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बंगाल में प्रचार के आखिरी दौर में कौन दिख रहा भारी, ममता के गढ़ में बीजेपी सेंध लगा पाएगी?

West Bengal Election 2026: टीएमसी लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है. वहीं, गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने पर ही पीएम मोदी और कार्यकर्ताओं के चेहरे पर मुस्कान आएगी. लेकिन क्या यह इतना आसान है? क्या ‘ममता दीदी’ के गढ़ को भेदना इतना सरल है? अब आखिरी दौर में बंगाल के लगभग हर मुद्दे पर कौन किस पर दिख रहा भारी?

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22 अप्रैल 2026 (अपडेटेड: 22 अप्रैल 2026, 04:46 PM IST)
west bengal election 2026
बंगाल में दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)
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पश्चिम बंगाल में चुनावी लड़ाई आखिरी दौर में है. बीजेपी के लिए ये महज चुनावी और राजनीतिक लड़ाई भर नहीं है, बल्कि अब यह राज्य उसके लिए ‘स्वाभिमान’ की लड़ाई बन चुका है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक रैली में कहा कि बीजेपी और एनडीए की देशभर में 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सरकार है, लेकिन पीएम मोदी और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए यह काफी नहीं है. शाह ने कहा, ‘पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने पर ही उनके चेहरे पर मुस्कान आएगी.’ लेकिन क्या यह इतना आसान है? क्या ‘ममता दीदी’ के गढ़ को भेदना इतना सरल है? क्या पश्चिम बंगाल, बीजेपी के लिए अब तक का सबसे कठिन चुनावी इम्तिहान साबित हो सकता है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे.

'बीजेपी में मजबूत चेहरे की कमी'

पिछले डेढ़ साल में महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में मिली जीत से बीजेपी का हौसला बुलंद हुआ है. लेकिन बीजेपी के सामने एक बड़ी समस्या यह है कि पश्चिम बंगाल में उनके पास ममता बनर्जी जैसी जन नेता का मुकाबला करने वाला कोई चेहरा नहीं है. वो अलग बात है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव भी बीजेपी ने बिना किसी चेहरे के लड़ा था. लेकिन 'वो साल दूसरा था और यह साल दूसरा है.’ तब आम आदमी पार्टी (AAP) इतनी मजबूत स्थिति में नहीं थी और कई आरोपों का सामना भी कर रही थी.

आजतक डिजिटल के एडिटर (नई दिल्ली) केशवानंद धर दुबे बताते हैं,

‘बीजेपी हाल के दिनों में हुए हर विधानसभा चुनाव को पीएम नरेंद्र मोदी के फेस पर लड़ी है. लेकिन बंगाल की कहानी अलग है. बंगाल में ममता बनर्जी को चेहरे का एडवांटेज है, इस चेहरे से मुकाबला करने के लिए बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं है. पिछली बार बीजेपी ने बंगाल के कई हिस्सों में बड़ी-बड़ी रैलियां की थीं, लेकिन इस बार कहानी थोड़ी अलग नजर आ रही है.’ 

केशवानंद बताते हैं कि इस बार बीजेपी पॉकेट वाइज छोटे-छोटे चेहरे और रैलियों पर फोकस कर रही है. बीजेपी चाह रही है कि साइलेंट तरीके से ग्राउंड पर काम किया जाए और सीधे ममता बनर्जी से टक्कर ना ली जाए. पिछले दिनों एक रिपोर्ट भी आई थी कि बीजेपी आलाकमान ने फैसला लिया था कि सीधे ममता बनर्जी पर आरोप-प्रत्यारोप से बचा जाएगा.  

पार्टी के अंदर 'उठा-पटक'

बीजेपी संगठन के तौर पर भी अभी टीएमसी का मुकाबला नहीं कर सकती, ऐसा कुछ जानकारों का कहना है. इनके मुताबिक बंगाल में पार्टी में भीतरखाने ‘सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है’. इसी वजह से सीनियर बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को पिछले सितंबर में ही राज्य की कमान सौंपी गई थी. लल्लनटॉप के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा बताते हैं,

‘बंगाल बीजेपी में अंदर ही अंदर घमासान मचा है. ये बात चुनाव प्रभारी भूपेन्द्र यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. बंगाल के संगठन प्रभारी सुनील बंसल तो पिछले विधानसभा चुनावों से उन सबसे जूझ रहे हैं. पूर्व सांसद दिलीप घोष का एक बयान बहुत विवादों में रहा. उन्होंने कहा था बीजेपी संगठन चलाना जानती है. कैंपेन करना जानती है पर चुनाव कैसे जीता, जाए ये नहीं आता. उनकी इस बात का जवाब केंद्रीय राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने दिया. उन्होंने कहा लोग हर चीज़ की जानकारी लेकर पैदा नहीं होते हैं.’

