उत्तर प्रदेश चुनाव का पहला फेज.15 से ज्यादा जिले. 73 विधानसभाएं.बीजेपी की पहली सूची आने से सेकेंड लास्ट कड़ी जुड़ गई है. 24 घंटे मेंसपा-कांग्रेस गठबंधन का ऐलान हो जाएगा. आखिरी कड़ी जुड़ जाएगी.फिर भी, ये लगभग क्लियर है कि अब लड़ाई के अस्त्र-शस्त्र क्या होंगे. पिछले चुनावमें यहां सपा और बसपा में ही मुख्य मुकाबला था. बीजेपी तीसरे और आरएलडी चौथे नंबरपर थी.पहला बड़ा फैक्टरजाट और मुसलमान इन सीटों पर हार-जीत तय करने की क्षमता रखते हैं. 50 से ज्यादासीटों पर जाटों की खासी आबादी है और बड़ौत-बागपत और मथुरा वाले क्षेत्र में आरएलडीका ठीक-ठाक प्रभाव है. जाटों का रुख किस ओर है, इसे लेकर बहुत साफ स्थिति नहीं है.2014 के लोकसभा चुनावों में मुजफ्फरनगर दंगे एक बड़ा फैक्टर थे.तब वेस्ट यूपी के जाटों ने बीजेपी के पक्ष में खूब वोट गिराए थे. लेकिन तब से काफीपानी रीत गया है. मुजफ्फरनगर दंगों की यादें कितनी भूमिका निभाएंगी, इसे लेकर बहुतसाफ स्थिति नहीं है. बहुत सारे लोग मानते हैं कि वेस्ट यूपी के सक्षम-समृद्ध किसानमोदी सरकार से नाराज है और इस बार वे आरएलडी के पास लौट सकता है.संगीत सोम.मुसलमानयूपी में दो किस्म के ध्रुवीकरण होते हैं. एक का फायदा बीजेपी को मिलता है और दूसरेका नुकसान होता है. अमरोहा, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, शामली, मेरठ, गाजियाबाद और हापुड़में मुसलमानों की खासी संख्या है. अगर यहां मुसलमान बीजेपी को हराने के लिए वोट करेतो वह सबसे ताकतवर मोर्चे की तरफ जाएगा.सपा-कांग्रेस मिलकर बसपा से मजबूत और विश्वसनीय छतरी बना सकते हैं और मुसलमानवोटरों को आकर्षित कर सकते हैं. यह बीजेपी के लिए झटके की स्थिति होगी. इसलिएकाउंटर मैकेनिज्म के तहत बीजेपी ने खासी संख्या में पिछड़ों को टिकट दिया है. कुछफीसदी ओबीसी भी अगर हिंदुत्व के स्फेयर में चला आए तो बीजेपी के लिए चीज़ें आसान होजाती हैं.--------------------------------------------------------------------------------BJP की पहली लिस्ट में 60 उम्मीदवार अति पिछड़ी जातियों से हैं. इनमें भी ज्यादातरशाक्य, मौर्य, सैनी, लोधी, कुशवाहा, जाट और गुर्जर हैं. गैरजाटव दलितों (पासी,वाल्मीकि और खटिक) भी हैं. अगड़ों में ठाकुरों को सबसे ज्यादा 21 टिकट दिए गए हैं.हालांकि एटा, फिरोजाबाद और कासगंज की सीटों पर खासी यादव आबादी है और यहां सपामजबूत है. पिछले चुनाव में यहां लड़ाई के कई ध्रुव थे.--------------------------------------------------------------------------------दल बदलुओं को आलिंगनभाजपा ने ज्यादातर सिटिंग विधायकों को टिकट दिया है. 