2016 का 26 दिसंबर. आजम खान इलाहाबाद में साधु-संतों के बीच बैठे थे. वहां संगम तटतक फोर लेन पुल के शिलान्यास के लिए पहुंचे आजम ने मंच से भाषण देते हुए कहा,'आपसे प्रार्थना है कि हमारे लिए यज्ञ कीजिए ताकि उससे पीछा छूट जाए. उसके नाम औरकाम, दोनों से डर लगता है. हमें काम करने वाला आदमी चाहिए, दल्ला नहीं.'आजम ने नाम लिए बगैर अमर सिंह के प्रति अपना 'प्रेम' जाहिर कर दिया. वही अमर सिंह,जिन्हें बहुत सारे लोग हालिया बवाल की जड़ मानते हैं और जिनके लिए मुलायम छातीठोंककर कहते हैं कि अमर ने उन्हें कई बार बचाया था. ऐसे मुलायम-प्रिय अमर को आज़मसार्वजनिक मंचों से खूब रगड़ते हैं, लेकिन उनसे पार्टी आलाकमान कुछ नहीं कह पाती.वही मुलायम रिसियाए हुए अखिलेश को मनाकर पिताजी के पास लाते हैं, ताकि सुलह हो सके.यादव परिवार की कलह का असर जिस जिले की सीटों पर नहीं पड़ा, वो है रामपुर. अखिलेशऔर मुलायम दोनों की लिस्ट में यहां की पांचों सीटों पर वही नाम थे. इनमें रामपुर सेखुद आजम खां और स्वार टांडा से उनके 27 वर्षीय अब्दुल्ला आजम लड़ रहे हैं. ये उनकेप्रभाव का जिला है और यहां उन्हीं की मरज़ी के लोग प्रत्याशी होते हैं.बेवजह नहीं है कि मुलायम अपने भाई रामगोपाल को पार्टी से निकाल देते हैं लेकिनबराबर अखिलेश से मुलाकातें करने वाले आजम पर भी उनका भरोसा बना रहता है. इसी तरहअखिलेश शिवपाल चाचा से भले ही उखड़े रहें, लेकिन आजम चचा से उनके रिश्ते हमेशाअच्छे रहते हैं.https://www.youtube.com/watch?v=cAKAceI6R5c&t=13sआखिर आजम खान में ऐसा क्या है, जो वो हमेशा बाप-बेटे दोनों के करीबी बने रहते हैं.इसके कारण हैं.1. सबसे बगावत पर मुलायम से नहींआजम ने सपा में बहुत अंदरूनी-बाहरी बवाल किए, लेकिन हमेशा मुलायम का सम्मान किया औरउनके वफादार रहे. जिन मसलों पर वो अड़ियल भी थे, वहां 'नेताजी' के दखल के बादउन्होंने अपना रुख नरम कर लिया. कभी मुलायम की हैसियत से ऊपर जाने की कोशिश नहींकी. ऐसा नहीं है कि आजम की राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं रही होगी.लेकिन वो अपने इलाके में अपनी लकीर बढ़ाने में जुटे रहे और उन्होंने यादव बंधुओं केराज में एक शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व खोज लिया, जिसमें मुलायम के लिए ढेर सारा सम्मानथा. इसीलिए मुलायम को कभी आजम से रंज नहीं हुआ. वैसे भी जब बेबाक बोल और बिगड़ैलसंभावनाओं वाला एक मजबूत नेता जो जी-हुजूरी में यकीन न रखता हो, वो सिर्फ आपकासम्मान करे, तो आप भी उसके सम्मान में बिछ जाते हैं.2. निजी स्वार्थ नहींसीएम अखिलेश के पहले दो साल के कार्यकाल में उन पर आरोप लगते थे कि वो ढाईमुख्यमंत्रियों की सरकार चला रहे हैं. पहले शिवपाल, दूसरे आजम और आधे खुद अखिलेश.लेकिन अखिलेश का आजम-प्रेम उनकी साफ छवि की वजह से भी है. रामगोपाल, शिवपाल औरसाधना, सबके पास कमाई के अपने-अपने स्रोत हैं, लेकिन आजम के पास न तो ऐसे स्रोत हैंऔर न ही करप्शन का कोई मामला है. आजम अपने बयानों की वजह से जरूर बदनाम रहे हैं परकरप्शन के आरोप उन पर नहीं लगे हैं. यादव परिवार की लड़ाई शुरू भी पैसों के मसले परही हुई थी, लेकिन आजम इस सबसे कहीं दूर थे. उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं था, सिवायअमर सिंह के लिए नफरत के. बाद के दिनों में अखिलेश से उनके तार इसलिए भी मजबूत हुएक्योंकि दोनों अमर सिंह को पार्टी से बाहर देखना चाहते थे.3. आजम का पार्टी-प्रेमhttps://www.youtube.com/watch?v=AJCmImuMRM8&t=2sअमर सिंह से विवाद के चलते आजम 2009 में पार्टी और पद से दूर हो गए थे. डेढ़ सालबाद उन्हें वापस ले लिया गया, लेकिन इस दौरान न तो उन्होंने अपनी कोई पार्टी बनाईऔर न सपा के खिलाफ कोई बयान दिया. यहां तक कि उन्होंने सपा की अपनी प्राथमिकसदस्यता भी रद्द नहीं कराई थी. यही वजह रही कि जब वो वापस आए, तो उनका पुराना रुतबाऔर सम्मान कायम था.