बंगाल में महिलाएं पुरुषों से ज्यादा वोट करें तो चुनाव कौन जीतता है?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बंपर वोटिंग ने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. चुनाव आयोग के मुताबिक, इस बार के चुनाव में 92.47 फीसदी वोट पड़े हैं. इनमें भी महिला वोटरों की संख्या 93 फीसदी से ज्यादा रही. वहीं पुरुष वोटर महिलाओं से तकरीबन दो फीसदी पीछे ही रहे. पुरुष वोटरों का आंकड़ा इस बार 91.74 फीसदी रहा.

पश्चिम बंगाल में इस बार 92.47 फीसदी लोगों ने वोट दिया है. खास बात ये कि इस चुनाव में 93 फीसदी महिला मतदाताओं ने हिस्सा लिया. मतलब, 2021 के विधानसभा चुनाव की तुलना में 12 फीसदी ज्यादा महिलाओं ने इस बार वोटिंग की.
अब चुनावी विश्लेषक कयास लगा रहे हैं कि चुनाव में वोट डालने के लिए इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का बाहर निकलना क्या इशारा करता है? बंगाल चुनाव के नतीजों पर इसका क्या असर पड़ेगा? महिलाओं का ये जत्था क्या बंगाल सरकार से खुश होकर ईवीएम से इनाम देने के लिए बाहर निकला या सत्ता विरोधी लहर के असर में बदलाव लाने के मूड में था? 4 मई को जब नतीजे आएंगे तो इन सारे सवालों का जवाब मिल जाएगा.
अभी हम नजर डालते हैं उस यात्रा पर, जिसमें चुनावों में महिलाओं की हिस्सेदारी 47 फीसदी से 93 फीसदी तक पहुंच गई.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1962 के विधानसभा चुनाव से लेकर 2009 के लोकसभा चुनाव तक महिलाओं की वोटिंग में हिस्सेदारी हमेशा पुरुषों के मुकाबले कम ही रही. 1962 में बंगाल के विधानसभा चुनाव में 55 फीसदी वोटिंग हुई थी. तब 61 फीसदी पुरुषों ने वोट किया था. सिर्फ 47.43 फीसदी महिलाएं ही वोट डालने के लिए बाहर निकलीं. तब से 2009 के लोकसभा चुनाव तक वोटिंग की हालत यही रही.
मतदान के मुकाबले में पुरुष महिलाओं से हमेशा जीतते रहे. 2009 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में 81 फीसदी वोटिंग हुई थी, जिसमें 82 फीसदी पुरुष वोटर थे और महिलाएं 80 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ उनसे बराबरी की दहलीज पर पहुंचकर भी थोड़ा पीछे रह गईं.
2011 में बंपर वोटिंगफिर आया 2011 का विधानसभा चुनाव. पश्चिम बंगाल में 34 साल लंबे वामपंथी शासन का अंत इसी चुुनाव में होना था और शुरू होना था ममता बनर्जी का युग. 2026 के वोटिंग आंकड़ों को छोड़ दें तो बंगाल में सबसे ज्यादा वोटिंग इसी साल हुई थी. कुल 87.72 फीसदी लोगों ने वोट डाला था, जिसमें पहली बार महिलाएं पुरुषों से आगे निकलीं. इस चुनाव में 84.22 फीसदी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की हिस्सेदारी 84.45 फीसदी की रही.
2011 के बाद 2014 का लोकसभा चुनाव एकमात्र ऐसा चुनाव रहा, जिसमें महिलाएं हिस्सेदारी में पुरुषों से पिछड़ीं. लेकिन इसके बाद 2016, 2019, 2021 और 2025 के चुनावों में महिलाएं वोट डालने में पुरुषों से आगे ही रहीं.
2016 के विधानसभा चुनावों में कुल मतदान 83.02% रहा. महिलाओं की हिस्सेदारी 83.13 प्रतिशत रही. पुरुषों का वोट पर्सेंटेज 82.23 रहा.