पंकज झा आगे बताते हैं, 

‘चार बड़े नेताओं सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार, दिलीप घोष और सौमित्र खान… इनकी केमिस्ट्री सर्व विदित है. एक कहते हैं पूरब तो दूसरे बताते हैं पश्चिम. उत्तर बंगाल को पूर्वोतर भारत के साथ जोड़ने के सुकांत के प्रस्ताव पर सुवेंदु अधिकारी ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. दिल्ली से पार्टी हाई कमान ने उस झगड़े को सुलझाया था.’ 

जानकारों के मुताबिक सुवेंदु अधिकारी पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन कई सीनियर नेता उनके खिलाफ हैं. दरअसल, एक समय सुवेंदु अधिकारी टीएमसी के सबसे प्रभावशाली नेता थे, लेकिन दिसंबर 2020 में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. ऐसे में बीजेपी के कुछ नेता यह जताते नजर आते हैं कि वे पार्टी के साथ तब से हैं, जब यह राज्य में हाशिए पर थी, यानी सुवेंदु के बीजेपी में आने से काफी पहले से.  

हिंदू वोटरों को एकजुट करने की कोशिश

बीजेपी पड़ोसी देश बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा रही है, ताकि हिंदू वोटों को एकजुट किया जा सके. लेकिन क्या इससे बीजेपी को कोई फायदा होगा? इस पर केशवानंद धर दुबे बताते हैं,

‘बीजेपी लंबे समय से बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हिंसा और घुसपैठ का मुद्दा उठाती रही है. यहां तक की SIR के पीछे भी घुसपैठियों को निकालने और वोटर लिस्ट से उनका नाम काटने की बात कही गई है. लेकिन पश्चिम बंगाल के कई जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं, बीएसएफ की तैनाती के बाद भी आवाजाही में कोई बड़ी रोक-टोक नहीं है. ऐसे में लंबे समय से घुसपैठ एक सिस्टम का हिस्सा हो गया है. इससे तुरंत निपटना और तत्काल बीजेपी को इसका फायदा होना अभी मुमकिन नहीं लगता.’ 

West Bengal Election 2026
बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के विरोध में आयोजित एक रैली में शामिल हुए. (फोटो ANI)

उन्होंने बताया कि जहां तक सवाल हिंदू वोटों को एकजुट करने का है, इस मामले में बीजेपी ने पांच साल पहले 2021 में भी बड़ा प्रयास किया था. लेकिन सत्ता में नहीं आ सकी. उन्होंने बताया,

‘हिंदू एकजुट भी हो जाता है तो भी बहुमत में बीजेपी को वोट नहीं करता. बंगाल में जाति का मुद्दा उतना नहीं है और उसी तरह यहां धर्म का मुद्दा भी अभी चुनाव जीतने का उपकरण नहीं बन पाया है.’  

उन्होंने आगे बताया कि हाल के दिनों में ममता बनर्जी सरकार ने हिंदुओं को लुभाने के लिए दुर्गा आंगन, सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसे प्रोजेक्ट की शुरुआत की है. दीघा में जगन्नाथ धाम मंदिर शुरू किया गया है, जिसे ममता बनर्जी बड़े पैमाने पर प्रमोट कर रही हैं. 

BJP के लिए ‘प्लस प्वाइंट्स’

भले ही इस चुनाव में बीजेपी के लिए चुनौतियां कम नहीं हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उसे बढ़त मिलती हुई भी नजर आ रही है. बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में युवाओं और महिलाओं पर फोकस किया है. इसके अलावा चुनाव आयोग का इस बार सिर्फ दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में मतदान कराने का फैसला बीजेपी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है. पार्टी का मानना है कि इससे सत्तारूढ़ दल (TMC) को अपने कैडर को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भेजने का मौका कम मिलेगा.

'परिवर्तन यात्रा' से फायदा!

