कैराना की राजनीतिहुकुम सिंहकैराना में लंबे समय से राजनीतिक लड़ाई हुकुम सिंह और हसन परिवार के बीच रही है.गुर्जर समुदाय से आने वाले हुकुम सिंह की इलाके में अच्छी पैठ है और बड़े राजनीतिकदलों के मुखियों से भी उनका अच्छा परिचय है. इलाके में उन्हें 'बाबूजी' कहा जाता हैऔर मुस्लिम गुर्जर भी उन्हें वोट देते हैं. 2012 के चुनाव में हुकुम के चारोंविरोधी कैंडिडेट मुस्लिम थे, जिनके बीच मुस्लिम वोट बंटने की वजह से हुकुम सिंह 20हजार वोटों से चुनाव जीत गए. कैराना से सात बार विधायक रह चुके हुकुम 2014 लोकसभाचुनाव में बीजेपी के टिकट पर यहीं से चुनाव जीते थे. सीट खाली होने पर 2014 मेंउपचुनाव हुआ और सपा के नाहिद हसन जीतकर विधायक बन गए.हुकुम सिंहहुकुम सिंह सेना में थे और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीरके पूंछ सेक्टर में बतौर कैप्टन तैनात थे, मगर 1969 में उन्होंने रिटायरमेंट लेलिया. 1974 में वो कांग्रेस से विधायक बने और इमरजेंसी के वक्त और उसके बाद भीइंदिरा गांधी का साथ नहीं छोड़ा. हालांकि, 1980 में हुकुम जनता पार्टी में आ गए,लेकिन जब चौधरी चरण सिंह ने जनता पार्टी छोड़ी, तो हुकुम उनके साथ हो लिए, क्योंकिउन्हें पता था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के लिए उन्हें चरण सिंह कीजरूरत पड़ेगी. 1977 में जनता पार्टी के बशीर अहमद ने उन्हें हराया. 1980 में वोजनता पार्टी के टिकट पर जीते.हुकुम सिंह राजनीति1980 के पांच साल बाद हुकुम सिंह की कांग्रेस में वापसी हुई. 1985 में वो कांग्रेसके टिकट पर चुनाव जीते. 1989 में निर्दलीय राजेश्वर बंसल के हाथों हारे हुकुम सिंहउत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह और एनडी तिवारी की कैबिनेट में मंत्री भी रहे. जबनरसिंहा राव के समय कांग्रेस टूटी और तिवारी कांग्रेस बनी, तो हुकुम तिवारीकांग्रेस में आ गए. फिर वो मुलायम के साथ अपनी जगह तलाशते रहे, मगर 1994 मेंउत्तराखंड बनाने के लिए हुए रामपुर तिराहा कांड के बाद हुकुम ने बीजेपी का दामनथामा और ये करने की वजह साफ थी. रामपुर तिराहा मुजफ्फरनगर जिले में था और उस वक्तहुए गोलीबारी में 6 लोगों की जान गई थी. माहौल भांपते हुए हुकुम सिंह बीजेपी मेंचले गए. 1996 से लेकर मई 2014 तक बीजेपी विधायक रहे और अब बीजेपी सांसद हैं. हुकुमयूपी में कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह सरकार में भी मंत्री रहे.हसन परिवारनाहिद हसन2014 के उपचुनाव में जीतने वाले नाहिद हसन हुकुम के कट्टर विरोधी हसन परिवार केहैं, जिसकी नींव अख्तर हसन ने रखी थी. अख्तर ने 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेसके टिकट पर कैराना में जीत दर्ज की थी. उस चुनाव में मायावती भी थीं और वो तीसरेनंबर पर रहीं. नाहिद सपा नेता हैं और सपा-कांग्रेस ने उन पर एक बार फिर भरोसा जतायाहै.अख्तर हसन के बेटे मनव्वर हसन लंबे समय बीएसपी नेता रहे. 2007 विधानसभा चुनाव मेंवो सपा में शामिल हो गए. जनता दल के वक्त से वो मुलायम के करीबी माने जातेरहे. मनव्वर विधायक, सांसद, MLC और राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. 2008 में एक सड़कहादसे में उनकी मौत हो गई थी. नाहिद मनव्वर के बेटे हैं. अनवर और कंवर हसन मनव्वरके भाई हैं. हसन परिवार हमेशा सपा और बसपा के बीच राजनीति साधता रहा है और परिवारके सदस्य दोनों पार्टियों में अंदर-बाहर होते रहे हैं.