यूपी राजनीति की प्रयोगशाला है. यहां पर नित नए-नए एलीमेंट बनते रहते हैं. इसीप्रयोगशाला से निकला था नितांत सल्फ्यूरिक एसिड, जो दूसरों पर गिरे तो जला दे, खुदपर गिरे तो गला दे - कल्याण सिंह. नाम तो सुना ही होगा.1991 में यूपी में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री कल्याण सिंह उस वक्त की राजनीति मेंदो वजहों से याद किए जाते हैंः- पहला - 'नकल अध्यादेश', जिसके दम पर वो गुडगवर्नेंस की बात करते थे. कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे और राजनाथ सिंह शिक्षामंत्री. बोर्ड परीक्षा में नकल करते हुए पकड़े जाने वालों को जेल भेजने के इस कानूनने कल्याण को बोल्ड एडमिनिस्ट्रेटर बना दिया. यूपी में किताब रख के चीटिंग करनेवालों के लिए ये काल बन गया.दूसरा है बाबरी मस्जिद विध्वंस. ये हिंदू समूहों का ड्रीम जॉब था. इसके लिए 425 में221 सीटें लेकर आने वाली कल्याण सिंह सरकार ने अपनी कुर्बानी दे दी. हिंदू हृदयसम्राट बनने के लिए. सरकार तो गई पर संघ की आइडियॉलजी पर कल्याण खरे उतरे थे. रुतबाभी उसी हिसाब से बढ़ा था. दो ही नाम थे उस वक्त- केंद्र में अटल बिहारी और यूपी मेंकल्याण सिंह. और जब 1997 में कल्याण सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने तो फिर से दोबातों के लिए जाने गएः- पहला भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से पंगा. जिसमें वाजपेयी तक कोकह दिया कि पहले एमपी बन पाएंगे तभी तो पीएम बनेंगे.दूसरा अपनी पारिवारिक मित्र कुसुम राय के लिए. जिसमें भाजपा में पार्षद रहीं कुसुमप्रशासन में जो चाहे कर सकती थीं. कल्याण के चलते कोई कुछ नहीं बोल सकता था. बादमें कल्याण सिंह भाजपा से निकाल दिए गए. कुसुम भी गईं. पर बाद में कुसुम भाजपा सेही राज्यसभा सांसद बनीं. कल्याण भी भाजपा में आए, सांसदी लड़े, हारे और फिर पार्टीछोड़ दी.कल्याण सिंह ने यूपी की राजनीति को नाथ दियाअब आपको ले चलते हैं साल 1962 में. अलीगढ़ की अतरौली सीट. 30 साल का लोध समाज कालड़का जनसंघ से चुनाव लड़ता है. हारता है. पर हार नहीं मानता. पांच साल बाद फिरचुनाव होते हैं. इस बार वो कांग्रेस प्रत्याशी को 4,000 वोटों से हरा देता है. इसकेबाद वो यहां से 8 बार विधायक बनता है.2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी के कासगंज की एक रैली में कल्याण सिंह औरराजनाथ सिंह.ये वो दौर था जब यूपी में चौधरी चरण सिंह ने एंटी-कांग्रेस राजनीति खड़ी की औरसफलता भी पाई. उसी वक्त हिंदुस्तान में ग्रीन रिवोल्यूशन हुआ. वेस्ट यूपी मेंकिसानों की स्थिति मजबूत हुई. इनमें से ज्यादातर किसान OBC थे. कल्याण सिंह बड़ेआराम से जनसंघ में पिछड़ी जातियों का चेहरा बनने लगे. 1977 में जब जनता सरकार बनीतो इसमें पहली बार पिछड़ी जातियों का वोट शेयर लगभग 35 प्रतिशत था. कल्याण सिंह नेपहली बार अतरौली विधान सभा इलाके से 1967 में चुनाव जीता और लगातार 1980 तक विधायकरहे. 