कोई सुबह के 10 बजे होंगे. गाड़ी आ गई थी. लेकिन जिस तरफ जाना था, उधर पेट्रोल पंपदूर था. जबकि दूसरी तरफ महज एक-डेढ़ किलोमीटर दूर. चल दिए पेट्रोल भराने. रस्ते मेंसड़क किनारे कतार थी. उस कतार में कुछ थक कर बैठ गए थे, तो कुछ खड़े थे. मैं गलत नहींसोच रहा था कि 'ये कतार बैंक की होगी.' अमरोहा जिले में ये जगह थी सैदनगली. सैदनगलीमहज़ नाम से अभी तक गांव है, मगर मेहनतकशों के लिए रोज़गार का मरकज़ बनती जा रही है.कतार में खड़े लोगों से बात इसलिए नहीं कर पाया, क्योंकि अभी ज़िला अमरोहा का चक्करलगाना था. कुछ पत्रकारों, लोगों और मंत्री महोदय से मिलने का टाइम मुकर्रर हो गयाथा.--------------------------------------------------------------------------------ये सफर आपके लिए था, ताकि हाल-ए-अमरोहा को बयान किया जा सके. चुनावी सरगर्मी सेमुखातिब कराया जा सके. बताया जा सके कि नोट बंदी का क्या असर है. कौन कितने पानीमें है. इस जिले में मौजूदा चारों विधायक समाजवादी पार्टी के हैं. और अखिलेश खेमेने इस बार भी उन्हें ही उमीदवार बनाया है. दो कैबिनेट मिनिस्टर हैं. बसपा पिछली बारयहां हर सीट पर दूसरे नंबर पर रही थी. मगर इस बार स्थिति कुछ और है. तो पढ़िए यहांपीएम मोदी का क्या असर है और AIMIM के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी क्या पाठ पढ़ा रहेहैं.उत्तर प्रदेश का वो ज़िला जो पीतल नगरी यानी मुरादाबाद का हिस्सा था. 1997 में ज़िलाबना, वो भी ज्योतिबा फुले नगर नाम से. जिसे बाद में अखिलेश सरकार ने फिर से अमरोहानाम दे दिया. हां ये वही अमरोहा है. जहां के फिल्म डायरेक्टर, प्रोडूसर कमाल अमरोहीहुए. और पाकीज़ा, महल, रज़िया सुल्तान जैसी फ़िल्में दीं. मुग़ले आज़म में बेहतरीनडायलॉगबाज़ी के लिए फिल्म फेयर मिला.शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं आप, वो, जी, मगर यह सब क्याहै तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतींअमरोहा वो जिला जो मेरठ, बिजनौर, मुरदाबाद, संभल जिलों से घिरा हुआ है. NH-24 सेजुड़ा हुआ है. गंगा बहती है. तिगरीधाम है. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगामेला, जिसमें लाखों लोग आते हैं. इतना बड़ा आयोजन की स्कूल की छुट्टियां हो जातीहैं. जिले की साक्षरता दर 64 फीसद के करीब है. खैर इतिहास तो गूगल भी कर सकते हो.हम आपको वो बात बताते हैं जिसको लेकर नेता बेचैन हैं. बिसातें बिछ रही हैं. कबड्डीके खेल की तरह पाले खीचें जा रहे हैं. लोगों को अपनी टीम में शामिल किया जा रहा है.चार विधानसभा हैं यहां पर. अमरोहा, नौगावां सादात, हसनपुर और धनौरा. वाह! पंक्तियांपढ़कर खुश हो गए. इसको लिखना वाले शायर जॉन एलिया भी अमरोहा के थे. उर्दू शायरी मेंअमरोहा अपनी एक पहचान रखता है. अमरोहा वो जिला जहां से क्रिकेटर चेतन चौहान नेबीजेपी को पहली बार 1991 में लोकसभा सीट दिलाई और वो दो बार वहां से सांसद बने. औरदो बार दूसरे नंबर पर रहे. और मौजूदा सांसद बीजेपी के कंवर सिंह तंवर हैं. जातियोंकी बात करें तो संख्या के हिसाब से पहले नंबर पर जाट, दूसरे पर मुसलमान, तीसरे परखड़गवंशी हैं. इसके बाद गुर्जर, चौहान, बनिया आते हैं.ये मौजूदा विधायक हैं. अखिलेश खेमे ने इस बार भी इन्हें ही अपना उम्मीदवार बनायाहै.हसनपुर विधानसभासैद नगली से हसनपुर रवाना हुआ. रास्ते में सपा सरकार में फ़ूड एंड सिविल सप्लाइजमिनिस्टर कमाल अख्तर का होम टाउन उझारी पड़ता है. कहीं कोई चुनावी सुगबुगाहट नहीं.