वरुण गांधी के सुल्तानपुर से UP इलेक्शन की ग्राउंड रिपोर्ट
क्या अखिलेश ने काम किया है? क्या नोट बैन से लोग नाराज़ हैं?
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फोटो - thelallantop
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लखनऊ चले गए, कुछ दिल्ली चले गए
जितने थे सब यहां, उजाड़े चले गए
दो दिन की ज़िंदग़ी में क्या हिंदू मुसलमां जुम्मन मियां से कह के ये पांड़े चले गए
रफीक सादानी फैज़ाबाद के शायर थे, लेकिन ऊपर की लाइनों से आप पड़ोसी ज़िले सुल्तानपुर के मिजाज़ से भी जोड़ सकते हैं.
अवध के इस जिले का बड़ा हिस्सा देहाती इलाके में आता है. रोजगार के साधन कम हैं. साक्षरता दर 69 फीसदी है. ज्यादातर लोग खेती और बचे हुए छिटपुट दुकानदारियां करते हैं. इसलिए जिन्हें मौका मिला; दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, मुंबई और सूरत जैसे शहरों में जा बसे और छोटा-मोटा काम करके कमाने लगे.
दिल्ली और लखनऊ के कैमरों की निगाह इस ज़िले पर ज्यादा नहीं रही. लेकिन 2014 के बाद 'दूसरे गांधी के इलाके' के तौर पर इसे नया संदर्भ मिला. राहुल गांधी के क्षेत्र अमेठी से 32 किलोमीटर दूर ही 'बीजेपी के गांधी' वरुण का इलाका शुरू होता है. 'इलाका' असंसदीय शब्द लगे तो इसे 'संसदीय क्षेत्र' पढ़कर संसदीय कर लें.
यहां विकास की वे सभी संभावनाएं हैं, जिनकी बात आज कल घोषणापत्रों में की जाती हैं. जाति और स्त्री को लेकर पुरातन सोच हावी है. व्हॉट्सएप पहुंच गया है, पर तमाम 'इज़्म' अभी बहुत दूर हैं. ब्राह्मण, मुसलमान और गैर-यादव पिछड़ों की खासी आबादी है. हिंदू और मुसलमान दोनों रूढ़ि के स्तर तक धार्मिक हैं, लेकिन हिंसक सांप्रदायिक संघर्षों से ये इलाका लगभग बचा रहा है. इसका ये अर्थ नहीं कि यहां दबंगों और दबंगई को सम्मान नहीं मिलता. वे हैं और खलिहरों की महफिलों में उनकी आपराधिक जुर्रतों के कसीदे पढ़े जाते हैं.
उत्तर प्रदेश के पश्चिम और पूरब के इलाकों में संस्कृति और बोल-चाल का ही फर्क नहीं है, राजनीतिक तौर तरीके भी भिन्न हैं. पश्चिमी हिस्से को दिल्ली से नजदीकी का जो फायदा मिला है, पूरब को लखनऊ से करीबी का वैसा फायदा नहीं हुआ. सुल्तानपुर में 5 विधानसभा सीटें हैं. पांचों सपा के पास हैं.

रेलवे स्टेशन के सामने लगा होर्डिंग.
शहर से दूर के इलाकों में भी दावेदारों के खूब बैनर-पोस्टर दिख रहे हैं. सपा के बैनर शहर में ज्यादा दिखते हैं. बसपा ने अभी प्रकट प्रमोशन में ज्यादा पैसा इनवेस्ट नहीं किया है. शहर के एक मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरते हुए कांग्रेस के पोस्टर दिखे, वरना वह हर जगह गायब सी ही दिखती है.