1980 के विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह को कांग्रेस के टिकट पर अनवर खां नेपहली बार पराजित किया. लेकिन भाजपा की टिकट पर कल्याण सिंह ने 1985 के विधानसभाचुनाव में फिर कामयाबी हासिल की. तब से लेकर 2004 के विधानसभा चुनाव तक कल्याण सिंहअतरौली से विधायक रहे. इमरजेंसी के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी छवि सुधारने कीकोशिश की. जनसंघ से भाजपा बन गई. पर 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की बुरी हारहुई. मात्र दो सीटें मिलीं. अटल खुद हार गए थे. इसके बाद भाजपा को एक नया मुद्दामिल गया. यूपी ने दिया. अयोध्या मंदिर का मुद्दा. उसी वक्त शाह बानो प्रकरण हुआजिसमें मुस्लिम समाज के दबाव में आकर केंद्र में कांग्रेस की सरकार ने संविधान मेंसंशोधन कर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया. फिर इसी सरकार ने हिंदुओं के तुष्टीकरणके लिए विवादित अयोध्या मंदिर का ताला खुलवा दिया. अब भाजपा को राम मंदिर का मोहरामिल गया. उन्होंने दबा के खेला भी. मुसलमानों के मुद्दे पर हिंदुओं को जाति भुलाकरएक होने का आह्वान किया जाने लगा.मंडल और कमंडल की पॉलिटिक्स का सिंबल बन के निकले कल्याण सिंहराजनीति में जनता पार्टी, जन संघ और जनता दल की उठा पठक चलती रही. कहानी में अगलाबड़ा मोड़ आया 1989-90 में जब देश में मंडल और कमंडल की सियासत शुरू हुई. आधिकारिकतौर पर पिछड़े वर्ग की जातियों का कैटेगराइज़ेशन हुआ और पिछड़ों की सियासी ताकतपहचानी गई.बनिया और ब्राह्मण पार्टी कही जाने वाली भाजपा ने पिछड़ों का चेहरा कल्याण सिंह कोबनाया और वादा किया गया गुड गवर्नेंस का. कल्याण सिंह की इस समय दो पहचान बन रहीथी. वो हिंदू हृदय सम्राट के साथ लोधी राजपूतों के मुखिया भी बन रहे थे. भाजपा मेंमहाराष्ट्र के ब्राह्मणों की जगह ओबीसी जातियों से आने वाले फायरब्रांड नेता सामनेआने लगे और कल्याण इनके मुखिया बने. मुसलमानों से लड़ाई के नाम पर जातियां भुलाईजाने लगीं. पर जातियों का वर्चस्व खत्म तो नहीं हो रहा था. इन नए लोगों से नाराजअपर कास्ट के लोगों ने पार्टी के अंदर अपना वर्चस्व बनाने के लिए भीतर ही भीतर जंगछेड़ दी थी. उसी वक्त हर टिकट बंटवारे पर नाराज होने वाली भाजपाई परंपरा भी शुरू होगई थी.1991 में भाजपा 221 सीटें लेकर यूपी विधानसभा में आई लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरीमस्जिद गिरा दी गई और कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया. 6 दिसंबरहिंदुस्तान के इतिहास का काला दिन था. 1993 में फिर चुनाव हुए. भाजपा के वोट तोबढ़े पर सीटें घट गईं. भाजपा सत्ता से बाहर ही रही. इसके दो साल बाद बसपा के साथगठबंधन कर भाजपा फिर सत्ता में आई पर भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं बना. पर देश कीराजनीति बदल गई. केंद्र में कांग्रेस की सरकार बड़ी बेइज्जत हुई.अब दौर आया था अटल बिहारी वाजपेयी का. चारों ओर धूम मच गई - 'अबकी बारी अटलबिहारी'. केंद्र में भी माहौल चेंज हुआ और यूपी में भी.कल्याण सिंह को दूसरी बार मौका मिला पर हिसाब बदल गयायूपी में तेरहवीं विधानसभा का जन्म 17 अक्टूबर 1996 को हुआ था. लेकिन चुनाव नतीजोंके बाद तस्वीर साफ़ नहीं हुई थी. 