त्रिची तय करेगा, तमिलनाडु में कौन बनेगा 'अन्ना'?
त्रिची में कुल नौ विधानसभा क्षेत्र हैं. इनमें कई बार बाहरी और उन जातियों के लोगों को जीत मिली है, जिनका राजनीतिक वर्चस्व नहीं रहा है. त्रिची ने विकास की आस में बारी-बारी से सभी दलों को आजमाया है. लेकिन अधिकतर मौकों पर उसका भरोसा टूटता ही नजर आया है.

तमिलनाडु में चुनाव होने वाले हैं. राज्य में द्रविड़ राजनीति का जोर है. साल 1967 के बाद से द्रविड़ आधार वाली पार्टियां ही सत्ता में रही हैं. कभी DMK तो कभी AIADMK. भारतीय राजनीति में तमिलनाडु की पहचान सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के ब्रांड के तौर पर बनी है. देश भर में जो राजनीतिक पहचान तमिलनाडु की है, वही पहचान राज्य में त्रिची शहर की है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, त्रिची शहर और आसपास के इलाके को मिलाकर त्रिची जिला बनाया गया है. यहां कुल नौ विधानसभा क्षेत्र हैं. इनमें कई बार बाहरी और उन जातियों के लोगों को जीत मिली है, जिनका राजनीतिक वर्चस्व नहीं रहा है. त्रिची ने विकास की आस में बारी-बारी से सभी दलों को आजमाया है. लेकिन अधिकतर मौकों पर उसका भरोसा टूटता ही नजर आया है.
साल 2026 का विधानसभा चुनाव त्रिची के लिए महत्वपूर्ण है. यहां कई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट चल रहे हैं, वहीं कुछ लंबित भी हैं. चुनाव नतीजे इन प्रोजक्ट्स का भविष्य तय करेंगे. पिछले कुछ सालों में प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के निवेशकों ने शहर में निवेश करना शुरू किया है. इनमें सूचना प्रौद्योगिकी, मैन्युफैक्चरिंग और MSME सेक्टर शामिल हैं.
रोजी रोटी और पढ़ाई के बेहतर अवसर के लिए आसपास के जिलों से काफी लोग पलायन करके त्रिची आए हैं. इसके चलते शहर का ट्रांसपोर्ट सिस्टम चरमरा गया है. शहर की जनसंख्या 15 फीसदी बढ़ गई. लेकिन ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में उस अनुपात में सुधार नहीं हुआ है. तमिलनाडु की ‘दूसरी राजधानी’ का दर्जा मांगने को लेकर सुर्खियां बटोरने वाले शहर में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई सारे मसले अनसुलझे हैं. सेमी रिंग रोड का काम अटका हुआ है. शहर का अपना स्वतंत्र ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन नहीं है. वहीं मेट्रो का प्रस्ताव भी फाइलों की धूल फांक रहा है.
यही नहीं, त्रिची-तंजावुर नेशनल हाईवे के लिए सर्विस रोड का काम 15 सालों से रुका हुआ है. कम से कम तीन एलिवेटेड कॉरिडोर भी पेंडिंग हैं. शहर के विस्तार की योजना भी 2011 से अटकी हुई है. विस्तार में देरी के चलते केवल कट्टूर और पंजापुर जैसे कुछ इलाकों तक ही निवेश पहुंच पाया है.
त्रिची जिले में 9 विधानसभा सीटें हैं- त्रिची वेस्ट, त्रिची ईस्ट, थिरुवेरुम्बुर, श्रीरंगम, मनचनल्लूर, लालगुडी, मुसिरी, मनप्पराई और थुरैयूर. पिछले तीन विधानसभा चुनावों की बात करें तो 14 बार इन सीटों से DMK और 13 बार AIADMK को मौका मिला है.
शहर के अधिकतर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पिछले पांच सालों में शुरू हुए हैं. सत्ताधारी DMK ने इन योजनाओं को भुनाना शुरू कर दिया है. कांग्रेस के चार पार्षद और DMK गठबंधन के छह दूसरे पार्षद मजदूर और अल्पसंख्यक वोटों को लामबंद करने में मददगार साबित होंगे.
पिछले चुनाव में AIADMK त्रिची जिले की सभी 9 सीटें हार गई थी. उनके लिए इस चुनाव में भी गिनाने को कुछ खास है नहीं. उनकी सहयोगी बीजेपी जरूर शहरी वोटर्स को लुभाने के लिए कुछ केंद्रीय योजनाएं लाई है. इनमें त्रिची हवाई अड्डे के लिए नए यात्री टर्मिनल की घोषणा शामिल है.
सेंथामिझन सीमान की पार्टी ‘नाम तमिलर काची’ और एक्टर विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ त्रिची में जोर आजमाइश करेंगी. दोनों पार्टियों का जोर युवा वोटर्स पर है. ये दल बदलाव के लिए वोट करने की अपील कर रहे हैं. विजय के अल्पसंख्यक बहुल त्रिची ईस्ट से चुनाव लड़ने के भी कयास लगाए जा रहे हैं. अगर ऐसा होता है तो त्रिची की बाकी सीटों पर भी इसका असर हो सकता है. विजय ने पिछले साल सितंबर में त्रिची से ही अपना चुनाव अभियान शुरू किया था.
एक दिलचस्प फैक्ट. साल 2011 से त्रिची जीतने वाले की तमिलनाडु में सरकार बनती रही है. साल 2011 में दिवंगत जयललिता श्रीरंगम से चुनाव जीतीं और मुख्यमंत्री बनीं. साल 2016 में भी त्रिची की अधिकतर सीटें AIADMK के हिस्से आईं. और फिर से जयललिता की सरकार बनी. साल 2021 में DMK ने जिले की सभी 9 सीटों पर क्लीन स्वीप कर लिया. राज्य में भी उनकी सरकार बनी.
मुख्यमंत्री स्टालिन की कैबिनेट में मंत्री और DMK के कद्दावर नेता केएन नेहरू त्रिची वेस्ट से चुनावी मैदान में हैं. उन पर ईडी के छापे भी पड़ चुके हैं. ऐसे में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है. जनता भ्रष्टाचार के मामले में उनको क्लीन चिट देती है या आरोपों को सच मानती है, सब नतीजों पर निर्भर करेगा. इसके अलावा उपमुख्यमंत्री उदयनिधि के करीबी अंबिल महेश पोय्यामोझी तिरुवेरुम्बुर में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं.
वीडियो: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच राजनीतिक विवाद क्यों?

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