हसनपुर में उनके ऑफिस पर पहुंचे. कुछ फरियादी बैठे मिले. उनके चेहरे की शिकन उनकीउमीदी और न उम्मीदी को बयान कर रही है. मंत्री जी बाहर आते हैं. बाल बिखरे हुए.लोगों का एक झुंड भी उनके साथ बाहर निकलता है. किसी की फरियाद उन तक पहुंचती है, वोनिर्देश देते हैं. कुछ को आचार संहिता की बात कहते हैं कि अब कुछ नहीं होगा. आचारसंहिता लग गई है. कुछ भीड़ कम होती है. मुझे अंदर बुलाया जाता है. और सवाल-जवाबों कासिलसिला शुरू.कमाल अख्तर अपने कार्यालय पर.सवाल: क्या तैयारी है चुनाव की. जबकि सपा में अभी तक बाप-बेटे की जंग जारी है. कमालअख्तर: इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. वो आपस का मैटर है जल्द ही सुलट जाएगा. सब अखिलेशयादव को सीएम देखना चाहते हैं. सवाल: नोटबंदी से लोग परेशान हुए फिर भी ये ही कहरहे हैं वोट मोदी को देंगे. कमाल अख्तर: आप कतार में जाकर पूछिए. किसानों से पूछिए.मजदूरों से पूछिए. कितनी परेशानी हुई. लोग नाराज़ हैं. हमने काम कराया है उसी कोलोगों के बीच लेकर जाएंगे. सवाल: लोकसभा चुनाव में ज़बरदस्त वोट ध्रुवीकरण हुआ औरआपकी पत्नी को बीजेपी नेता कुंवर सिंह तंवर से हार मिली. इसबार कैसे उस स्थिति कोरोकेंगे. कमाल अख्तर: देखिए कुछ जाति पाति नहीं होती. ये सब चुनाव में बरगलाया जाताहै. मैं विधायक हूं. मैंने अपने इलाके में सड़क बनवाई उसपर मुसलमान ही नहीं चलेंगे.मैंने कॉलेज बनवाया उसमें सिर्फ मुसलमान ही नहीं पड़ेंगे. बिजली की व्यवस्था मेंसुधार कराया. बिजली घर बनवाए उसका इस्तेमाल सिर्फ मुसलमान नहीं करेंगे. सबके लिएकाम किया है, सब वोट भी करेंगे. और पिछली बार भी सबके वोट मिलने पर विधायक बना था.इस बार भी जीतेंगे. ध्रुवीकरण जैसा यहां कुछ नहीं होगा. बीजेपी की राजनीतिध्रुवीकरण पर टिकी है, मगर लोग समझ गए हैं कि केंद्र की मोदी सरकार क्या कर रही है.यूपी के लोग अखिलेश यादव को फिर से सीएम देखना चाहते हैं. क्योंकि उन्होंने विकासकराया है.सवाल: आप बीजेपी की राजनीति की बात कर रहे हैं. आपकी सरकार में ही कई दंगे हुए.कमल अख्तर: आप देखिए गुजरात में दंगा होता है, कितने दिन तक चलता है. हरियाणा मेंबवाल होता है कितने दिन चलता है. अब कहीं कोई फसादी हंगामा खड़ा कर देता है. तो येतो पता नहीं होता कहां क्या हो जाए. लेकिन मुज़फ्फरनगर में बवाल हुआ सपा सरकार नेउसको फौरन दबा दिया. आगे नही बढ़ने दिया.सवाल: लेकिन ये भी देखा गया कि लोग कैंप में थे. ठंड में ठिठर रहे थे. और सपा सैफईमहोत्सव में डूबी थी.कमाल अख्तर: आप सपा के सैफई महोत्सव पर सवाल उठा रहे हैं. आप बताइए क्या दिवालीहोती तो क्या कोई मनाता नहीं. ईद होती तो क्या कोई मनाता नहीं. होली होती तो क्याकोई मनाता नहीं. सैफई महोत्सव एक संस्कृति है. और उसका टाइम तय है. जिसमें लोगशामिल होते हैं. उसे टाला तो नहीं जा सकता था. जब उनसे सवाल किया, जितने त्योहारआपने गिनाए, उनके धार्मिक महत्व हैं क्या सैफई महोत्सव भी ऐसा है? कोई जवाब नहींथा. गोलमोल राजनीतिक बयान. यानी अपनी चित और अपनी पट वाली बात.मंत्री भले नकारें, लेकिन ध्रुवीकरण होने के पूरे आसार हैंध्रुवीकरण को भले ही कमाल अख्तर नकार रहे हैं. लेकिन मौजूदा हालात में पूरे जिले केअंदर ध्रुवीकरण लोगों के दिल में है. साल 2014 में हुए लोकसभा में कमाल अख्तर कीपत्नी हुमैरा अख्तर इसी वजह से हार गईं. अमरोहा विधानसभा से 36 हज़ार वोट से आगेरहीं. और बाकी तीन जगह से उन्हें कम वोट मिला, क्योंकि मुस्लिम कम थे.