425 सीटों की विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी 173सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनी. जबकि समाजवादी पार्टी को 108, बहुजन समाजपार्टी को 66 और कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं. पर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी भीराजनीति में मजा लेने आए थे. उन्होंने राष्ट्रपति शासन को छह महीने बढ़ाने के लिएकेंद्र को सिफ़ारिश भेजी. इस पर भी क़ानूनी विवाद खड़ा हो गया क्योंकि राज्य मेंराष्ट्रपति शासन का पहले ही एक साल पूरा हो चुका था. आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट नेइलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय पर रोक लगाते हुए राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाने केकेंद्र के फ़ैसले को मंज़ूरी दे दी.इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ राजनीतिक समीकरणों के बनने-बिगड़ने का. भाजपा और बसपाने एक ऐसा गठजोड़ किया जिसकी हिंदुस्तान के इतिहास में पहले कोई मिसाल नहीं थी.दोनों पार्टियों ने छह-छह महीने राज्य का शासन चलाने का फ़ैसला किया. इससे पहले1995 में भाजपा और बसपा ने सरकार बनाई थी. पर बाद में भाजपा ने समर्थन वापस ले लियाथा जिसकी वजह से राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. इस बार नया प्रयोग हुआ. अगड़ों कीपार्टी और पिछड़ों की पार्टी का गठजोड़. जिसमें पहले छह महीनों के लिए 21 मार्च1997 को मायावती उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. अगड़ों की पार्टी को थोड़ाइंतजार करना था. जाति से जूझते हिंदुस्तान में इस गठजोड़ के दसियों सोशियोलॉजिकलमतलब निकाले जा सकते हैं. ये स्टडी करने लायक गठजोड़ था.कल्याण सिंह की राजनीति में फिर आया काला दिनपर मुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा में एक और महत्वपूर्ण पद होता है. विधानसभाअध्यक्ष का. इसे लेकर दोनों पार्टियों में मतभेद हो गया. बाद में भाजपा के हीकेसरीनाथ त्रिपाठी बने विधानसभा अध्यक्ष. और ये ऐसा फैसला था जिसने बाद में कई कांडकिये. और इसी वजह से पता चला कि ये पद क्यों महत्वपूर्ण था. 21 सितंबर 1997को मायावती के छह महीने पूरे हुए. और भाजपा के कल्याण सिंह ही मुख्यमंत्री बने.बहुत से नेताओं का जोर-जबर था कि ये ना बनें. पर हिंदू हृदय सम्राट का तमगा देकरपीछे हटना भी तो मुश्किल था. इसके बाद मायावती सरकार के अधिकतर फ़ैसले बदले गए.दोनों पार्टियों के बीच मतभेद खुल कर सामने आने लगे. एक महीने के भीतर ही मायावतीने 19 अक्टूबर 1997 को कल्याण सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. राज्यपालरोमेश भंडारी फिर सीन में थे. उन्होंने दो दिन के भीतर 21 अक्टूबर को कल्याण सिंहको अपना बहुमत साबित करने का फरमान दे दिया.इन दो दिनों में यूपी की प्रयोगशाला में कई एक्सपेरिमेंट हुए. बसपा, कांग्रेस औरजनता दल में भारी तोड़-फोड़ हुई और कई विधायक भाजपा में आ गए. कल्याण सिंह को इसकामास्टर माइंड माना गया. दल-बदलुओं पर विधानसभा अध्यक्ष का ही फैसला मान्य होता है.वो तो भाजपा के ही थे. तो कल्याण को कोई दिक्कत नहीं हुई. त्रिपाठी की बहुत आलोचनाहुई. पर कोई फर्क नहीं पड़ा.21 अक्टूबर 1997 का दिन हिंदुस्तान के इतिहास का एक और काला दिन है. और कल्याण सिंहसरकार का दूसरा. उस दिन विधानसभा के भीतर विधायकों के बीच माइक फेंका-फेंकी,लात-घूंसे, जूता-चप्पल सब हुआ.