यूपी चुनाव जीतने के लिए सभी पार्टियों को करने होंगे ये 5-5 काम
सारी पॉलिटिकल पार्टी पूरी तैयारी के साथ मैदान में हैं. ऐसे में शीला दीक्षित को कांग्रेस लाई है पर अभी बहुत मेहनत करनी होगी.
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फोटो - thelallantop
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आजकल रोज एक हेडलाइन यूपी इलेक्शन से आती है. कभी अमित शाह रैली करते हैं. कभी अखिलेश फीता काटते हैं. कभी मायावती का कोई नेता उन पर टिकट बेचने का आरोप लगाकर बाय बोल देता है. आज बारी कांग्रेस की आई.
यूपी में कांग्रेस की सीएम कैंडिडेट होंगी शीला दीक्षित. उनका यूपी कनेक्शन क्या. यही कि ससुराल उन्नाव में थी. आइएएस पति विनोद दीक्षित उन्नाव जिले के उगू गांव के थे. खुद शीला भी कन्नौज सीट से सांसद रहीं. 1984 में. बस उसके बाद 1989 में हारीं और टाटा. दिल दिल्ली हो गया. अब शीला के आ जाने से क्या होगा यूपी में. इसके लिए सभी पार्टियों का जल्दी से गेम प्लान समझ लेते हैं.
बेटे के भरोसे नहीं हैं मुलायम सिंह यादव
1. इसलिए कुर्मियों के नेता बेनी प्रसाद वर्मा और ठाकुरों के नेता अमर सिंह को वापस लाए. राज्यसभा भेजा. संगठन की मुलायम लगातार बैठक ले रहे हैं. विधायकों, मंत्रियों को खूब हड़काते हैं. एमएलएसी और जिला पंचायत अध्यक्षों तक को हारी हुई सीटों पर काम करने का फरमान सुना दिया है.
2. पैंफलेट में छपेंगी सड़कें. खासतौर पर आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे. लखनऊ में मेट्रो बन रही है, जिसके सहारे मुलायम की छोटी बहू अपर्णा विधायक बनना चाहेंगी. लैपटॉप भी खूब बांटे थे अखिलेश ने, मगर खुद मुलायम कह चुके हैं. हमारे लैपटॉप पर अच्छे दिन दिखा कोई और वोट ले गया.
3. क्षत्रिय, पिछड़ा और मुसलमानों के सहारे चुनाव जीतने की कोशिश. कई जगहों पर टिकट बदले गए. नए सिरे से कैबिनेट बनाई गई. लॉ एंड आर्डर को लेकर नए सिरे से दावे. हालांकि इसी मोर्चे पर सपा की सबसे ज्यादा छीछालेदर भी. इसलिए अखिलेश दोबारा को लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं.
मायावती तो फेयरवेल से हलकान हैं
1. बिहार चुनाव के बाद यूपी में बीजेपी का भाव गिर गया. सपा से नाराज हर तबका मायावती के दिनों की याद करने लगा. बीएसपी के भाव बढ़े. उनके कैंडिडेट भी सबसे पहले मैदान में नजर आए. मगर फिर लगने शुरू हुए झटके. स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी जैसे कई नेता एक-एक कर पार्टी छोड़ गए. सबने मायावती पर टिकट बेचने का इल्जाम लगाया. इससे बीएसपी की हवा खराब हुई.
2. मायावती को अभी भी बढ़त हासिल है. इसकी सबसे बड़ी वजह है सीएम कैंडिडेट के तौर पर उनके सामने किसी दमदार विकल्प का न होना. मगर अपने दम अब वह बहुमत पाती नहीं दिख रहीं. जरूरत कुछ समझदार साझेदारियों की है. उन्हें छोटे दलों को साथ लाना होगा. साथ ही मुसलमानों को ये भरोसा दिलाना होगा कि वह किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ नहीं जाएंगी. जैसा कि वह तीन बार कर चुकी हैं. और इसी के चलते सपा से लाख नाराज मुसलमान भी हाथी की सवारी से बिदकते हैं.
