14 राज्यों में कुल उतनी मौंतें नहीं हुईं, जितनी अकेले बंगाल में, चुनावी हिंसा के ये आंकड़े देखिए
ACLED के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 से अब तक देश में चुनावी हिंसा की कुल 2,593 घटनाएं दर्ज हुई हैं. इनमें से 904 अकेले बंगाल के खाते में हैं. यानी कुल जमा 35 प्रतिशत. हिंसा की इन घटनाओं में देश भर में 329 लोगों की जान गई, जिसमें से 168 लोग अकेले बंगाल में मारे गए हैं. यानी कुल 51 प्रतिशत.

तारीख 15 मार्च. चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में चुनाव का ऐलान किया. तीन दिन बाद यानी 19 मार्च को उत्तर 24 परगना से तृणमूल कांग्रेस के एक बूथ अध्यक्ष की हत्या की खबर आई. हत्या पार्टी के भीतर के टकराव के चलते हुई. लेकिन यह हत्या कोई इकलौती घटना या सामान्य खबर भर नहीं है. ये एक ट्रेंड का हिस्सा है, जिसने पिछले छह सालों में बंगाल को चुनावी हिंसा से जुड़ी घटनाओं में सबसे आगे खड़ा कर दिया है.
इंडिया टुडे ने चुनावी हिंसा पर नजर रखने वाली संस्था 'आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट'(ACLED) का विश्लेषण किया है. इसके मुताबिक, पिछले छह साल में पश्चिम बंगाल में किसी भी दूसरे राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा चुनावी हिंसा की घटनाएं दर्ज हुई हैं. बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 पिछले 6 सालों का सबसे हिंसक चुनाव रहा है. इस चुनाव में हिंसा से जुड़ी 300 घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें 58 लोगों की जान गई.
चुनावी हिंसा में दूसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव 2024 है. इस चुनाव में हिंसा की 89 घटनाएं हुईं, जिनमें तीन लोगों की मौत हुई. ACLED के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 से अब तक देश में चुनावी हिंसा की कुल 2,593 घटनाएं दर्ज हुई हैं. इनमें से 904 अकेले बंगाल के खाते में हैं. यानी कुल जमा 35 प्रतिशत. हिंसा की इन घटनाओं में देश भर में 329 लोगों की जान गई, जिसमें से 168 लोग अकेले बंगाल में मारे गए हैं. यानी कुल 51 प्रतिशत. ये आंकड़े साल 2020 से अब तक हुए विधानसभा चुनाव, संसदीय चुनाव और स्थानीय चुनाव (पंचायत और निकाय चुनाव) को मिला कर जुटाए गए हैं.
बंगाल बनाम दूसरे राज्यबंगाल में विधानसभा की 294 सीटें हैं. 200 से ज्यादा सीटों वाले बड़े राज्यों के मुकाबले में बंगाल चुनावी हिंसा के मामले में काफी आगे दिखता है. साल 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य के हर विधानसभा क्षेत्र में औसतन हिंसा की 1.02 घटनाएं दर्ज हुईं. बड़े राज्यों में दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 403 सीटों पर कुल 50 घटनाएं हुईं. यानी हर विधानसभा क्षेत्र में औसतन 0.12 घटना.
महाराष्ट्र में साल 2024 के चुनाव में कुल 39 घटनाएं हुईं. वहीं बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और राजस्थान में हुए हालिया चुनावों में हिंसा की 40 से कम घटनाएं दर्ज हुई हैं. मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्य चुनावी हिंसा के मामले में कई बड़े राज्यों से आगे रहे हैं. साल 2023 के विधानसभा चुनाव में त्रिपुरा में हिंसा की 40 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि साल 2022 के मणिपुर चुनाव में ये आंकड़ा 56 तक पहुंच गया.
बंगाल चुनाव सबसे हिंसकसाल 2021 में बंगाल विधानसभा चुनाव 8 फेज में हुए. 27 मार्च से लेकर 29 अप्रैल तक. वोटिंग प्रतिशत काफी ज्यादा रहा. सभी फेज मिलाकर औसतन 82 फीसदी लेकिन वोटिंग के दौरान हिंसा का ग्राफ भी काफी हाई रहा. अप्रैल हिंसा के लिहाज से सबसे खतरनाक रहा. इस महीने हिंसा की 123 घटनाएं दर्ज हुईं, जिसमें 19 लोगों की जान गई. 2 मई को रिजल्ट आने के बाद 88 घटनाएं दर्ज हुईं. इसमें 33 लोग मारे गए. मई में हुई अधिकतर हिंसा बदले की मंशा से हुई थी. तृणमूल कांग्रेस की जबरदस्त जीत के बाद विपक्षी समर्थकों को निशाना बनाया गया था.

ACLED ने चुनावी हिंसा में शामिल प्लेयर्स की पहचान की है. संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 से अब तक हुए बंगाल चुनाव में हिंसा से जुड़ी 77 घटनाओं में तृणमूल कांग्रेस की भागीदारी रही. वहीं 25 घटनाओं में बीजेपी मुख्य भूमिका में रही. अगर इसमें संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं को भी जोड़ें तो तृणमूल का आंकड़ा 109 पहुंच जाएगा. वहीं बीजेपी 31 पर पहुंच जाती है. हिंसा की अधिकतर घटनाएं ‘अनाम’ दंगाइयों के खाते में दर्ज हुई हैं. जिन घटनाओं में किसी संगठन की पहचान नहीं हो पाती, उन्हें ACLED ‘अनाम’ के खाते में ही डालता है.
2026 विधानसभा चुनाव का पैटर्नचुनाव की घोषणा होने के तीन दिन बाद एक तृणमूल कार्यकर्ता की हत्या हुई. हालांकि ACLED ने इसकी गिनती नहीं की है. चुनावी हिंसा दर्ज करने वाली इस संस्था के मुताबिक, 15 मार्च से 27 मार्च तक राज्य में हिंसा की 40 घटनाएं दर्ज हुई हैं. साल 2021 के चुनाव में इतने दिनों में ही 59 घटनाएं दर्ज हुई थी, जिसमें 5 लोगों की मौत हो गई थी.
साल 2026 के विधानसभा चुनाव दो फेज में होने है. 23 अप्रैल (152 सीट) और 29 अप्रैल (142 सीट). वोटों की गिनती 4 मई को होगी. साल 2021 का चुनाव आठ फेज में हुआ था. चुनाव लंबा खिंचने के चलते हिंसा की घटनाओं में भी काफी उछाल आया था. लेकिन अगर इस बात पर ध्यान न दे तो भी इस साल अब तक हिंसा के मामलों में गिरावट दर्ज हुई है. ये स्थिति बरकरार रहेगी या नहीं. आने वाले चार हफ्ते इस लिहाज से निर्णायक होंगे.
नोट : ACLED ने हिंसक घटनाओं में दंगा, नागरिकों के खिलाफ हिंसा, झड़प और धमाकों (बम से हमला) को शामिल किया है. लूटपाट, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या फिर विरोध प्रदर्शनों को हिंसा की कैटेगरी से बाहर रखा गया है.
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