लोहरामऊ के विनय विश्वकर्मा ने बताया कि बैंकों के अलावा जन सुविधा केंद्र से भी पैसा मिल जाता रहा है. डेबिट कार्ड स्वाइप कराइए और कैश ले जाइए. हजार-दो हजार तक में दिक्कत नहीं है. हनुमानगंज के पास गोपालपुर गांव के गिरधारी शुक्ल कहते हैं, 'एसे सिरफ बड़मनई डरान अहां. भाजपा का वोट के न दे? जेकर पइसा डूबि गय, ऊ न दे.'
सेमरी रोड: दोनों तरफ देहात हैं.
सुल्तानपुर से सेमरी होते हुए अकबरपुर जाने वाली सड़क कभी अपने गड्ढों के लिए कुख्यात थी. अब यह दिल्ली-नोएडा वाली फील देती है. सुल्तानपुर जंक्शन से सटा पखरौली स्टेशन अब एक जंक्शन में तब्दील किया जा रहा है. आस-पास के गांवों के लोग इससे बहुत खुश हैं. जिले में NH-56 को चार लेन का बनाया जा रहा है, जिससे किसानों को अपनी जमीन के बदले तगड़ा मुआवजा मिला है. कुछ जगहों पर ये 8 लाख प्रति बिस्वा और कुछ जगहों पर 16 लाख प्रति बिस्वा. सुल्तानपुर जैसे जिले में जमीन की ऐसी कीमत के बारे में किसान सपने में भी नहीं सोचता था. इसने एक और दिलचस्प चीज की है कि जातीय समीकरणों को उलट दिया है.
पखरौली जंक्शन बन रहा है. दिल्ली से आने वाली ट्रेनें रुका करेंगी.
पखरौली के पास गोपालपुर गांव में नाऊ (नाई) जाति के एक परिवार को 80 लाख से ज्यादा का मुआवजा मिला है. यह जाति ओबीसी में आती है और ब्राह्मण घरों में पूजा-पाठ और शादी के संस्कारों में उनका अहम रोल होता है. मुआवजा मिलने के बाद उन्होंने अपना घर बड़ा करवा लिया है, स्कॉर्पियो खरीद ली है और गांव में ही टेंट हाउस का काम शुरू कर दिया है. मैं उन्हीं की मुलायम रजाई में सोया. वह किसी मायने में देहाती रजाई नहीं थी. घर की बुजुर्ग महिला एक ब्राह्मण परिवार के यहां तेरहवीं के प्रोग्राम में पहुंचीं, लेकिन कम नेग भी स्वीकार कर लिया. उनसे पूछा कि आप अपनी बहुओं को साथ क्यों नहीं लातीं सिखाने के लिए तो बोलीं, 'हम सब इनकी पुरानी प्रजा हैं, तो कर लेते हैं. वरना बच्चे अब मना करते हैं. अब कौन करेगा.'
ये लोग जाहिर है, भाजपा को लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखे.

हनुमानगंज में ब्राह्मणों के जो पोस्टर लगे थे, उनमें मोदी, अमित शाह, राजनाथ, कलराज मिश्र, वरुण गांधी दिखे. यहां तक कि उमा भारती और केशव प्रसाद मौर्य भी दिखे. लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य नहीं दिखे. यहीं जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष सीताराम वर्मा का पोस्टर दिखा, जिसमें तमाम बड़े भाजपाई नेताओं के साथ स्वामी प्रसाद मौर्य की तस्वीर भी थी. निवेदकों में चौरसिया, मौर्य, अग्रहरि, पटेल और निषाद उपनाम के लोग थे.
एक और दिलचस्प चीज. ज्यादातर पोस्टरों पर बीजेपी का यूपी मिशन '265+' का टारगेट लिखा था. लेकिन एकाध पोस्टरों पर मिशन '300+' लिखा हुआ भी दिखा. कौन सा पोस्टर पहले का है और कौन सा बाद का, ये पता नहीं चल सका. एक पेट्रोल पंप पर रुकना हुआ तो वहां एक बड़ा विज्ञापन प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ लगा था. इस पर लिखा था, 'कर चोरी की लड़ाई में मेरा पैसा सुरक्षित है.' सुल्तानपुर शहर में मौजूदा सपा विधायक अनूप संडा के होर्डिंग दिखे, जिस पर लिखा था, 'यूपी होगा उत्तम प्रदेश, 2017 में फिर से अखिलेश.' सपा के कुछ दावेदारों के पोस्टरों से अखिलेश गायब दिखे और मुलायम-शिवपाल ही नजर आए.