विपक्ष मौजूद नहीं रहा. कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया. उन्हें 222 विधायकोंका समर्थन मिला जो भाजपा की मूल संख्या 173 से 49 अधिक था. विधानसभा में हुई हिंसाके बाद राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश करदी. 22 अक्टूबर को केंद्र ने इस सिफ़ारिश को राष्ट्रपति के. आर. नारायणन को भेजदिया. लेकिन राष्ट्रपति नारायणन ने केंद्रीय कैबिनेट की सिफ़ारिश को मानने से इंकारकर दिया और दोबारा विचार के लिए इसे केंद्र सरकार के पास भेज दिया. आख़िरकार केंद्रसरकार ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश को दोबारा राष्ट्रपति केपास नहीं भेजने का फ़ैसला किया.एक सचिवालय में दो मुख्यमंत्रियों की कहानीअब सब कुछ कल्याण सिंह के हक में था. सबको ईनाम भी देना था. कल्याण सिंह ने पालाबदल कर आए दूसरी पार्टियों के हर विधायक को मंत्री बना दिया. देश के इतिहास मेंपहली बार 93 मंत्रियों के मंत्रिमंडल को शपथ दिलाई गई. पर जिस मशीन को कल्याण सिंहने चलाया था अब वो उनके काबू से बाहर हो गई. बाकी पार्टियों ने भी वैसा ही गठजोड़करना शुरू कर दिया. हुआ ये था कि कांग्रेस से टूटकर 21 विधायकों ने लोकतांत्रिककांग्रेस बना ली थी. ये लोग कल्याण के साथ थे. दूसरी बार सत्ता में आने के बादकल्याण सरकार ने ज़ोर दिया कि स्कूलों में सारी प्राथमिक कक्षाओं की शुरुआतभारतमाता पूजन से शुरू हो. 'यस सर' की जगह 'वंदे मातरम' बोला जाए. फरवरी 1998 मेंसरकार ने राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े लोगों से मुकदमे वापस ले लिए. घोषणा भी हुईकि अगर केंद्र में सरकार आई तो मंदिर वहीं बनाएंगे. 90 दिन में उत्तराखंड भी बनेगा.21 फ़रवरी 1998 को यूपी में फिर एक काला दिन आया. कल्याण सिंह की राजनीति में तीसरीबार आया था ये. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह को बर्ख़ास्त कर जगदंबिका पालको रात में 10.30 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. लोकतांत्रिक कांग्रेस केजगदंबिका कल्याण की ही सरकार में ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर थे. पर दूसरी पार्टियों सेखुफिया बात कर अपना काम कर लिया था.जगदंबिका पाल.इस फ़ैसले के विरोध में अटल बिहारी वाजपेयी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया. रात को हीलोग हाई कोर्ट गए. कोर्ट ने अगले दिन राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी और कल्याणसिंह सरकार को बहाल कर दिया. उस दिन राज्य सचिवालय में अजीब नज़ारा देखने को मिला.वहां दो-दो मुख्यमंत्री बैठे हुए थे. जगदंबिका पाल सबेरे सचिवालय पहुंच करमुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हो गए. छोड़ ही नहीं रहे थे. जब उन्हें हाईकोर्ट का आदेश लिखित में मिला तब बड़े भारी मन से कल्याण सिंह के लिए कुर्सी छोड़करचले गए. बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 26 फ़रवरी को एक बार फिर शक्ति प्रदर्शनहुआ. इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई. सुप्रीम कोर्ट ने इसे अप्रूव किया. दोमुख्यमंत्रियों का किस्सा खत्म हुआ. इसमें एक और रोचक चीज थी. कुछ समय पहले तक सपाके सर्वेसर्वा रहे और वर्तमान में भाजपा नेता नरेश अग्रवाल उस वक्त कांग्रेस मेंहुआ करते थे. जगदंबिका के साथ आए थे. उनके मुख्यमंत्री बनते ही तुरंतउप-मुख्यमंत्री बन गये. और कल्याण के मुख्यमंत्री बनते ही भाजपा में आ गए. कहा किदेख लीजिए, मैं ही स्थायी सरकार दे सकता हूं यूपी में.