उनके उलट अमर को जब 2010 में सपा से निकाला गया, तो एक साल के भीतर उन्होंने जयाप्रदा के साथ राष्ट्रीय लोक मंच के नाम से एक पार्टी बना ली थी. 2012 के विधानसभाचुनाव में उन्होंने 360 सीटों पर कैंडिडेट्स भी उतारे थे. मुलायम ने इसका बुरा नमानते हुए 2016 में उन्हें पार्टी में वापस ले लिया, लेकिन ये जरूरी तो नहीं कि अमरकी पॉलिटिक्स का किसी ने बुरा न माना हो.4. पार्टी का एकमात्र मुस्लिम चेहरामुस्लिम सपा के डिफॉल्ट वोटर माने जाते हैं. यूपी में यादव वोट बैंक 9 फीसदी है,जबकि मुस्लिम वोटर्स 17 से 18 फीसदी हैं. सपा के पास आजम के अलावा कोई बड़ा मुस्लिमचेहरा नहीं है. वो मुसलमानों के लिए वो सपा की तरफ से एक गारंटी की तरह है, जिसकीजरूरत बाप-बेटे दोनों को होती है.लखनऊ के पुराने पंछी बताते हैं कि 2012 में सरकार बनाने के बाद आजम को पिछली पीढ़ीका मानते हुए अखिलेश ने कोशिश की थी कि वो आजम के समांतर कोई मुस्लिम चेहरा खड़ा करसकें. उन्होंने कुछ नेताओं को प्रमोट भी किया, लेकिन वो मजबूती से उभर नहीं सके.बाद में समीकरण बदले, तो अखिलेश को सबसे मुफीद मुस्लिम नेता आजम ही लगे. फिरधीरे-धीरे दोनों में अच्छी बनने लगी.5. मोदी-विरोधी राजनीति के सूरमाhttps://www.youtube.com/watch?v=pmkfZaOFtaU&t=41sइस वक्त हर पार्टी को ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केनैरेटिव को मजबूती से काउंटर कर सकें. आजम यूपी में इस मोदी-विरोधी राजनीति काचेहरा हो सकते हैं. यूपी में प्रधानमंत्री पर सबसे तीखे प्रहार उन्होंने ही किएहैं. ओवैसी ये जगह हासिल करने के लिए खूब हाथ-पैर मार रहे हैं, लेकिन वो अभी बहुतपीछे हैं. सपा के पास ऐसे नेताओं की कमी है, जो मंच पर अच्छा बोलते हैं. वोटर चाहेहिंदू हो या मुस्लिम, अच्छी तकरीर करने वाले नेता लोगों को खूब भाते हैं और आजम इसलिहाज से भी प्रभावशाली नेता हैं.6. अखिलेश की सैद्धांतिक जरूरतhttps://www.youtube.com/watch?v=-SNYbzFvWdQ2014 चुनाव में करारी हार के बाद अखिलेश ने अपने तौर-तरीके बदले. उन्होंने वंशवादको किनारे किया और दागियों को पार्टी से दूर रखने के लिए मोर्चा खोल दिया. इस मुहिममें उन्हें आजम का ही साथ मिला. राजा भैया जैसे बाहुबलियों के खिलाफ आजम खुलकर बोलेऔर अमर के मसले पर तो हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गए. यही वजह रही कि तकरार के दिनोंमें वो बाप-बेटे को साथ बिठाकर बात कराते थे और अब जब साइकिल अखिलेश की हो गई है,तो वो पूरे हक के साथ अखिलेश के पीछे खड़े हैं.7. एक जिला आजम की जिम्मेदारीअपने इलाके में आजम की राजनीति आक्रामक रही है. रामपुर की सीट से वो आठ बार विधायकबन चुके हैं. इस बार स्वार की सीट पर उन्होंने अपने बेटे अब्दुल्ला को खड़ा कियाहै. अब्दुल्ला के नाम पर अखिलेश और शिवपाल, दोनों सहमत थे. असल में आजम को पूरी छूटहै कि रामपुर की पांचों सीटों पर जिसे चाहें, उसे खड़ा करें. बीते दिनों अखिलेश औरशिवपाल की कैंडिडेट्स वाली लिस्ट में रामपुर से लड़ने वाले उम्मीदवार कॉमन थे.