बीजेपी ने 'परिवर्तन यात्रा' और घर-घर जाकर किए जा रहे माइक्रो लेवल के बूथ प्रबंधन के जरिए अपने आधार को मजबूत किया है. बीजेपी वामपंथ और कांग्रेस के घटते वोट बैंक को अपने पक्ष में आने की उम्मीद कर रही है. इसके साथ ही, हिंदू मतदाताओं के एकीकरण और जनसांख्यिकीय बदलाव के दावों को पार्टी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है.

बीजेपी के मजबूत क्षेत्र

बीजेपी का उत्तर बंगाल (जैसे कूचबिहार और अलीपुरद्वार) और आदिवासी क्षेत्रों में दबदबा कायम है, जहां 2021 में भी उसका प्रदर्शन शानदार रहा था. पार्टी ने अपने घोषणापत्र में युवाओं, महिलाओं और चाय बागान मजदूरों के लिए विशेष आर्थिक और स्वास्थ्य सुविधाओं के वादे किए हैं, जो उसे अन्य दलों से अलग पहचान दे सकते हैं.

SIR विवाद पर ममता बनर्जी का रुख क्या TMC को फायदा देगा?

ममता बनर्जी का तीसरा कार्यकाल बिल्कुल भी आसान नहीं रहा है. इस दौरान कई सारी घटनाएं हुईं, जिनसे पार्टी की साख पर सवाल उठे. इनमें संदेशखाली हिंसा और आरजी रेप-मर्डर केस, शिक्षक भर्ती घोटाला और दूसरे भ्रष्टाचार के आरोप शामिल हैं. फिर भी ममता बनर्जी ने राजनीतिक दांव-पेच के दम पर वापसी की है.

सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मुद्दे पर अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने यह साबित भी कर दिया. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि राज्य में इससे एक अच्छा मैसेज गया है. लल्लनटॉप के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा बताते हैं,

‘ममता बनर्जी ने SIR के मुद्दे पर अपनी स्ट्रीट फाइटर वाली इमेज को फिर से मजबूत किया है. बीजेपी के एक बड़े नेता ने मुझे SIR शुरू होने से पहले बताया था कि इससे पार्टी को फायदा होगा. टीएमसी के वोटर कट जायेंगे. पर अब वही नेता कह रहे हैं कि हमें तो नुकसान हो गया है. ममता चुनाव आयोग के खिलाफ कोलकाता से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी हैं. ग्राउंड पर उनके वर्कर भी अपना वोट बचाने में जुटे रहे.’

mamata banerjee
सुप्रीम कोर्ट परिसर में ममता बनर्जी. (फोटो- PTI)

कुल मिलाकर SIR के तहत पश्चिम बंगाल से करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. ममता बनर्जी ने जब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया तो शीर्ष अदालत ने साफ किया कि जिन मतदाताओं के नाम SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए थे, अगर उन्हें अपीलीय ट्रिब्यूनल से 'वैध मतदाता' होने की मंजूरी मिल जाती है, तो वे वोट डाल सकेंगे.

चुनाव आयोग (ECI) को निर्देश दिया गया है कि ट्रिब्यूनल द्वारा वैध घोषित किए गए मतदाताओं के लिए एक सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट जारी की जाए. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अदालत के इस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें कहा गया है कि मतदान से दो दिन पहले तक मंजूरी मिलने पर भी व्यक्ति वोट डाल पाएगा.

इसके अलावा, साउथ बंगाल के कई इलाकों में बड़ी संख्या में वोटर्स के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. बीजेपी का दावा है कि ये मतदाता बांग्लादेश से आए ‘अवैध अप्रवासी’ हैं. टीएमसी को इससे फायदा होगा या नुकसान? इस पर केशवानंद धर दुबे बताते हैं,

‘साउथ बंगाल में बीजेपी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है. टीएमसी की शुरुआत साउथ बंगाल से हुई है तो यह उसका मजबूत गढ़ रहा है, लेकिन घुसपैठ का मुद्दा और वोटर लिस्ट में कांट-छांट के बाद भी सीधा-सीधा उसका फायदा बीजेपी को कितना मिलेगा यह कहना अभी मुश्किल है. एक बड़ी बात ये भी है कि SIR का मुद्दा मतुआ जैसे समुदाय में कहीं उल्टा ना पड़ जाए, बीजेपी इसका भी ख्याल रख रही है.’

