मेरठ यानी 1857 की क्रांति वाला शहर. 22 मई 1987 को हुआ हाशिमपुरा का नरसंहार इसीशहर का दर्द है. वहीं ये वो शहर है जहां हर साल ऐतिहासिक नौचंदी मेला लगता है. इसमेले में मुसलमान बाले मियां की दरगाह पर चादरपोशी करते हैं तो वहीं हिंदू नवचंडीदेवी की पूजा. और हां! इसी नौचंदी मेले के नाम पर मेरठ और लखनऊ के बीच एक मात्रएक्सप्रेस दौड़ती है, जिसका नाम है 'नौचंदी एक्सप्रेस'. ये उसी जिले की रिपोर्ट है.जहां चार बार बीजेपी का विधायक रहा है. लेकिन इस बार राह आसान नहीं है. लेकिन आंकड़ेयही बता रहे हैं कि राह इस बार मुश्किल है. पढ़ लो पूरी रिपोर्ट किस्सों के साथ.मोटामाटी पिछले चुनाव का हाल, पूरी बात को समझने के लिएमेरठ के इतिहास पर नहीं जाएंगे. क्योंकि आपने बार-बार सुना होगा. कभी दंगों के लिएतो कभी 1857 की क्रांति के लिए. बात चुनाव की होगी. सवाल वोट का है. विकास का है.देश का है. साल 2012 लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने छह हजार 278 वोट से समाजवादी पार्टी केउम्मीदवार रफीक़ अंसारी को हराया था. तीसरे स्थान पर कांग्रेस के उम्मीदवार मोहम्मदयूसुफ कुरैशी रहे थे. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को 68 हजार 154 वोट मिले. रफीक को 61हजार 876 वोट मिले. टोटल वोटर्स की बात की जाए तो यहां दो लाख 78 हज़ार 845 हैं.जिनमें एक लाख 52 हज़ार 617 पुरुष और एक लाख 26 हज़ार 209 महिला वोटर्स रजिस्टर्डहैं.एहसान का बदला एहसानलक्ष्मीकांत वाजपेयी महज़ मेरठ की राजनीति में ही नहीं है. उनपर आसपास की सीटों कीज़िम्मेदारी भी रहेगी. क्योंकि वो बीजेपी के यूपी अध्यक्ष भी रह चुके हैं. और मेरठशहर से चार बार विधायक रह चुके हैं. और दो बार दूसरे नंबर पर. पहली बार 1989 मेंउन्होंने जनता दल के मोहम्मद अय्यूब अंसारी को हराया था. बात साल 2006 की है. मेरठके विक्टोरिया पार्क में मेला लगा था. 10 अप्रैल को मेले का आखिरी दिन था. इस वजहसे खूब भीड़ उमड़ी थी. इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट की प्रदर्शनी लगी थी. तभी आग लग गई. इसआग से 63 लोगों की मौत हो गई थी. और करीब इतने ही लोग झुलस गए थे. उस वक्तमुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव. मुख्यमंत्री अगले दिन पीड़ितों का हालचाल मालूमकरने मेरठ आए तो भाजपा नेता लक्ष्मीकांत वाजपेयी की अगुआई में पार्टी कार्यकर्ताओंने मुख्यमंत्री के काफिले में शामिल सपा नेताओं और पुलिस अफसरों के साथ हाथापाई की.लक्ष्मीकांत के खिलाफ इस मारपीट को लेकर मेरठ के सिविल लाइन थाने में सपा ने मुकदमादर्ज कराया. लेकिन सालों बाद लक्ष्मीकांत के एक एहसान के बदले ये मुकदमा वापस लेलिया गया. वो एहसान था साल 2012 में कन्नौज से डिंपल यादव के खिलाफ किसी भीउम्मीदवार को भाजपा से खड़ा न करना. साल 2012 में सपा के प्रदेश सचिव मेरठ निवासीअब्बास अहमद से 'तहलका' ने बात की. तो उन्होंने बताया था, 'लक्ष्मीकांत वाजपेयी जीइस समय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. 