3. 2014 के चुनाव ने दिखा दिया कि चुनावों में संसाधनों की कितनी अहमियत है. मायावती की दिक्कत ये है कि वह 5 साल सत्ता से बाहर रहने के चलते पइसे से कमजोर हो चुकी हैं. उनके पास उद्योगपतियों की कतार नहीं. हवाई जहाजों पर उड़ने वाले नेता नहीं. भरोसा है तो बस काडर वोटों का. लेकिन उनके सहारे सत्ता नहीं पाई जा सकती. संगठन इसीलिए बहन जी के जन्मदिन के बहारे चंदा बटोरता है. मगर अब वह काफी नहीं.
4. बार-बार पार्टी टिकट बदलने से वोटर नाराज हो रहा है. सर्वजन का नारा प्रभावी नहीं रहा. केंद्र में बीजेपी की सरकार है. और लोकसभा चुनावों में सवर्णों ने बीजेपी को हौंक कर वोट दिया. इसलिए मायावती कांशीराम के ओरिजिनल प्लान को अपनाना चाह रही हैं. जिसमें अति पिछड़े और दलित एक साथ हों. इसी हिसाब से उन्होंने थोक के भाव जोनल कार्डिनेटर बदले. मगर हालिया घटनाओं से लग रहा है कि एमबीसी वोटों के कई दावेदार हैं. और सब पॉलिटिकल सौदेबाजी के लिए चुस्त नजर आ रहे हैं. वर्ना अपना दल के दो धड़ों के इतने कद्रदान न होते. न राजभरों की पार्टी की इतनी पूछ होती.
बीजेपी के पास सीएम फेस ही नहीं है
1. बीजेपी को भी झक मारकर राजनाथ सिंह को लाना होगा. जैसे कांग्रेस शीला दीक्षित को लाई. क्योंकि राज्य के जो नेता हैं, उनमें से किसी का भी प्रोफाइल अखिलेश-मायावती के बराबर का नहीं है. मगर देश के गृह मंत्री बलि का बकरा बनने को शायद ही तैयार हों. यूपी में बीजेपी जीती तो श्रेय मोदी-शाह को जाएगा. हारे तो राजनाथ सिंह पर ठीकरा. बीच का रास्ता ये हो सकता है कि राजनाथ सिंह को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया जाए.
2. राजनाथ के अलावा सीएम पद के कई दावेदार हैं. योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद हैं. ठाकुरों में अच्छा हिसाब-किताब है. मगर इस जाति का वोट कुल 4 पर्सेंट है. हिंदुत्ववादी छवि है, मगर विकास के नाम पर गिनाने को कुछ नहीं. ध्रुवीकरण करवा सकते हैं, मगर मोदी सिर्फ ध्रुवीकरण के दम पर फसल नहीं काट ले गए थे. साथ में गुजरात के सीएम के तौर पर शानदार दिखता ट्रैक रेकॉर्ड था.
वरुण गांधी अपनी ही गणित से दावेदार बने थे. फेसबुक पेज, बैनर, पोस्टर, व्हाट्सएप चालू था. इलाहाबाद में अमित शाह ने उनके ताजिए ठंडे कर दिए. साफ कह दिया गया. ये सड़क पर हल्ला न मचे. तो अब चुप हैं. इसके अलावा केशव प्रसाद मौर्य, दिनेश शर्मा, हुकुम सिंह, लक्ष्मीकांत वाजपेयी जैसे कई नाम हैं. कलराज मिश्र भी हैं. देवरिया से सांसद. केंद्र में मंत्री. मगर मोदी के पैमाने से रिटायरमेंट के करीब. इसीलिए बाबू जी यानी कि कल्याण सिंह को भी कोई नहीं पूछ रहा. वह राजस्थान के राजभवन में आराम कर रहे हैं. एक हिंदी अखबार के जरिए सूबे को इशारा भी किया. कि मैं वापस आकर पार्टी संभालने को तैयार हूं. मगर मोदी-शाह कल्याण को सिर्फ लोध वोट बटोरने भर के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं.