ब्रजेश शुक्ल मोटरसाइकल से पूरा ज़िला घूमते हैं. उन्होंने बताया कि कुछ इलाकों में बिजली अब 18 घंटे आने लगी है और लोग इससे खुश हैं. बरसों से उपेक्षित रहे इस ज़िले में पिछले पांच साल में जो काम हुए हैं, उसके हिसाब से सपा को इस बार शानदार स्थिति में होना चाहिए. ब्रजेश कहते हैं, 'क्या पता वो हो भी?'

वरुण गांधी ने किसानप्रिय सांसद बनने की कोशिश की है. वे राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, लेकिन मोदी और शाह की जोड़ी से अच्छे रिश्ते नहीं हैं. इसका असर लोकल कार्यकर्ताओं पर पड़ता है. पार्टी नेतृत्व और वरुण के बीच दूरियों से लोगों को लगता है कि सांसद के तौर पर वे सुल्तानपुर को वो सब नहीं दे पा रहे, जो केंद्र से जिले को मिल सकता था. वरुण की अनदेखी नहीं हो रही है, लेकिन सीडी कांड के बाद वह बहुत ताकतवर स्थिति में नहीं हैं. एक बीजेपी कार्यकर्ता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि 2017 के विधानसभा चुनाव अब वरुण गांधी की जिम्मेदारी नहीं रह गए. जिले की सीटों पर लखनऊ से ज्यादा स्थिर नजर रखी जा रही है.
इस पूरे चुनाव में एक बड़ा नाम है, जिसकी ज़िले भर में चर्चा है. वो हैं हिस्ट्रीशीटर चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' जो सुल्तानपुर सदर सीट से बीजेपी का टिकट मांग रहे हैं. वह इसौली से दो बार सपा के टिकट पर विधायक रहे हैं. 2006 में हुई इलाहाबाद के सदानंद तिवारी उर्फ संत ज्ञानेश्वर नाथ और उनके 7 चेले-चपाटियों की हत्या कर दी गई. चंद्रभद्र सिंह पर ही मुख्य आरोप आया. इसके बाद वो सपा छोड़कर बसपा में चले गए.

2014 चुनाव से पहले हवा का रुख भांप वो भाजपा में आ गए. वरुण गांधी के साथ जगह जगह घूमकर प्रचार किया. 'जय महाकाल की, चिंता नहीं बवाल की' वाली राजनीति करते हैं. दबंगई पर जान लुटाने वाले क्षेत्र में उन्हें पसंद करने वालों की खासी संख्या हैं. सुल्तानपुर शहर की एक मशहूर पान की दुकान पर एक पत्रकार ने कहा कि चंद्रभद्र 'सोनू' को सदर से टिकट मिला तो अनूप संडा का टिकना मुश्किल होगा. फेसबुक पर सोनू के फैन्स उन्हें सुल्तानपुर का भावी सांसद बताते हैं.
मोटामोटी जिले में चुनावी माहौल अभी तैयार हो रहा है. लोग सोचने लगे हैं कि वोट किसे दिया जाए. लेकिन उम्मीदवारों के नाम के ऐलान का इंतजार हो रहा है. जिसके बाद ही वोटर फाइनल मन बनाएगा.
सुल्तानपुर के इस दौरे पर दिहाड़ी मजदूरों और मुसलमानों से बात नहीं हो सकी. लेकिन सुनी सुनाई बात वही है जो अभी पूरे प्रदेश के बारे में कही जा रही है. मुसलमानों ने अपना मन अभी नहीं बनाया है और वे उसी पुराने पैटर्न पर वोट देंगे. इस बार सपा और बसपा दोनों मजबूत हैं, इसलिए उनका वोट विधानसभाओं के मुताबिक, दोनों पार्टियों में बंटता नजर आ रहा है.