2019 के लोकसभा चुनाव में कुल मतदान 81.76 प्रतिशत रहा. इसमें महिलाओं का मतदान प्रतिशत 81.79% और पुरुषों का 81.35% था.
2021 के विधानसभा चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत 82.3% रहा. महिलाओं का मतदान प्रतिशत 81.75% था. पुरुषों का मतदान प्रतिशत 81.37% था.
2024 के लोकसभा चुनाव में कुल मतदान 79.55% रहा. इसमें महिलाओं का मतदान 80.16% और पुरुषों का 78.2% रहा.
टीएमसी को महिलाओं ने जिताया?
2011 से बंगाल की सत्ता पर तृणमूल कांग्रेस लगातार काबिज है. चुनावी एक्सपर्ट मानते हैं कि ममता बनर्जी की जीत में महिला मतदाताओं ने अहम भूमिका निभाई है. ममता ने महिलाओं को अपनी पार्टी के कोर वोटर के तौर पर तैयार किया है. उनकी सरकार ने कई ऐसी योजनाएं चलाईं, जो महिलाओं को सशक्त बनाती हैं.
अपने पहले कार्यकाल में सत्ता संभालने के बाद ममता बनर्जी ने बालिकाओं की पढ़ाई के लिए कन्याश्री योजना शुरू की. लड़कियों के रूपाश्री योजना भी चलाई गई, जिसके तहत बच्चियों के माता-पिता को उनकी शादी के लिए 25 हजार रुपये दिए जाते हैं. 2021 में ममता सरकार ने लक्ष्मी भंडार योजना शुरू की, जिसके तहत सभी महिलाओं को हर महीने 500 रुपये दिए जाते हैं. इसे अब बढ़ाकर 1500 रुपये कर दिया गया है.
बढ़ती हिस्सेदारी का क्या मतलब?
बंगाल चुनाव में महिला वोटरों के मन में क्या था, ये तो चुनाव के नतीजे बताएंगे. लेकिन राज्य के अलग-अलग दलों का इस पर अपना नजरिया है. सबके पास अपने तर्क हैं कि कैसे चुनाव में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी नतीजों का रुख उनके पक्ष में मोड़ देगी.
वामपंथी पार्टी सीपीएम का कहना है कि वाम मोर्चा की सरकार ने 1978 में पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण शुरू किया था. इसी का नतीजा है कि महिलाएं राज्य में राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक हुईं. पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती का कहना है कि 2011 के बाद से पुरुषों के पलायन के कारण महिलाओं का वोटिंग पर्सेंटेज बढ़ना शुरू हुआ है. उनके मुताबिक, बंगाल के तमाम युवा लड़के रोजगार के लिए राज्य से बाहर चले गए क्योंकि यहां रोजगार नहीं हैं. इन पुरुषों का एक वर्ग चुनाव में कभी वोट डालने नहीं आया, लेकिन महिलाएं यहीं रहीं और हर चुनाव में वोट डाला.
वहीं बीजेपी के राज्यसभा सांसद राहुल सिन्हा के मुताबिक, ममता बनर्जी के शासनकाल में महिलाओं का अपमान किया गया. महिलाओं के खिलाफ अत्याचार भी बढ़े. ऐसे में वह टीएमसी को सबक सिखाने के लिए वोट देने बाहर आईं.
तृणमूल के प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती कहते हैं कि बूथ पर महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ना इसका संकेत है कि ‘काउ बेल्ट’ की पार्टी बीजेपी कभी बंगाल में नहीं जीत पाएगी. उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल में ईश्वर चंद्र विद्यासागर और राजा राममोहन रॉय के समय से ही महिला सशक्तीकरण की बात होती है. इस वजह से बीजेपी ने बंगाल में महिलाओं को वोट करने से रोका. इसीलिए SIR में मुस्लिम मतदाताओं के बाद बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं के नाम काटे गए.
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