उन्होंने बताया कि जैसे ही SIR की शुरुआत हुई थी, ममता बनर्जी ने मतुआ इलाके में रैली करके ऐसा नैरेटिव सेट कर दिया था कि बांग्लादेश से आए मतुआ समुदाय के लोगों का नाम वोटर लिस्ट से काटा जा रहा है. 

SIR के बाद कोलकाता का क्या हाल?

राजधानी कोलकाता पारंपरिक रूप से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मजबूत किला रहा है. SIR के तहत कोलकाता की सभी 11 विधानसभा सीटों से लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. यह संख्या 2024 के लोकसभा चुनाव के जीत-हार के अंतर से कहीं ज्यादा है. ऐसे में माना जा रहा है कि 2026 के विधानसभा चुनावों में चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं.

द टेलीग्राफ ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि SIR के तहत हटाए गए नामों का एक बड़ा हिस्सा मुसलमान, महिलाओं और गरीब वोटरों का है, जो तृणमूल कांग्रेस (TMC) का कोर वोट बैंक हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी के कई मजबूत गढ़ SIR के बाद कमजोर हो गए हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में, TMC सभी 11 विधानसभा सीटों में से 9 पर और बीजेपी 2 सीटों पर आगे रही थी. 

खेल सिर्फ TMC का नहीं बिगड़ रहा!

एक पॉलिटिकल एक्सपर्ट का कहना है कि वोटरों के नाम हटाए जाने का असर दोनों तरफ पड़ सकता है, इसलिए BJP को भी बहुत ज्यादा निश्चिंत नहीं होना चाहिए. साल 2024 में, BJP को श्यामपुकुर से 1599 वोटों की बढ़त मिली थी, जबकि जोरासांको से उसे 7401 वोटों की बढ़त हासिल हुई थी. इन दोनों सीटों से क्रमशः 44,693 और 76,524 वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं.

पॉलिटिकल एक्सपर्ट ने बताया कि इन दोनों सीटों पर अल्पसंख्यकों के मुकाबले हिंदी भाषी हिंदू वोटरों के नाम ज्यादा हटाए गए हैं. चूंकि यह माना जाता है कि 2024 में हिंदी भाषी हिंदुओं ने बड़े पैमाने पर BJP के पक्ष में वोट दिया था, इसलिए बीजेपी के लिए भी यह चिंता का विषय है.

AIMIM और हुमायूं कबीर की पार्टी टीएमसी के लिए खतरा?

क्या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM टीएमसी के अल्पसंख्यक वोटों के लिए कोई खतरा है? इस पर लल्लनटॉप के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा बताते हैं,

बंगाल में इस बार कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. असली चुनाव तो टीएमसी और बीजेपी के बीच ही है. दो चार सीटों को छोड़ दें तो मुस्लिम वोटों के बंटवारे की संभावना बहुत कम है. बंगाल का मुसलमान हताश और निराश नहीं है, जैसा बिहार में था. सीमांचल में वोटों का बंटवारा हुआ. लेकिन बंगाल में मुस्लिम समुदाय को पता है कि टीएमसी को छोड़ने पर फायदा सिर्फ बीजेपी को मिलना है, किसी और को नहीं, क्योंकि कोई और मुकाबले में नजर ही नहीं आता.’ 

जहां तक सवाल हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) का है, उसे भी एक वायरल वीडियो ने शक के दायरे में खड़ा कर दिया है. पहले AIMIM ने हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने का फैसला लिया था. लेकिन हुमायूं कबीर का एक कथित वीडियो वायरल होने के बाद ओवैसी ने गठबंधन तोड़ लिया.

तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने 9 अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह वीडियो जारी किया था. वीडियो में कथित तौर पर कुछ विवादित बातें सुनाई देती हैं. जैसे ‘1000 करोड़ रुपये आएंगे’ और ‘मुसलमान बहुत भोले हैं, उन्हें बेवकूफ बनाना आसान है.’ TMC का आरोप है कि यह बातचीत इस बात का संकेत है कि कबीर बीजेपी के साथ मिलकर मुस्लिम वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं. 

वहीं, पिछली बार भी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) बस अपना खाता ही खोल पाई थी. यानी राज्य की 30% से ज्यादा मुस्लिम आबादी ने एक तरफा ममता बनर्जी को समर्थन दिया था.

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट पहुंची ममता बनर्जी, सुनवाई के बाद क्या बोले CJI?

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