अनवर और कंवर हसनसपा में शामिल होते समय अनवर हसनअनवर और कंवर हसन की कहानी ये है कि 2014 का उपचुनाव हारने के बाद बीएसपी ने दोनोंभाइयों को पार्टी से निष्कासित कर दिया था, लेकिन 2015 में पार्टी में वापस ले लियाथा. 2015 में बीएसपी ने अनवर को कैराना से पार्टी प्रभारी बनाया था. पिछले दिनोंउन्होंने सपा जॉइन कर ली. बीएसपी छोड़ते समय कंवर ने आरोप लगाया कि मायावती ने टिकटके लिए उनसे चार करोड़ रुपए मांगे थे और पैरों में सिर रखने के लिए कहा था. अनवर केमुताबिक वो सच्चे मुस्लिम हैं और अल्लाह के अलावा किसी को सजदा नहीं कर सकते, इसलिएउन्होंने माया के पैरों में सिर रखने से इनकार कर दिया और माया ने टिकट देने से.माया ने कहा था कि चार करोड़ देने वाले तो बहुत हैं और तुम्हें सिर झुकाने मेंदिक्कत है. कंवर का टिकट बुढ़ाना से काटा गया था, जबकि उनका दावा है कि वो पूरीतैयारी कर चुके थे.https://www.youtube.com/watch?v=t2BdhMwxz2Uकैराना के पॉलिटिकल किस्सेकैराना का सबसे बड़ा लतीफा/किस्सा तो पलायन ही है. पिछले साल जून में हुकुम सिंह नेशिगूफा फैलाया कि मुस्लिमों के अत्याचार की वजह से यहां के हिंदू परिवार पलायन कररहे हैं, जबकि पलायन की असली वजह गुंडई है, कम्युनल वायलेंस नहीं. यहां के लोग दोबातों पर सहमत हैं. पहली, यहां क्राइम बहुत ज्यादा है और दूसरी, लोग अपना घर छोड़करजा रहे हैं. ये सच है कि यहां के अधिकांश गुंडे मुस्लिम हैं और पलायन करने वालेअधिकांश लोग हिंदु. मर्डर और धमकियों में इन्हीं गुंडों के नाम सामने आते रहे हैं.यहां सबसे बदनाम मुकीम काला गैंग है, जिसके किस्से कैराना में आम हैं.मुकीम अभी जेल में है, लेकिन वहीं से अपना गैंग चलाता है. उसकी शह पर गुंडे रंगदारीवसूलते हैं. मुकीम जैसे कई संगठन हैं, जो छोटी-छोटी बातों पर लोगों को मौत के घाटउतार देते हैं. कैराना में इस गैंग के 109 लिस्टेड हिस्ट्रीशीटर हैं. इनमें से एकइकबाल काना पाकिस्तान जा चुका है. फुरकान गैंग की भी काफी दहशत है. नकली नोट, अवैधहथियार, ड्रग्स तस्करी और कई क्रिमिनल्स के पाकिस्तान से रिश्तों की बातें यहां आमहैं. यहां हिंदुओं में सबसे ज्यादा गुर्जर और फिर कश्यप हैं. अधिकांश व्यापारी हैं,क्योंकि रोजगार है नहीं. मुस्लिम गुंडे इन्हीं से रंगदारी वसूलते हैं और इनकी सुननेवाला कोई नहीं. 2014 में रंगदारी न देने पर व्यापारी शिवकुमार, विनोद और राजेंद्रकी हत्या हुई थी.मनव्वर हसन और हुकुम सिंह की राजनीतिक लड़ाई के ढेरों किस्सेकैराना में हुकुम सिंह और मनव्वर हसन की राजनीतिक लड़ाई के ढेरों किस्से सुनाई देतेहैं. मनव्वर हसन के पिता अख्तर का इस इलाके में काफी बोलबाला था. यही वजह रहीकि हुकुम सिंह के सांसद बनने के बाद कैराना सीट बीजेपी के हाथ से फिसल गई. हुकुमसिंह की पत्नी की 2010 में घर में हत्या हो गई थी और इससे दो साल पहले 2008 मेंसांसद रहते हुए मनव्वर हसन की सड़क दुर्घटना में मौत हुई थी. दोनों की रंजिश पुरानीबताई जाती है. लोगों को इस बात से अचंभा होता है कि हुकुम सिंह न तो संघ से जुड़ेरहे और न राम मंदिर आंदोलन से. ऐसे में वो कैराना को सांप्रदायिक रंग क्यों दे रहेहैं.इस बार के कैंडिडेटबीजेपीमृगांका सिंहबीजेपी ने इस बार कैराना से हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को टिकट दिया है. उनकीपढ़ाई देश के बाहर हुई है, इसलिए स्थानीय लोगों से उनका परिचय बहुत ज्यादा नहीं है.फिलहाल वो एक स्कूल चला रही हैं. 