देखिए! वक्त लगा तो एक बार फिर वहां की डिटेल्ड रिपोर्ट लेकर आएंगे.
दो दिन की ज़िंदग़ी में क्या हिंदू मुसलमां जुम्मन मियां से कह के ये पांड़े चले गए
रफीक सादानी फैज़ाबाद के शायर थे, लेकिन ऊपर की लाइनों से आप पड़ोसी ज़िले सुल्तानपुर के मिजाज़ से भी जोड़ सकते हैं.
अवध के इस जिले का बड़ा हिस्सा देहाती इलाके में आता है. रोजगार के साधन कम हैं. साक्षरता दर 69 फीसदी है. ज्यादातर लोग खेती और बचे हुए छिटपुट दुकानदारियां करते हैं. इसलिए जिन्हें मौका मिला; दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, मुंबई और सूरत जैसे शहरों में जा बसे और छोटा-मोटा काम करके कमाने लगे.
दिल्ली और लखनऊ के कैमरों की निगाह इस ज़िले पर ज्यादा नहीं रही. लेकिन 2014 के बाद 'दूसरे गांधी के इलाके' के तौर पर इसे नया संदर्भ मिला. राहुल गांधी के क्षेत्र अमेठी से 32 किलोमीटर दूर ही 'बीजेपी के गांधी' वरुण का इलाका शुरू होता है. 'इलाका' असंसदीय शब्द लगे तो इसे 'संसदीय क्षेत्र' पढ़कर संसदीय कर लें.
4,440 स्क्वायर किलोमीटर में फैला, देहाती वोटरों और अवधी बोली वाला, सुल्तानपुर. मजरूह सुल्तानपुरी वाला सुल्तानपुर. अवध की शामों में जहां चाय की चुस्कियों के साथ अब चुनाव की बातें होने लगी हैं.

यहां विकास की वे सभी संभावनाएं हैं, जिनकी बात आज कल घोषणापत्रों में की जाती हैं. जाति और स्त्री को लेकर पुरातन सोच हावी है. व्हॉट्सएप पहुंच गया है, पर तमाम 'इज़्म' अभी बहुत दूर हैं. ब्राह्मण, मुसलमान और गैर-यादव पिछड़ों की खासी आबादी है. हिंदू और मुसलमान दोनों रूढ़ि के स्तर तक धार्मिक हैं, लेकिन हिंसक सांप्रदायिक संघर्षों से ये इलाका लगभग बचा रहा है. इसका ये अर्थ नहीं कि यहां दबंगों और दबंगई को सम्मान नहीं मिलता. वे हैं और खलिहरों की महफिलों में उनकी आपराधिक जुर्रतों के कसीदे पढ़े जाते हैं.
उत्तर प्रदेश के पश्चिम और पूरब के इलाकों में संस्कृति और बोल-चाल का ही फर्क नहीं है, राजनीतिक तौर तरीके भी भिन्न हैं. पश्चिमी हिस्से को दिल्ली से नजदीकी का जो फायदा मिला है, पूरब को लखनऊ से करीबी का वैसा फायदा नहीं हुआ. सुल्तानपुर में 5 विधानसभा सीटें हैं. पांचों सपा के पास हैं.

पहली चीज: होर्डिंग और बैनर सिर्फ भाजपा के झमाझम हैं
सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन से निकलते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर वाला एक बड़ा होर्डिंग दिखता है. किसी लोकल नेता ने नहीं, यूपी बीजेपी ने लगवाया है. काले धन पर पीएम के कड़े फैसले का अभिनंदन करते हुए. पूरे ज़िले में घूमें तो नोटिस करेंगे कि सबसे ज्यादा खर्च बीजेपी की तरफ से ही किया गया है.