हसनपुर की राजनीति में 30 साल से शामिल चमन अंसारी पांच बार से वार्ड मेंबर हैं.चमन कहते हैं, नोट बंदी का कोई असर चुनाव पर नहीं दिखता. जो वोट मंत्री कमाल अख्तरका है उसे कोई ले नहीं सकता. और जो नहीं है वो कोई दिला भी नहीं सकता. आप बैंक कीलाइन में जाकर पूछिए कि ये फैसला कैसा है. तो मुसलमान कहेंगे जी बर्बाद कर दियाइसने. और हिन्दू कहेंगे परेशानी हुई, मगर फैसला सही है. थोड़ी बहुत परेशानी तो झेलली जाएगी. यानी ये ध्रुवीकरण के आसार हैं.'ध्रुवीकरण का ये सबूत देखिये ॐ के साथ प्रचार. ऐसा दो तीन दीवारों पर मैंने खुददेखा.इसी बात से इत्तेफाक स्थानीय बीजेपी नेता पंचू अग्रवाल रखते हैं. कहते हैं, 'ऐसानहीं है कि अखिलेश ने काम न कराया हो. या फिर हसनपुर के विधायक कमाल अख्तर ने अपनेइलाके में कुछ न किया हो. लेकिन न तो ये काम लोगों के दिमाग में है और न नोटबंदी काकोई असर है. बस जाति वाला ही फैक्टर है. ये चुनाव पूरी तरह जातियों पर टिका है. तभीतो बसपा ने जातियों के हिसाब से चारों विधानसभा पर टिकट दिए हैं'बैंक की कतार में थक कर बैठ गए.जिले की चारों विधान सभा के कई इलाकों में घूमा. जहां बैंक थे वहां कतारें थीं. औरजिन एटीएम में कैश था, वहां जमघट था. बाकी एटीएम असुविधा के लिए खेद जता रहे थे.हसनपुर विधानसभा से बसपा ने गंगासरन को मैदान में उतारा है. वो पिछली बार के चुनावमें दूसरे नंबर पर रहे थे. यानी पकड़ मज़बूत है. गंगासरन खड़गवंशी हैं. बीजेपी का अभीकैंडिडेट तय नहीं. बीजेपी से टिकट की दौड़ में पहले नंबर पर चन्द्रपाल खड़गवंशी,दूसरे पर महेंद्र खड़गवंशी और तीसरे पर रामपाल का नाम है. जातीय समीकरण को देखते हुएलगता है बीजेपी भी खड़गवंशी को ही मैदान में उतारेगी. क्योंकि उनकी तादाद विधानसभामें अच्छी खासी है. ऐसे में सपा कैंडिडेट को ही मजबूती मिलेगी. चुनाव की तिथि घोषितहोते ही पूरे जिले में चुनावी होर्डिंग उतार फेके गए हैं. दीवारों पर कट्टम काट करदी गई है. कहीं कोई मुबारकबाद का होर्डिंग भी दिखाई नहीं पड़ता.अमरोहा विधानसभाहिंदुस्तान न्यूज़पेपर के ब्यूरो चीफ शैलेन्द्र सिंह कहते हैं. 'अमरोहा में 103एटीएम हैं. जिनमें से सिर्फ 20 से 25 में कैश आ रहा है और खत्म हो जा रहा है. मगरइसका चुनाव पर कोई असर नहीं. सारा खेल जातियों पर टिका है. जो सेंध लगा गया, समझोवो जीत गया.' पत्रकार शैलेन्द्र बताते हैं कि अमरोहा में तक़रीबन 65 फीसदी मुसलमानहैं. इस वजह से सपा नेता महबूब अंसारी का जीतना तय है. जब पिछली बार लोकसभा इलेक्शनमें ध्रुवीकरण हुआ तो बीजेपी नेता कंवर सिंह तंवर अमरोहा विधानसभा से 36 हजार वोटोंसे पीछे रह गए. सारा वोट सपा नेता कमाल अख्तर की पत्नी को गया. इस बार भी ध्रुवीकरणमहबूब अली को जिता देगा और वो लगातार तीन बार से विधायक बन रहे हैं. एक दूसरी वजहये है कि कोई भी विपक्षी उम्मीदवार उनके मुकाबले का नहीं है, जो उनके धाकड़पन सेमुकाबला कर पाए.' अमरोहा के ही एक जनाब अपना नाम नहीं बताते, मगर बात बहुत पते कीकहते हैं. 