57 साल की मृगांका लोगों के बीच कहती हैं किउन्हें राजनीति से वंचित रखा गया. उनके सोशल मीडिया पेज पर मोदी, शाह, मौर्या,राजनाथ और हुकुम की फोटो है. बीजेपी के युवा कार्यकर्ता उन्हें बुआ बुलाते हैं.संपत्ति इनकी करोड़ों में है, लेकिन कार एक भी नहीं.सपा-कांग्रेससपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर से हसन परिवार के नाहिद हसन को टिकट दिया गया है, जो इससीट के मौजूदा विधायक हैं. 28 साल के नाहिद की पढ़ाई सिडनी में हुई है. उनके पासबैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री है. पिछले एफिडेविट के मुताबिक ये भीकरोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं. इनके पास ढाई करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है,लेकिन कार एक भी नहीं है. नाहिद पर कांधला कांड में रेलवे संपत्ति को नुकसानपहुंचाने और बलवा की विभिन्न धाराओं में मुकदमें दर्ज हैं. कांधला रेलवे स्टेशन औरथाने पर हुए बवाल में इनकी भूमिका मानी जाती है. हंगामा कर रही भीड़ के बीच नाहिदने भाषण दिया था और कैराना से पलायन के मुद्दे पर चुप रहे.बीएसपीबीएसपी की ओर से कैराना में दिवाकर देशवाल को उतारा गया है. दिवाकर ने एफिडेविट मेंदिखाया है कि उनके पास सिर्फ एक लाख रुपए हैं और कार नहीं है. उनकी पत्नी पूनम केनाम पर हापुड़ के विजया बैंक में 50 हजार रुपए का कर्ज है. खुद के पास एक लाख केअलावा इनकी पत्नी के पास ढाई लाख नकद, तीन लाख के 100 ग्राम सोने के जेवर समेत कुल5,67,369 की संपत्ति है.रालोदरालोद में शामिल होते समय अनिल चौहान (बीच में)रालोद ने कैराना में अनिल चौहान को उतारा है, जो मृगांका के चचेरे भाई और हुकुमसिंह के भतीजे हैं. अनिल बड़े जोर-शोर से कैराना में कैंपेनिंग कर रहे थे और अपनाटिकट पक्का मानकर चल रहे थे, लेकिन बीजेपी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. इससे नाराजहोकर पिछले दिनों वो रालोद में शामिल हो गए, जहां से उन्हें टिकट मिल गया. हुकुम केफार्म हाउस पर चल रही मृगांका की मौजूदगी वाली एक मीटिंग में अनिल ने खुलेआम कहाथा, 'उपचुनाव में मैं सिर्फ हजार वोटों से हारा था. मैंने क्षेत्र में मेहनत की हैऔर कोई गलत काम नहीं किया. मैं पल्ला पसारकर कहता हूं कि सांसदजी, आप वरिष्ठ नेताहैं. मुझे टिकट दिलवा दीजिए.'कैराना में वोटों का जाति प्रतिशतकैराना में मुस्लिम ज्यादा हैं. इनमें गुर्जर भी हैं. इनके बाद कश्यप और जाट वगैरहआते हैं. ब्राह्मण यहां लगभग निल हैं. अगर मुस्लिम वोट आपस में नहीं बंटते, तोमुस्लिम कैंडिडेट आसानी से जीत जाते हैं, भले ही वो किसी भी पार्टी से हों. वोटबंटने पर हिंदू कैंडिडेट जीतता है. बीजेपी की यहां यही कोशिश रहती है कि किसी भीतरह गुर्जर, कश्यप और जाटों को एक करके चुनाव निकाला जाए. जानिए बाकी वोटर्स केबारे में:कुल वोटर: 2,99,980 ब्राह्मण: 11 हजार (3.5%) क्षत्रिय: 4,800 वैश्य: सात हजारमुस्लिम: 1,24,120 (42.19%) गुर्जर: 25 हजार (11%) कश्यप: 34 हजार (11.65%) एससी:36 हजार (12.15%)--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:शामली से ग्राउंड रिपोर्ट: मदरसे की छत पर तिरंगा था, मगर दिखावा नहीं थाबागपत से ग्राउंड रिपोर्ट : यहां विधायक बनते हैं, सड़क नहीं बनतीअतरौली से ग्राउंड रिपोर्ट: एक परिवार से दिल्लगी तमाम समीकरणों पर भारी हैबुलंदशहर से ग्राउंड रिपोर्ट: 'अखिलेश ने काम तो किया, मगर वोट हाजी को ही जाएगा'हेलिकॉप्टर से उड़ने वाले ये नेताजी कहते हैं, 'वोट मांगने में शर्म आती है'