रेलवे स्टेशन के सामने लगा होर्डिंग.शहर से दूर के इलाकों में भी दावेदारों के खूब बैनर-पोस्टर दिख रहे हैं. सपा के बैनर शहर में ज्यादा दिखते हैं. बसपा ने अभी प्रकट प्रमोशन में ज्यादा पैसा इनवेस्ट नहीं किया है. शहर के एक मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरते हुए कांग्रेस के पोस्टर दिखे, वरना वह हर जगह गायब सी ही दिखती है.
नोट बैन का असर
शहरी आबादी यहां न के बराबर है. ये बात थोड़ी चौंकाने वाली है कि गांवों में जितने लोगों से बात हुई, ज्यादातर नोटबंदी को सकारात्मक और साहसी फैसला मानते हैं. लोग यहां एक बड़े भू-भाग पर छितराए हुए रहते हैं. पॉपुलेशन डेंसिटी कम है. बड़े खर्च नहीं है और सर्विस सेक्टर के लोग हैं नहीं. इसलिए नोट बैन से यहां वैसी मुश्किलें नहीं हुईं, जैसी दिल्ली जैसे सघन शहरों में हुईं.
लोहरामऊ के विनय विश्वकर्मा ने बताया कि बैंकों के अलावा जन सुविधा केंद्र से भी पैसा मिल जाता रहा है. डेबिट कार्ड स्वाइप कराइए और कैश ले जाइए. हजार-दो हजार तक में दिक्कत नहीं है. हनुमानगंज के पास गोपालपुर गांव के गिरधारी शुक्ल कहते हैं, 'एसे सिरफ बड़मनई डरान अहां. भाजपा का वोट के न दे? जेकर पइसा डूबि गय, ऊ न दे.'
लेकिन गिरधारी शुक्ल स्वीकार करते हैं कि वो हर बार के भाजपा वोटर हैं. भाजपा का समर्थक वैसे भी इतना वोकल है कि थोड़ी बहुत हवा तो अपने हाव-भाव और हाथों के उतार-चढ़ाव से बना देता है.गांव के ही एक दलित रमधन से माहौल पूछा तो वह अपने नाम के अर्थ की व्याखा (राम का धन) बताकर रामायण का कोई प्रसंग सुनाकर चले गए. बाद में पता चला कि वह गांव के सबसे धार्मिक दलितों में से हैं और उन्हें ब्राह्मणों से ज्यादा भजन याद हैं. रमधन ने कोई राजनीतिक बात नहीं की. फोटो खिंचवाने से भी मना कर दिया.
दलित अभी खुलकर बात नहीं कर रहे
यहां दलित अब भी ब्राह्मणों के घरों के आगे से नहीं निकलते. यहां उन्हें वैसा सुरक्षित माहौल ही नहीं मिला है कि वे पॉलिटिकल मसलों पर खुलकर बात कर सकें. जिन समझदार और पढ़े-लिखे दलितों से बात हुई, उन्होंने इधर-उधर की बातें करके टाल दिया और निरक्षर कुछ बोले ही नहीं. यह मानने का कोई कारण नहीं है कि आर्थिक पायदान पर सबसे पीछे खड़े लोगों को नोट बैन से कम परेशानी हुई होगी. लेकिन ऊपरी परत पर 'देश हित' का नारा इस कदर हावी है कि कुछ आवाज़ें अभी दबी हुई हैं. वे संभवत: EVM मशीन के सामने ही दिखेंगी.सुल्तानपुर अयोध्या और प्रयाग के बीच गोमती नदी के दोनों ओर बसा है. वे लोग अब बुजुर्ग हो गए हैं जो 90 के दशक में कारसेवा के लिए अयोध्या पहुंचे थे. लेकिन राम लहर के उतार के साथ भाजपा यहां कमजोर होती गई. बीते दो विधानसभा चुनावों में बीजेपी मुख्य मुकाबले में भी नहीं थी. लेकिन इस बार वह मुकाबले में लौटती दिख रही है. कटका खानपुर चौराहे पर अखबार पढ़ते हुए एक पूर्व पत्रकार मिले. उनके मुताबिक, 'पांचों सीटों पर भाजपा मुख्य मुकाबले में है. कुछ जगह वह सपा से भिड़ेगी और कुछ जगह बसपा से.'क्या ये वरुण गांधी का असर है? हो भी सकता है लेकिन लोगों की जुबान पर मोदी का ही नाम है. बनारस यहां से सिर्फ 150 किलोमीटर दूर है और लोग बार-बार मोदी के नाम के साथ वहां का जिक्र करते हैं. ट्रेन में साजिशन एक डिस्कशन छेड़ा तो दिल्ली में नौकरी करने वाले एक अंकल जी बोले, 'बनारस में तो अभी मोदी जी ने कुछ नहीं किया है. अभी तो सिर्फ शुरुआत है.' बनारस से करीबी एक फैक्टर है.