अब्दुल्ला को स्वार सीट से वहां के नवाब के बेटे नवेद मियां के खिलाफ खड़ा किया जारहा है.https://www.youtube.com/watch?v=lt4SVl4_MR0&t=1s पर कुछ जरूरतें आजम की भी हैं...ऐसा नहीं है कि सिर्फ सपा या अखिलेश-मुलायम को ही आजम की जरूरत है. अखिलेश केलिए ईमानदारी उनकी जरूरत भी है. कुछ वाकये इस बात की पुष्टि करते हैं.1. जब मुलायम के बीमार पड़ने पर रोए आजमआजम खान और मुलायम यादव की दोस्ती बाबरी मामले के वक्त से है. आजम खुद कहते हैं किजिन्होंने पार्टी खड़ी की थी, उनमें अब तीन-चार लोग ही बचे हैं और वो उनमें से एकहैं. राजनीतिक गलियारों में वो किस्सा खूब चलता है कि आजम को सिर्फ एक मौके पर रोतेदेखा गया. जब मुलायम बीमार पड़े थे. दोनों के बीच कभी-कभार होने वाला मतभेद उनकेप्यार के सामने बहुत छोटा है. ऐसे में संभावना बहुत कम थी कि आजम कभी मुलायम विरोधीमोर्चे में देखे जाते.https://www.youtube.com/watch?v=byNdhmK_t4E&t=39s2. अमर की वजह से की रामगोपाल से दोस्तीरामगोपाल के साथ आजम के रिश्ते हमेशा से अच्छे नहीं थे, लेकिन पिछले साल की शुरुआतमें जब ये पक्का हो गया कि अमर सिंह की सपा में वापसी हो रही है, तो उन्होंने खुदआगे आकर हाथ बढ़ाया. फरवरी, 2016 में जब रामगोपाल अपने घर में बीमार पड़े थे, तबआजम गुलदस्ता लेकर उनके घर गए और हालचाल लिया. ये एक नई कहानी की शुरुआत थी. साल केबीच में ही यादव कुनबे में भसड़ शुरू हो गई और सबको अपने-अपने खेमे चुनने पड़े औररामगोपाल-आजम एक ही पाले में बड़ी मोहब्बत के साथ खड़े नजर आए.--------------------------------------------------------------------------------सपा को लेकर आजम का समर्पण 4 जनवरी के उनके इस बयान से पता चलता है, जिसमेंउन्होंने कहा था, 'पार्टी में विवाद सुलझाने के लिए मुझे किसी की भी चौखट पर जानापड़े, तो मैं चला जाऊंगा. जहां नाक झुकानी होगी, झुका लूंगा. जिसके हाथ-पैर पकड़नेहोंगे, पकड़ लूंगा.'आजम ने ये बातें सिर्फ कही नहीं, बल्कि कई मौकों पर करके भी दिखाईं. मुलायम ने जबकल्याण सिंह से नजदीकियां बढ़ाई थीं, तब आजम ने खुलकर इसका विरोध किया था. उनकामुलायम-प्रेम तब भी दिखा, जब मुलायम के बर्थडे की फंडिंग के सवाल पर उन्होंने मजाकमें कहा था, 'हां, नेताजी के जन्मदिन का पैसा दाऊद इब्राहिम और तालिबान से आया है.'साइकिल जीत चुके अखिलेश अमर सिंह की मौजूदगी में पिता मुलायम से कभी बात नहीं करते.पिछले कुछ महीनों से ये चरम पर है. ऐसे में सिर्फ आजम ही ऐसे थे, जो बाप-बेटे कोपूरे हक के साथ साथ बुलाते थे, बिठाते थे, बात कराते थे और दोनों को ऐसा करना पड़ताथा. इन बैठकों का नतीजा भले कुछ न निकला हो, लेकिन आजम ने अपनी तरफ से कोई कसर नहींछोड़ी. आजम कहते हैं, 'मैंने बाप-बेटे के बीच इतनी कड़वाहट कभी नहीं देखी, लेकिनखून के रिश्ते की मिठास वक्त रहते इस कड़वाहट को दूर कर देगी.'चुनाव अब करीब हैं. चुनाव आयोग ने फैसला कर दिया है. कड़वाहट का अब बहुत काम नहींबचा है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ा जाए...UP इलेक्शन के पहले फेज़ में किसका है 'अपर हैंड'?मुलायम जी, बर्बाद होने के लिए 11 क्यों एक ही वकील काफी थाभितरघात की ये पांच खबरें मोदी-शाह के माथे पर पसीना ले आएंगीमुलायम अपने लड़के से हार गए, मैं इन 4 वजहों से खुश हूं6 महीने में पलटीं मायावती इस चुनाव में कांशीराम का सपना तोड़ रही हैं इस एक बयानकी वजह से BJP यूपी चुनाव हार जाती, अगर किसान वोटबैंक होते