2012 में उन्होंने कन्नौज के लोकसभा चुनाव मेंहमारी नेता डिंपल जी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था. इसलिए अब हम उनके खिलाफमेरठ में दर्ज एक मामले को वापस ले रहे हैं. वाजपेयी जी ने अपने समर्थकों के साथमेरे ऊपर हमला कर दिया था. मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था. मैं मरते-मरते बचाथा.' जब अब्बास अहमद से से पूछा गया कि क्या इस बारे में उन्हें मुलायम सिंह याअखिलेश यादव से आर्डर मिला है तो उनका जवाब था, 'इस मामले में नेताजी से मेरी बातहुई थी. उन्होंने कहा कि राजनीति में कोई दुश्मन नहीं होता. आप मामला वापस ले लेंगेतो मुझे कोई परेशानी नहीं होगी.'भाजपा का कैंडिडेटडॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी मौजूदा विधायक हैं. बीजेपी ने इस बार भी उनपर ही दांवलगाया है. इसकी वजह उनका सीनियर होना है. मेरठ गृह जनपद है. चार बार विधायक रह चुकेहैं. यूपी के बीजेपी अध्यक्ष पद से हटाकर फूलपुर के सांसद केशव प्रसाद मौर्या कोअध्यक्ष बनाया गया है. लेकिन ये 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान वो अध्यक्ष थे, जबबीजेपी ने यूपी में अच्छा परफॉर्म किया. जब लक्ष्मीकांत को यूपी में बीजेपी अध्यक्षबनाया गया था, तो 2012 में मुजफ्फरनगर की पुरकाजी सीट से बीजेपी के टिकट से लड़नेवाली साध्वी प्राची ने कहा था, 'उनके नेतृत्व में 50 सीटें भी हासिल नहीं कर पाएगी.उन्हें (वाजपेयी) जो सहारा देता है, उसे ही वह काट देते हैं.'लक्ष्मीकांत वाजेपयीलक्ष्मीकांत को सबसे पहले जनता पार्टी ने 1977 में युवा प्रकोष्ठ का अध्यक्ष बनायाथा. उसके बाद 1980 में बीजेपी के जिला महासचिव बने. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं किउन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से बीजेपी ने इसलिए हटाया है, क्योंकि वो ब्रह्मण थे. औरबीजेपी ओबीसी वोटों पर निशाना लगाना चाहती थी. इसलिए कोइरी समाज के केशव प्रसादमौर्य को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. यूपी में कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा ओबीसीमें आते हैं. और वोटों की बात की जाए तो तकरीबन 25 परसेंट ओबीसी हैं.दो बार से लगातार विधानसभा चुनाव जीत रहे लक्ष्मीकान्त का रथ हाजी याकूब कुरैशी नेसाल 2007 के विधानसभा चुनाव में रोका था. लेकिन साल 2012 में लक्ष्मीकांत फिर जीतगए. याकूब अपने बयानों और पार्टियां बदलने के लिए मशहूर हैं. बीएसपी, एसपी, आरएलडीमें रह चुके हैं. उस वक्त ज्यादा चर्चे में आए, जब उन्होंने शर्ली आब्दो के दफ्तरपर हमला हुआ तो उसे सही ठहराया और पैगंबर का कार्टून बनाने वाले के सिर पर 51 करोड़का इनाम घोषित किया था.सपा-कांग्रेस का कैंडिडेटरफीक अंसारी को उम्मीदवार बनाया गया है. पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे. सपा नेइन्हें राज्यमंत्री का पद दे रखा था. इस बार चर्चा ये है कि इनके अनुकूल माहौल है.क्योंकि वो इस बार मेरठ शहर की सीट पर सपा और कांग्रेस के अकेले मुस्लिम उम्मीदवारहैं.अखिलेश यादव और रफीक अंसारी.