'महबूब वो शख्स है जो मूंछों को एक बार ताव दे दे तो वोट सिमट आएं. कौनपंगा ले. सबको अपना काम धंधा चलाना है.' दूसरी तरफ ये भी अमरोहा में सुनने को मिलाकि अगर रिक्शा वाला भी अपने झगड़े में महबूब को फ़ोन कर दे. तो महबूब चले आते हैं,भले ही कुछ न करे. इससे लोग खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं जो उनके जीतने के आसारको मज़बूती देते हैं.AIMIM ने भी यहां दस्तक दी है. असदउद्दीन ओवैसी ने यहां शमीम अहमद तुर्क को चुनावमें उतारा है. इसकी वजह है यहां मुस्लिम तुर्क की तादाद का ज्यादा होना. लेकिनमुसलमानों को लगता है कि ओवैसी बीजेपी एजेंट हैं जो महबूब का हराना चाहते हैं. अगरवो मुस्लिम के पक्षधर होते तो यहां कैंडिडेट ही नही उतारते. बल्कि किसी हिंदू कोटिकट देते. ये बातें सिर्फ अमरोहा विधानसभा में ही नहीं हैं , बल्कि जहां मुस्लिमहैं वहां ये बातें आम हैं और ये चर्चाएं महबूब अली को और फायदा पहुंचा रही हैं. एकदो जगह अमरोहा में AIMIM के बोर्ड लगे दिखाई दिए जो शायद उतरने से बचे रह गए.नौगावां विधानसभायहां मौजूदा विधायक सपा के अशफाक खां हैं. और अखिलेश की तरफ से जो लिस्ट जारी हुईहै, उसमें अशफाक को फिर से टिकट दिया गया है. बसपा ने जयदेव सिंह को उतारा है. येविधानसभा चौहान और जाटों से भरपूर है. और कयास लगाया जा रहा है कि बीजेपी किसीचौहान को मैदान में उतारेगी. ऐसे में यहां बीजेपी मज़बूत नजर आती है. अशफाक की छविअच्छी है, मगर ध्रुवीकरण में फीकी पड़ जाती है. मुकाबला सपा और बीजेपी के बीच है.क्योंकि मुसलमानों को लग रहा है किसी और को वोट दिया तो बेकार हो जाएगा. बसपा काकैंडिडेट कमज़ोर पड़ना मतलब बीजेपी की जीत. यहां सपा में अंदरूनी कलह की भी खुसफुसाहटहै, क्योंकि अखिलेश के करीबी मौलाना जावेद आब्दी अशफाक का पत्ता काटकर खुद चुनावलड़ने की जुगत में हैं. ऐसा होता है तो अशफाक निर्दलीय चुनाव लड़ जाएंगे. यानी जीतनाआसान नहीं है. हां अगर लोकदल, कांग्रेस और सपा का गठबंधन होता है तो यहां जातीयसमीकरण उलट सकते हैं.अभी बीजेपी-कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं.धनौरा विधानसभारिज़र्व सीट है. एससी या एसटी उम्मीदवार. मौजूदा विधायक सपा नेता माइकल चंद्रा हैं.बसपा ने डॉ. संजीव लाल को टिकट दिया है. मामूली अंतर से ही चंद्रा ने यहां बसपा कोहराया था. इस सीट पर कुछ कहना मुश्किल है कि कौन किसपर भारी पड़ता है. त्रिकोणीयमामला है. अगर ध्रुवीकरण का हव्वा बनाया जाता है तो निश्चित तौर पर फायदा बीजेपी कोहोगा और बसपा का वोट बीजेपी में खिसक जाएगा.चारों विधानसभाओं में ध्रुवीकरण का सबसे तगड़ा नुकसान बसपा को ही है. ऐसा होने परबसपा को कुछ हाथ आने वाला नहीं है. सबकुछ सपा और बीजेपी के बीच ही बंट कर रह जाएगा.और बसपा लोकसभा चुनाव की तरह रह जाएगी. जबकि पिछली बार इन चारों विधानसभाओं परदूसरे नंबर पर रही थी. ध्रुवीकरण का ही खौफ है, जो बसपा बार बार मुस्लिमों कोबीजेपी का डर दिखा रही है. और मायावती खुद को मुस्लिमों के हमदर्द की तरह पेश कररही हैं. ताकि दलित के साथ, मुस्लिम का वोट मिल जाए और कुछ भला हो जाए.अगर विकास के काम को देखा जाए तो बिजली पहले से बहुत बेहतर हो गई है. सड़कें बनीहैं. गांवों की गलियों में भी पक्की सड़कें नज़र आती हैं. -------------------------------------------------------------------------------- वरुण गांधी के सुल्तानपुर से UP इलेक्शन की ग्राउंड रिपोर्टमैनपुरी से ग्राउंड रिपोर्ट 2: किशनी और करहल विधानसभाओं का हालUP इलेक्शन की पहली लल्लनटॉप ग्राउंड रिपोर्ट: सपा के गढ़ मैनपुरी से