24 ऐसे चेहरों को कैंडिडेटबनाया है, जो दूसरी पार्टियों से आए हैं. इसे आप सियासी शॉर्टकट की तरह देख सकतेहैं. इस तरीके से बीजेपी कुछ उन सीटों पर भी मुकाबले में आ सकती है, जिन पर पिछलीबार वह तीसरे नंबर पर भी नहीं थी. जैसे सहारनपुर की बेहट सीट से विधायक महावीर सिंहराणा पिछली बार बसपा से लड़े थे. इस बार भगवा पटका पहनकर लड़ेंगे. पर सिर्फ भाजपाने ऐसा नहीं किया है.बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर) से सपा विधायक नवाजिश आलम और स्याना (बुलंदशहर) से कांग्रेसविधायक दिलनवाज खान को बसपा ने टिकट दिया है. बरौली (अलीगढ़) से आरएलडी विधायकदलबीर सिंह और मथुरा की बलदेव सीट से आरएलडी विधायक पूरन प्रकाश बीजेपी में आ गएहैं. बुलंदशहर से सपा विधायक गुड्डू पंडित और उनके शिकारपुर से विधायक भाई मुकेशपंडित सपा से बगावत कर चुके हैं और बीजेपी के दरवाजे पर चक्कर मार रहे हैं.जिन सीटों पर बीजेपी पिछले साल कहीं नहीं थी, वहां उसने पॉपुलर दांव भी खेले हैं.मसलन, अमरोहा की नौगांवां सादात सीट से बीजेपी ने एक्स-क्रिकेटर चेतन चौहान कोउतारा है. यहां सैय्यद और चौहानों की खासी आबादी है और फिलहाल ये सीट सपा के अशफाकअली खान के पास है.दंगा आरोपियों से परहेज नहींमौसम चौधरीजहां ध्रुवीकरण की गुंजाइश है, वहां भाजपा दागी नेताओं को टिकट देने से नहीं चुकीहै. सरधना से संगीत सोम और मुजफ्फरनगर की थाना भवन सीट से सुरेश राणा का टिकट तोफाइनल ही था. लेकिन बिजनौर सीट पर चौंकाते हुए पार्टी ने पेदा दंगा कांड के आरोपीबीजेपी नेता ऐश्वर्य चौधरी उर्फ मौसम की पत्नी शुचि मौसम चौधरी को टिकट दिया है.शुचि अपने पति के नाम को 'मिडल नेम' की तरह इस्तेमाल करती हैं. यहां सितंबर 2016में एक लड़की से कथित छेड़छाड़ के बाद दंगा दो गुटों में गोलीबारी और पथराव हुआ था.इसमें एक ही परिवार के तीन लोगों की मौत हो गई थी. पुलिस के मुताबिक, पेंदा कांडमें जो लोग हमलावरों का नेतृत्व कर रहे थे, उनमें नौजवान वकील और नेता मौसम चौधरीभी शामिल थे. फिलहाल वो जेल में हैं. चुनाव प्रचार में 'बहन-बेटी की इज्जत'का मुद्दा उठेगा, ऐसी पूरी संभावना है.लोग अभी नोटबंदी के बारे में बातें तो कर रहे हैं, लेकिन परेशानी अब पहले केमुकाबले कम हुई है. पता नहीं यह बड़ा चुनावी मुद्दा होगा या नहीं. लेकिन अगरधार्मिक ध्रुवीकरण हुआ तो जैसा फायदा बीजेपी को हर बार मिलता था, वैसा दूसरी तरफअखिलेश-सपा का गठबंधन होने की वजह से संभवत: इस बार न मिले. कैराना, सरधना,मुजफ्फरनगर, दादरी और बड़ौत-बागपत की सीटों पर सबकी नजर रहेगी.11 फरवरी को यूपी में पहले चरण का चुनाव है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ेंतो क्या 'धरती पुत्र' मुलायम किसान बनकर हल जोतेंगे ?6 महीने में पलटीं मायावती इस चुनाव में कांशीराम का सपना तोड़ रही हैंइस एक बयान की वजह से BJP यूपी चुनाव हार जाती, अगर किसान वोटबैंक होते