अखिलेश ने काम किया है, लेकिन...
जो लोग बेहिचक भाजपा को वोट देने की बात कह रहे हैं, वो भी मानते हैं कि अखिलेश यादव ने काम कराया है. दोमुंहा चौराहे पर घनश्याम मिले. अखिलेश के बारे में पूछा तो उन्होंने एक अवधी कहावत कही, 'बाप पदइन न जानैं, पूत शंख बजाएं.' इसे विस्तार देते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश काम कर रहे हैं, उसे गा-बजा भी रहे हैं, लेकिन उनका काम मुलायम-शिवपाल के लिए जनता की नाराजगी को टेकओवर करने के लिए नाकाफी है.
सेमरी रोड: दोनों तरफ देहात हैं.सुल्तानपुर से सेमरी होते हुए अकबरपुर जाने वाली सड़क कभी अपने गड्ढों के लिए कुख्यात थी. अब यह दिल्ली-नोएडा वाली फील देती है. सुल्तानपुर जंक्शन से सटा पखरौली स्टेशन अब एक जंक्शन में तब्दील किया जा रहा है. आस-पास के गांवों के लोग इससे बहुत खुश हैं. जिले में NH-56 को चार लेन का बनाया जा रहा है, जिससे किसानों को अपनी जमीन के बदले तगड़ा मुआवजा मिला है. कुछ जगहों पर ये 8 लाख प्रति बिस्वा और कुछ जगहों पर 16 लाख प्रति बिस्वा. सुल्तानपुर जैसे जिले में जमीन की ऐसी कीमत के बारे में किसान सपने में भी नहीं सोचता था. इसने एक और दिलचस्प चीज की है कि जातीय समीकरणों को उलट दिया है.
पखरौली जंक्शन बन रहा है. दिल्ली से आने वाली ट्रेनें रुका करेंगी.पखरौली के पास गोपालपुर गांव में नाऊ (नाई) जाति के एक परिवार को 80 लाख से ज्यादा का मुआवजा मिला है. यह जाति ओबीसी में आती है और ब्राह्मण घरों में पूजा-पाठ और शादी के संस्कारों में उनका अहम रोल होता है. मुआवजा मिलने के बाद उन्होंने अपना घर बड़ा करवा लिया है, स्कॉर्पियो खरीद ली है और गांव में ही टेंट हाउस का काम शुरू कर दिया है. मैं उन्हीं की मुलायम रजाई में सोया. वह किसी मायने में देहाती रजाई नहीं थी. घर की बुजुर्ग महिला एक ब्राह्मण परिवार के यहां तेरहवीं के प्रोग्राम में पहुंचीं, लेकिन कम नेग भी स्वीकार कर लिया. उनसे पूछा कि आप अपनी बहुओं को साथ क्यों नहीं लातीं सिखाने के लिए तो बोलीं, 'हम सब इनकी पुरानी प्रजा हैं, तो कर लेते हैं. वरना बच्चे अब मना करते हैं. अब कौन करेगा.'
