दिल्ली और पंजाब चुनावों से पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला किया है. देश कीसबसे बड़ी अदालत ने साफ-साफ कहा है कि जो धर्म, जाति या भाषा के आधार पर वोट मांगनागैरकानूनी होगा. सुप्रीम कोर्ट की एक कॉन्स्टीट्यूशनल बेंच होती है जो कानूनी मसलोंपर विचार करती है. 7 जजों वाली बेंच में से 4 जज धर्म-जाति और भाषा के आधार पर वोटमांगने के खिलाफ थे, जबकि तीन इसके पक्ष में थे. इस तरह 1951 के रीप्रेजेंटेशन ऑफ़पीपल एक्ट (RP एक्ट) की नई व्याख्या कर दी है. जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वालीबेंच ने कहा कि कोई चुनावी कैंडिडेट या उसके प्रतिनिधि धर्म, जाति या भाषा काइस्तेमाल वोट मांगने के लिए नहीं कर सकते. कोर्ट ने कहा, 'भगवान और मनुष्य के बीचका रिश्ता निजी मामला है. कोई भी 'राज्य' (माने सरकार) किसी एक धर्म के साथ विशेषव्यवहार नहीं कर सकती.' कोर्ट ने ये कहा कि न सिर्फ उम्मीदवार, बल्कि उम्मीदवार केविरोधी भी, उसके खिलाफ बोलने में उसके धर्म, जाति या भाषा को निशाना नहीं बनासकेंगे. ऐसा होने पर इसे RP एक्ट की धारा 123(3) के तहत 'करप्ट प्रैक्टिस' मनाजाएगा. ये 7 में से 4 जजों का रुख था. बाकी 3 जजों की राय ये रही कि चूंकि लोगों केसाथ धार्मिक, जातीय या भाषाई आधार पर भेदभाव हुआ है, इसलिए चुनावी प्रक्रिया मेंधर्म, जाति या भाषा 'दीवार' नहीं बन सकती. कोर्ट ने फैसले में ये भी कहा कि चुनावएक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है. इसलिए उम्मीदवार का कार्यकलाप भी धर्मनिरपेक्ष हीहोना चाहिए. सुनवाई के बीच कोर्ट ने साफ़ किया था कि वो 'हिंदुत्व' शब्द की दोबाराव्याख्या नहीं करेगा. 1995 के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि हिंदुत्व'जीने का तरीका' है, न कि कोई एक ख़ास धर्म. ये फैसला उस मामले पर आया है जोमध्यप्रदेश के नारायण सिंह ने सुन्दर लाल पटवा के खिलाफ दायर किया था. सुन्दर लालपटवा एक वक़्त मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे. नारायण ने पटवा के खिलाफ चुनाव लड़ाथा और वो चुनाव याचिका पटवा के खिलाफ डाली थी, जिस पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक आया.5 जजों की बेंच से हो होकर मामला अब 7 जजों की बेंच तक पहुंचा था.