पासपोर्ट दिया फिर भी काटा नाम... अब सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद कांग्रेस कैंडिडेट बन सका वोटर
Supreme Court के दखल के बाद west Bengal में पहली बार और इकलौती ट्रिब्यूनल बैठी, जिसने Congress Candidate मोताब शेख के हक में फैसला दिया. मोताब के अलावा अब तक किसी को भी ट्रिब्यूनल में जाने का मौका नहीं मिला है.

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर जबरदस्त तैयारी चल रही है. फिर भी लाखों लोग ऐसे हैं, जिन्हें नहीं पता कि वे वोट डाल पाएंगे या नहीं. इनमें से एक मुर्शिदाबाद के फरक्का से कांग्रेस उम्मीदवार मोताब शेख भी थे. यहां 'थे' इसलिए क्योंकि अब मोताब बंगाल के वैलिड वोटर हैं. मोताब बंगाल में पहले शख्स हैं, जो ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद मतदाता बने हैं. पहले चरण के मतदान के लिए वोटर लिस्ट के फाइनल होने में सिर्फ एक दिन बचा है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद मोताब ने राहत की सांस ली, क्योंकि उन्हें सुनवाई का जो मौका मिला, वो बंगाल में अब तक किसी को नहीं मिला है.
वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और न्यायिक अधिकारी की जांच के बाद मोताब शेख का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया था. मोताब ने दावा किया कि उन्होंने पासपोर्ट समेत कई डॉक्यूमेंट चुनाव आयोग और न्यायिक अधिकारी के सामने पेश किए, लेकिन फिर भी उनका नाम डिलीट कर दिया गया.
कांग्रेस ने फरक्का विधानसभा से मोताब शेख को उतारा है. लेकिन नाम कटने से मोताब के हाथ से उम्मीदवारी छिन सकती थी. लेकिन सबसे बड़ा खतरा 'भारत का मतदाता होने का हक खोने' का था. मोताब ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
2 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मोताब के मामला निपटाने का आदेश दिया. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संबंधित ट्रिब्यूनल मामले को अपने हाथ में ले और चुनाव आयोग की मदद से 6 अप्रैल की दोपहर तक उसका निपटारा कर दे. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद पश्चिम बंगाल में पहली बार और इकलौती ट्रिब्यूनल बैठी, जिसने मोताब के हक में फैसला दिया. मोताब के अलावा अब तक किसी को भी ट्रिब्यूनल में जाने का मौका नहीं मिला है.
मिलता भी कैसे? बंगाल में 19 ट्रिब्यूनल को लाखों वोटरों की अपील का निपटारा करना है. इन 19 ट्रिब्यूनल को 2 अप्रैल से काम शुरू करना था, जो नहीं हो पाया. वो तो सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद स्पेशली मोताब के लिए ट्रिब्यूनल ने सुनवाई की.
कलकत्ता हाई कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस टीएस शिवज्ञान ने सॉल्ट लेक में मोजतबा शेख का केस सुना. मोजतबा भी सुनवाई के दौरान मौजूद थे. उन्होंने अपना पासपोर्ट जमा किया. उनका कहना है कि उन्होंने SIR के वक्त भी पासपोर्ट दिया था.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस शिवज्ञानम ने सभी कागजों को फिर से चेक किया और अपने आदेश में यह बात नोट की कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 'तकनीकी कारणों' का हवाला देते हुए वो वजह नहीं बताई, जिसके चलते एक न्यायिक अधिकारी ने जांच-पड़ताल के दौरान उनका नाम (वोटर लिस्ट से) 'हटा' दिया था. उनके नाम की स्पैलिंग में गड़बड़ी थी, जिसके बारे में उन्होंने 2002 में ही एक हलफनामा देकर चुनाव आयोग को बताया था.
जस्टिस शिवज्ञानम ने फैसला दिया कि मोताब शेख का दिया गया पासपोर्ट काफी है. उन्होंने ECI को आदेश दिया कि रविवार, 5 अप्रैल की रात 8 बजे तक एक अलग लिस्ट के जरिए मोताब शेख को मुर्शिदाबाद का वैध वोटर घोषित किया जाए.
मोताब शेख के वकील फिरदौस शमीम ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,
"ट्रिब्यूनल के सामने आया यह पहला मामला साबित करता है कि कैसे असली वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं."
बंगाल की वोटर लिस्ट से बाहर हो गए 60 लाख से ज्यादा लोगों के मामलों के निपटान के लिए 700 से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की गई थी. पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) मनोज अग्रवाल के कार्यालय के मुताबिक, शनिवार 4 अप्रैल तक 60 लाख मामलों में से 57 लाख मामलों को 'प्रोसेस' कर लिया गया था.
चुनाव आयोग ने अभी तक यह नहीं बताया है कि इनमें से कितने मामलों में नाम 'डिलीट' किए गए हैं. पहले जब करीब 49 लाख मामलों का निपटान हुआ था, तब चुनाव आयोग के अधिकारियों ने डिलीट किए गए मामलों को 45 फीसदी यानी 22 लाख बताया था.
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चुनाव आयोग ने 19 न्यायिक ट्रिब्यूनल्स बनाए थे, जिनके अध्यक्ष हाई कोर्ट के जस्टिस या चीफ जस्टिस होंगे, ताकि उन लोगों की अपीलों पर फैसला किया जा सके, जिनमें वोटर लिस्ट से नाम 'डिलीट' किए गए थे. लेकिन, सच तो ये है कि इन ट्रिब्यूनल्स को अभी तक चालू नहीं किया गया है.
पहले 19 ट्रिब्यूनल्स को 19 अलग-अलग निर्वाचन जिलों में चालू करना था. अब उसे बदलकर सभी को कोलकाता के जोका स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर एंड सैनेटेशन में एक ही जगह पर सेट कर दिया गया है.
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