ये लोग जाहिर है, भाजपा को लेकर बहुत उत्साहित नहीं दिखे.
बीजेपी का मिशन 265+ है या 300+?
कुर्मियों की यहां खासी तादाद है और वे अनुप्रिया पटेल के बजाय नरेंद्र मोदी की बात कर रहे हैं. बीजेपी ब्राह्मण-बनिया-ठाकुर और ओबीसी का गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है. आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि ये सब जातियां एक ही पार्टी को वोट कर दें, लेकिन यहां के समाज में सवर्ण और दलित-पिछड़ों की दोस्ती नहीं हो सकती. जातीय छुआछूत यहां भाजपा के पोस्टरों में भी दिख जाती है.
हनुमानगंज में ब्राह्मणों के जो पोस्टर लगे थे, उनमें मोदी, अमित शाह, राजनाथ, कलराज मिश्र, वरुण गांधी दिखे. यहां तक कि उमा भारती और केशव प्रसाद मौर्य भी दिखे. लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य नहीं दिखे. यहीं जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष सीताराम वर्मा का पोस्टर दिखा, जिसमें तमाम बड़े भाजपाई नेताओं के साथ स्वामी प्रसाद मौर्य की तस्वीर भी थी. निवेदकों में चौरसिया, मौर्य, अग्रहरि, पटेल और निषाद उपनाम के लोग थे.
एक और दिलचस्प चीज. ज्यादातर पोस्टरों पर बीजेपी का यूपी मिशन '265+' का टारगेट लिखा था. लेकिन एकाध पोस्टरों पर मिशन '300+' लिखा हुआ भी दिखा. कौन सा पोस्टर पहले का है और कौन सा बाद का, ये पता नहीं चल सका. एक पेट्रोल पंप पर रुकना हुआ तो वहां एक बड़ा विज्ञापन प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ लगा था. इस पर लिखा था, 'कर चोरी की लड़ाई में मेरा पैसा सुरक्षित है.' सुल्तानपुर शहर में मौजूदा सपा विधायक अनूप संडा के होर्डिंग दिखे, जिस पर लिखा था, 'यूपी होगा उत्तम प्रदेश, 2017 में फिर से अखिलेश.' सपा के कुछ दावेदारों के पोस्टरों से अखिलेश गायब दिखे और मुलायम-शिवपाल ही नजर आए.
महिलाओं का कोई राजनीतिक वजूद है?
राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार ब्रजेश शुक्ल से बात हुई. उनके मुताबिक, नोट बैन से लोगों को तपस्या तो करनी पड़ी है, लेकिन ऐसा माहौल बना दिया गया है कि इस पर नाराजगी जाहिर करने वाला 'अज्ञानी' और 'स्वार्थी' है. इसलिए यह सीधे मोदी के कड़े फैसले लेने की काबिलियत से जुड़ गया है. हालांकि जिन घरों में बीते महीनों में शादियां हुईं, और जिन घरों में होनी हैं, उन्हें बराबर मुश्किलें पेश आई हैं. महिलाएं खास तौर से नाराज हैं. लेकिन क्या औरतें अपनी इच्छा से वोट डालेंगी? ब्रजेश शुक्ल को लगता है कि इसकी संभावना शून्य नहीं है. समय बदल रहा है और औरतें जानती हैं कि EVM मशीन का बटन दबाते हुए उन्हें कोई नहीं देख रहा होता. उनकी इस बात से बिहार में नीतीश कुमार का कैंपेन याद हो आया, जिसमें जाति-निरपेक्ष तरीके से महिलाओं को लुभाने की कोशिश की गई थी. शराबबंदी का वादा और क्या था!ब्रजेश शुक्ल मोटरसाइकल से पूरा ज़िला घूमते हैं. उन्होंने बताया कि कुछ इलाकों में बिजली अब 18 घंटे आने लगी है और लोग इससे खुश हैं. बरसों से उपेक्षित रहे इस ज़िले में पिछले पांच साल में जो काम हुए हैं, उसके हिसाब से सपा को इस बार शानदार स्थिति में होना चाहिए. ब्रजेश कहते हैं, 'क्या पता वो हो भी?'

