दौर में तो यही दिख रहा है कि पार्टी रहे याटूटे, सब कुछ अखिलेश के हाथ में रहेगा. 'पार्टी कैसे चलेगी' से लेकर कांग्रेस केसाथ गठबंधन तक, निगाहें अखिलेश पर ही रहेंगी. अभी उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिमसांसद नहीं है और सपा का ओबीसी-मुस्लिम वोटबैंक मजबूत है. अखिलेश को तकनीकी तौर परकांग्रेस से दोस्ती का कोई बड़ा फायदा भले ही न मिले, लेकिन परसेप्शन के स्तर पर येएक अहम मोर्चा होगा, जिसका विस्तार भविष्य तक हो सकता है. अंदरखाने ये चर्चाएं भी हैं कि अगर लखनऊ अखिलेश के पास रहा, तो दिल्ली की लड़ाई मेंराहुल को कुछ वक्त और मिल जाएगा. बाकी मुलायम सिंह यादव की ख्वाहिश तो किसी से छिपीनहीं है. क्या पता बेटे के साथ से वो अपने राजनीतिक जीवन के उत्तरार्ध में अपनीतमन्नाएं पूरी कर लें.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:अंदर का खुलासा: नरेंद्र मोदी के लिए काम कर रहे हैं प्रशांत किशोरBJP की ये लड़की यूपी में मायावती की काट हैअखिलेश यादव के लिए पागलपन, सना ने अपने और भाई के खून से लिख दिया ख़तपंजाब चुनाव: हर जगह हार रही कांग्रेस के लिए खुशखबरी