नरेश अग्रवालराज्यपाल रोमेश भंडारी ने किताब भी लिखी थी. भंडारी के मुताबिक जगदंबिका पाल कीबुरी गत के जिम्मेदार नरेश अग्रवाल ही थे. वो उनके सलाहकार थे. भंडारी ने लिखा हैकि अग्रवाल ने कांग्रेस पार्टी से अपने पिता का ही टिकट काट दिया था. नरेश इतने परही नहीं रुके. 2002 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सपा में आ गए. हरदोई से जीत गए.मंत्री बन गए. 2007 में जब मायावती की सरकार बनी तो बसपा में चले गए. बेटे कोउपचुनाव में विधायक बनवा दिया. खुद 2009 में फर्रुखाबाद से सलमान खुर्शीद के खिलाफलोकसभा चुनाव लड़े. हार गए. फिर मायावती ने उनको राज्यसभा भेज दिया. 2012 में नरेशसपा में चले गए. राज्यसभा में घूंसा भी तान चुके हैं.फिर हिंदू हृदय सम्राट भाजपा से निकाला गया, पर भाजपा को कीमत चुकानी पड़ीपर एक बदलाव हो गया राजनीति में. पहली सरकार में जहां कल्याण सिंह माफियाओं के लिएसिर दर्द थे, तो दूसरी बार माफिया उनकी सरकार में मंत्री बन बैठे थे. 1993 मेंकल्याण सिंह जब राजा भैया के खिलाफ प्रचार करने कुंडा पहुंचे तब नारा दिया था -'गुंडा विहीन करौं, ध्वज उठाय दोउ हाथ'. पर दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर राजाभैया को मंत्रिमंडल में जगह दी थी. क्योंकि मायावती के कल्याण से समर्थन वापस लेनेके बाद तब राजा भैया ने ही कल्याण की मदद की थी.पर उस वक्त एक और बात हो रही थी. उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की एक दोस्त हुआकरती थीं. कुसुम राय. इनके पास सरकारी पावर बहुत थी. जबकि वो सरकार में कुछ खासनहीं थीं. आजमगढ़ की कुसुम राय 1997 में भाजपा के टिकट पर लखनऊ के राजाजीपुरम सेसभासद का चुनाव जीतकर आई थीं. पर कहते हैं कि कल्याण सिंह के वरदहस्त के चलतेबड़े-बड़े फैसले बदल देती थीं. इस बात से भी पार्टी के कई नेता नाराज थे. आपसीलड़ाई तो थी ही. कल्याण सिंह भी किसी की परवाह नहीं कर रहे थे. सबके खिलाफ ओपनरिवोल्ट कर दिया. अटल बिहारी वाजपेयी से रिश्ते खराब कर लिए. मुख्यमंत्री पद सेहटाकर उनको केंद्र में मंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया गया तो आडवाणी से रिश्ते खराबहो गए. 1999 में उनको पार्टी से निकाल दिया गया. फिर कल्याण ने राष्ट्रीय क्रांतिदल नाम से अपनी पार्टी बना ली. अपने पूरे प्रभाव का इस्तेमाल भाजपा के खिलाफ किया.ये वही एसिड था जो अपने हाथ पर गिर गया था.कुसुम राय.द हिंदू अखबार के मुताबिक कुसुम राय को लेकर कल्याण ने किसी को नहीं बख्शा. लखनऊमें कुसुम के रातों-रात पावरफुल बनने के किस्से चलते रहे. मीडिया में चलता रहा किट्रांसफर-पोस्टिंग में खूब कमाई हो रही है. पर कल्याण आंख मूंदे रहे. सरकारी बंगलेमें रहती थीं कुसुम. सुरक्षा मिली थी. कल्याण इतना मानते थे कि अपनी पार्टी बनानेके बाद भाजपा छोड़कर आए नेताओं की भी इज्जत नहीं करते थे.उस वक्त तीन बार के सांसद गंगाचरण राजपूत, जो उनकी ही जाति के थे, उनको पार्टी सेनिकाल दिया. गंगा को कल्याण ही भाजपा में लाए थे. जबकि भाजपा के लोग नहीं चाहते थे.