वरुण गांधी ने किसानप्रिय सांसद बनने की कोशिश की है. वे राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, लेकिन मोदी और शाह की जोड़ी से अच्छे रिश्ते नहीं हैं. इसका असर लोकल कार्यकर्ताओं पर पड़ता है. पार्टी नेतृत्व और वरुण के बीच दूरियों से लोगों को लगता है कि सांसद के तौर पर वे सुल्तानपुर को वो सब नहीं दे पा रहे, जो केंद्र से जिले को मिल सकता था. वरुण की अनदेखी नहीं हो रही है, लेकिन सीडी कांड के बाद वह बहुत ताकतवर स्थिति में नहीं हैं. एक बीजेपी कार्यकर्ता ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि 2017 के विधानसभा चुनाव अब वरुण गांधी की जिम्मेदारी नहीं रह गए. जिले की सीटों पर लखनऊ से ज्यादा स्थिर नजर रखी जा रही है.
इस पूरे चुनाव में एक बड़ा नाम है, जिसकी ज़िले भर में चर्चा है. वो हैं हिस्ट्रीशीटर चंद्रभद्र सिंह 'सोनू' जो सुल्तानपुर सदर सीट से बीजेपी का टिकट मांग रहे हैं. वह इसौली से दो बार सपा के टिकट पर विधायक रहे हैं. 2006 में हुई इलाहाबाद के सदानंद तिवारी उर्फ संत ज्ञानेश्वर नाथ और उनके 7 चेले-चपाटियों की हत्या कर दी गई. चंद्रभद्र सिंह पर ही मुख्य आरोप आया. इसके बाद वो सपा छोड़कर बसपा में चले गए.

2014 चुनाव से पहले हवा का रुख भांप वो भाजपा में आ गए. वरुण गांधी के साथ जगह जगह घूमकर प्रचार किया. 'जय महाकाल की, चिंता नहीं बवाल की' वाली राजनीति करते हैं. दबंगई पर जान लुटाने वाले क्षेत्र में उन्हें पसंद करने वालों की खासी संख्या हैं. सुल्तानपुर शहर की एक मशहूर पान की दुकान पर एक पत्रकार ने कहा कि चंद्रभद्र 'सोनू' को सदर से टिकट मिला तो अनूप संडा का टिकना मुश्किल होगा. फेसबुक पर सोनू के फैन्स उन्हें सुल्तानपुर का भावी सांसद बताते हैं.
मोटामोटी जिले में चुनावी माहौल अभी तैयार हो रहा है. लोग सोचने लगे हैं कि वोट किसे दिया जाए. लेकिन उम्मीदवारों के नाम के ऐलान का इंतजार हो रहा है. जिसके बाद ही वोटर फाइनल मन बनाएगा.
सुल्तानपुर के इस दौरे पर दिहाड़ी मजदूरों और मुसलमानों से बात नहीं हो सकी. लेकिन सुनी सुनाई बात वही है जो अभी पूरे प्रदेश के बारे में कही जा रही है. मुसलमानों ने अपना मन अभी नहीं बनाया है और वे उसी पुराने पैटर्न पर वोट देंगे. इस बार सपा और बसपा दोनों मजबूत हैं, इसलिए उनका वोट विधानसभाओं के मुताबिक, दोनों पार्टियों में बंटता नजर आ रहा है.
देखिए! वक्त लगा तो एक बार फिर वहां की डिटेल्ड रिपोर्ट लेकर आएंगे.