3. सीएम फेस के अलावा पार्टी की बड़ी चिंता टिकट वितरण है. फिलहाल इसके लिए तीन सूत्री फॉर्मूला चल रहा है. सर्वे होगा. उसमें छंटे कैंडिडेट पर दो फीडबैक लिए जाएंगे. एक संघ संगठन, दूसरा बीजेपी संगठन का. इसके बाद ही विनिंग कैंडिडेट तय होंगे. दिक्कत ये है कि जिस सपा और बसपा से बीजेपी को मुकाबला करना है, उसके ज्यादातर कैंडिडेट डिक्लेयर हो चुके हैं. वे क्षेत्र में अभी से झंडा, बैनर, पोस्टर लिए घूम रहे हैं. माहौल बना रहे हैं. ऐसे में बीजेपी लोकसभा चुनाव का एडवांटेज खोती नजर आ रही है.
4. चौथी दिक्कत चुनावी जीत के नाम पर बाहरियों की घुसपैठ से आ रही है. दूसरे दलों के टिकट के दावेदार कतार लगाए खड़े हैं. सबको बस एक ही भरोसा चाहिए. टिकट मिल जाए. इसी चक्कर में राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव में भी दूसरे दलों के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर दी थी. इनके चक्कर में पार्टी के पुराने वफादार सशंकित हैं. उनके सामने जगदंबिका पाल जैसे उदाहरण हैं.
5. मुसलमानों और दलितों का वोट तो मिलने से रहा. तो दांव अति दलितों, अति पिछड़ों और सवर्णों पर है. ये मिलकर 60 फीसदी वोट बनाते हैं. इसीलिए अति पिछड़ों को आरक्षण का मुद्दा अहम रहेगा. मगर इसे इतना भी नहीं उछाला जाएगा कि दूसरे तबके नाराज हो जाएं. छोटे जाति समूहों की राजनीतिक पार्टियों को पाले में लाया जाएगा. इसीलिए अपना दल की अनुप्रिया पटेल को मंत्री बनाया. राजभर समाज की भारतीय समता पार्टी को विलय के लिए मनाया जा रहा है. महान दल के साथ भी बात चल रही है. इन समाजों के नायकों के नाम पर ट्रेनें और दूसरी स्कीम चलाई जा रही हैं.
और कांग्रेस शीला-संजय-गांधी भरोसे
1. दिक्कत ये है कि शीला दीक्षित यूपी से वाकिफ नहीं हैं. उनके जमाने से अब तक गंगा-जमुना-गोमती-चंबल में बहुत पानी बह चुका है. राज्य के नेता उन्हें बेमन से कबूलेंगे.
2. बूथ के लेवल पर संगठन सिरे से गायब है. ऐसे में सिर्फ हवाई दौरों के चलते माहौल तो बनाया जा सकता है. लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हो सकता. ऐसा ही माहौल 2012 में राहुल गांधी ने भी बनाया था.
3. शीला दीक्षित पंजाबी हैं. दिल्ली से आई हैं. संजय सिंह अमेठी के हैं. बाहर उन्हें लोग जानते तो हैं, मगर मानते नहीं. राज बब्बर आगरा-फतेहपुर बेल्ट के नेता हैं. एक्टर रहे हैं तो भीड़ बटोर सकते हैं. मगर ये भीड़ तो उन्होंने मुलायम सिंह से अलग होकर वीपी सिंह के साथ आकर जनमोर्चा के दिनों में भी बटोरी थी.
4. राहुल गांधी का साथ देने के लिए प्रियंका गांधी आएंगी. पार्टी प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद को भी उन्हीं का सहारा है. मगर सिर्फ प्रियंका के सहारे कितने कैंडिडेट जीत पाएंगे.
5. कांग्रेस की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि वह कितने दलों को साथ ला पाती है. जेडीयू एक संभावित दावेदार है. मगर यूपी में उसकी कोई हस्ती नहीं. सही गठबंधन ही कांग्रेस को मुकाबले में ला सकता है.
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