बसपा का कैंडिडेटबसपा ने बहुत पहले ही प्रत्याशी की घोषणा कर दी थी. पहले कुंवर दिलशाद को प्रत्याशीबनाया था, लेकिन चार महीने उनका पत्ता काट दिया, क्योंकि सहारनपुर में पिछले सालअक्टूबर में आयोजित बसपा सुप्रीमो मायावती की रैली में बसें न ले जाने पर संगठननाराज था. इसी नाराज़गी के चलते दिलशाद को हटाकर पंकज जौली को उम्मीदवार बना दियागया. पंकज जौली पंजाबी समाज से हैं. न्यू मोहनपुरी में रहते हैं, जहां उनकी काफीअच्छी पैठ है. इस सीट पर पंजाबी वोट तकरीबन 20 हजार है.पंकज जौलीरालोद का कैंडिडेटरालोद ने संजीव पाल को उम्मीदवार बनाया है. वेस्टर्न यूपी में ही रालोद का दबदबारहा है. लेकिन इस बार कुछ खास असर नजर नहीं आता. पिछली बार के यूपी विधानसभा चुनावमें रालोद को कुल 24 सीटें मिली थीं. इसकी वजह ये भी हो सकती है क्योंकि पिछलाचुनाव रालोद ने कांग्रेस से मिलकर लड़ा था. इस सीट पर कांग्रेस का कैंडिडेट तीसरेनंबर पर रहा था. इस सीट पर रालोद का क्या असर है, इस बारे में कोई खास रिपोर्ट हाथनहीं लगती. रालोद का कोई असर न होने की एक वजह ये भी हो सकती है क्योंकि पिछलाचुनाव कांग्रेस के साथ लड़ा, उससे पिछला बीजेपी के साथ. यानी दलबदल वाली स्थिति. इसबार अकेले चुनाव लड़ रहे हैं, इन का उम्मीदवार होना बीजेपी को ही नुकसान पहुंचाएगा.सियासत की चाल बदल गईबसपा ने पंजाबी कार्ड ऐसा खेला है कि सियासत की चाल बदली नजर आती है. क्योंकि इससीट पर पूरी तरह हिंदू-मुस्लिम वाला चुनाव होता है. लेकिन इस बार कौन जीतेगा. कहनाथोड़ा मुश्किल है. क्योंकि लक्ष्मीकांत आठवीं बार मैदान में होंगे. जोकि चार बारकब्ज़ा जमा चुके हैं. क्योंकि यहां बसपा और सपा मुस्लिम उम्मीदवार उतारती रही हैंजिसका फायदा बीजेपी को मिला. इस बार दो हिंदू कैंडिडेट हैं सपा-कांग्रेस का गठबंधनहै. और कैंडिडेट है रफीक अंसारी, जो पिछली बार महज़ छह हज़ार 278 वोटों से हारे.क्योंकि दूसरे नंबर पर रहा कांग्रेस प्रत्याशी भी मुस्लिम था और चौथे नंबर पर रहाबसपा का प्रत्याशी भी. इस आंकड़े को देखते हैं तो कहीं न कहीं मज़बूत रफीक अंसारी हीनजर आते हैं. पंकज जौली बीजेपी उम्मीदवार के लिए रुकावट बन सकते हैं. प्रह्लाद नगर,देवपुरी और दश्मेश नगर जैसे कई इलाके हैं, जो पंजाबी वोट वाले हैं. तो इन आंकड़ों कोदेखते हुए कहा जा सकता है कि इस बार लक्ष्मीकांत वाजपेयी के लिए राह आसान नहीं.वोटरों का जाति प्रतिशतमेरठ जिले के अंदर सात विधानसभा सीटें आती हैं. सिवालखास, सरधना, हस्तिनापुर,किठौर, मेरठ कैंट, मेरठ शहर, मेरठ दक्षिण. पूरे जिले में जातियों का आंकड़ा ये है-दलित - 16 परसेंट मुस्लिम- 25 परसेंट ब्रह्मण- 08 परसेंट--------------------------------------------------------------------------------https://www.youtube.com/watch?v=qk0alksFn7oये भी पढ़ेंUP के उस ज़िले से ग्राउंड रिपोर्ट, जहां चारों विधायक समाजवादी पार्टी के हैंवरुण गांधी के सुल्तानपुर से UP इलेक्शन की ग्राउंड रिपोर्टमैनपुरी से ग्राउंड रिपोर्ट 2: किशनी और करहल विधानसभाओं का हाल