गंगा ने भी खूब धमाल मचाया था. भाजपा में रहते हुए पिछड़ों के लिए रिजर्वेशन कीमांग कर देते. पर कल्याण के चलते कोई कुछ बोलता नहीं था. बाद में गंगा ने कुसुम रायके खिलाफ ही विद्रोह कर दिया. तो कल्याण ने उनको पार्टी से निकाल दिया. संघ परिवारसे आए राम कुमार शुक्ला को भी कल्याण ने निकाल दिया. यूपी में भाजपा की लुटिया डूबगई. भाजपा को घाटा तो हुआ पर कल्याण को कोई फायदा नहीं हुआ. वो वापस पार्टी में आए.पर तब तक सब कुछ बदल चुका था. 2007 में उनको एक बार फिर मुख्यमंत्री पद काप्रत्याशी बनाकर भाजपा ने चुनाव लड़ा पर कोई फायदा नहीं हुआ. और कल्याण ने वो कामकिया जो हैरान करने वाला था. सपा की सीट से लोकसभा में सांसद हो गए.फिर यूपी विधानसभा के 2012 चुनाव में इन्होंने अपनी पार्टी से ही 200 कैंडिडेट उतारदिए. एक भी सीट नहीं मिली. अपने घर अतरौली में भी दुर्गति हो गई. अतरौली से इनकीबहू प्रेमलता हारीं. यहीं से कल्याण 8 बार जीते थे. डिबाई से इनके बेटे राजू भैयाभी हारे. चुनाव के दौरान कल्याण हेलिकॉप्टर से घूमते. लोगों को एक-एक वोट का महत्वसमझाते. लोग समझते थे शायद.26 अगस्त 2014 को कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल बनाए गए. 85 साल के अपने नेताको भाजपा ने शायद भुलाया नहीं. जनवरी 2015 में इनको हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल काअतिरिक्त कार्यभार दिया गया. एक कमाल की बात है कि कल्याण सिंह और नरेंद्र मोदीदोनों ही 2000 के आस-पास बहुत तेजी से ऊपर चढ़ रहे थे. दोनों ही अटल बिहारी वाजपेयीकी नजरों में ऊंचे नहीं थे. आडवाणी खेमे के थे. दोनों ही हिंदू हृदय सम्राट के तमगेके लिए लालायित थे. दोनों ही पिछड़ी जाति से थे. पर मोदी ने अपनी राजनीति बचा ली.कल्याण नहीं बचा पाए. जनवरी 2017 की अपनी लखनऊ रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीने कल्याण सिंह को याद किया. वहीं नवंबर 2016 में मेरठ रैली में अमित शाह ने प्रदेशकी जनता से वादा किया कि कल्याण सिंह का सुशासन आएगा यूपी में. अभी कल्याण सिंह का25 साल का पोता संदीप सिंह अतरौली से चुनाव लड़ रहा है. इनका बेटे राजवीर तो पहलेसे ही भाजपा सांसद हैं.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ेंःयूपी के इस मुख्यमंत्री की कहानी कांग्रेस के पतन की कहानी हैयूपी का वो मुख्यमंत्री जिसे जामुन के पेड़ से बांधकर पीटा गया थायूपी का वो मुख्यमंत्री, जो रिजाइन कर रिक्शे से घर चला गयायूपी के इस मुख्यमंत्री की बहू सरकार के फैसले बदल देती थी!यूपी का वो मुख्यमंत्री, जिसका करियर अमिताभ बच्चन ने खत्म कर दियायूपी का वो मुख्यमंत्री जिसे देश के प्रधानमंत्री ने उपचुनाव में हरवा दियायूपी की पहली महिला मुख्यमंत्री जो एक वक्त सायनाइड का कैप्सूल ले के चलती थींउस चीफ मिनिस्टर की कहानी जो गरीबी में मरा और यूपी में कांग्रेस बिखर गईयूपी का वो मुख्यमंत्री, जो चाय-नाश्ते का पैसा भी अपनी जेब से भरता थायूपी का वो मुख्यमंत्री जिसके आम पूरी दुनिया में फर्स्ट प्राइज लाए थेयूपी का ये मुख्यमंत्री अपने अकाउंट में मात्र दस हजार रुपये लेकर मरामैं यूपी विधानसभा हूं और ये मेरी 65 साल की कहानी है