समाजवादी पार्टी पर कब्जे की लड़ाई में अब आगे क्या होगा? मामला अब चुनाव आयोग केपास जा रहा है. कोई भी गुट आयोग के पास पहले जाए, दोनों पक्षों की बात सुनकर हीफैसला लिया जाएगा.जिन मानकों पर दोनों पक्षों की बात तौली जाएगी, वो होंगे- i) पार्टी का संविधान औरii) बहुमत परीक्षा.मुलायम खेमा चाहेगा कि पार्टी के संविधान को प्राथमिकता दी जाए, ताकि उस अधिवेशन को'असंवैधानिक' साबिक किया जा सके, जिसमें शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया गया.वहीं अखिलेश खेमा 'बहुमत' के आधार पर दावा ठोंकेगा.पुराने उदाहरणों को याद करें तो चुनाव आयोग के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा. इसप्रक्रिया में काफी समय लग सकता है. फिलहाल तीन संभावनाएं बनती हैं:1. अगर सपा के संविधान से चलें तो...अगर आयोग का जोर सपा के संविधान पर रहा तो कुछ बातें मुलायम के पक्ष में जा सकतीहै. पार्टी संविधान के सेक्शन 14 के सब-क्लॉज 2 के मुताबिक, पार्टी का विशेषअधिवेशन सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष दो आधार पर बुला सकता है. एक, अगर नेशनलएग्जीक्यूटिव प्रपोज करे या राष्ट्रीय अधिवेशन के कम से कम 40 फीसदी सदस्य इसकीमांग करें.ज़ाहिर है कि रविवार सुबह रामगोपाल-अखिलेश के अधिवेशन में ये औपचारिकता पूरी नहींकी गई. इसलिए तकनीकी तौर पर यहां मुलायम का 'अपर हैंड' है.सब-क्लॉज 4 के मुताबिक, अगर मनोनीत और निर्वाचित दोनों तरह के प्रतिनिधि कोई आपत्तिउठाते हैं तो राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला आखिरी होगा और इस फैसले को कोर्ट मेंचुनौती नहीं दी जा सकेगी.सपा के संविधान का सेक्शन 15 के मुताबिक: राष्ट्रीय और विशेष, दोनों तरह केअधिवेशनों की अध्यक्षता का अधिकार भी नेशनल एग्जीक्यूटिव के अध्यक्ष के पास हीहोगा. साथ ही, राष्ट्रीय अध्यक्ष को ये हक होगा कि वो अनुशासनहीनता के आधार परपार्टी में किसी के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकें. इसे भी कोर्ट में चैलेंज नहीं कियाजा सकेगा.मुलायम खेमा चाहेगा कि सुनवाई 'पार्टी संविधान' के इर्द-गिर्द ही रहे और बात बहुमतसाबित करने तक न जाए. ताकि वे साबित कर सकें कि प्रोफेसर रामगोपाल यादव का बुलायाराष्ट्रीय अधिवेशन 'अवैध' था.https://www.youtube.com/watch?v=AJCmImuMRM82. अगर बहुमत पैमाना है तो...दूसरी तरफ, अखिलेश खेमा चाहेगा कि बहुमत टेस्ट हो. दो बार के शक्ति प्रदर्शन सेजाहिर है कि सपा के निर्वाचित विधायक और नेशनल एग्जीक्यूटिव के ज्यादातर सदस्यअखिलेश के पक्ष में हैं. यहां तक कि बहुत सारे वे लोग जिनका नाम शिवपाल कीउम्मीदवार सूची में था, अखिलेश के पक्ष में आ गए हैं. बहुमत अगर पैमाना हुआ तोअखिलेश यादव खेमे का जीतना तय है.Photo: Reutersहालांकि संविधान के मोर्चे पर अखिलेश खेमे की अपनी दलीलें है. रामगोपाल यादव कहचुके हैं कि रविवार को हुए विशेष अधिवेशन में आए पार्टी प्रतिनिधियों के दस्तख़तउनके पास हैं. पार्टी के सूत्र बताते हैं कि सपा के संविधान को 'प्रोफेसर साहब' सेबेहतर कोई नहीं समझता, क्योंकि यह संविधान उन्हीं का बनाया हुआ है.3. तो दोनों से छिनेगी साइकिलतीसरी संभावना ये है कि दोनों खेमों से साइकिल का सिम्बल छीन लिया जाए. अगर चुनावआयोग फिलहाल कोई फैसला लेने में खुद को असमर्थ पाता है तो वह सपा के चुनाव निशान को'फ्रीज' करके अपने पास सुरक्षित कर लेगा और दोनों खेमों को नए चुनाव निशान दिएजाएंगे.पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी के मुताबिक इसकी संभावना काफी है. उन्होंनेकहा कि चुनाव आयोग को सारे सिग्नेचर वेरिफाई करने होंगे. इस प्रक्रिया में समय लगताहै और किसी नतीजे तक पहुंचने में चुनाव आयोग 5 महीने तक का वक्त ले सकता है. जबकिचुनाव नजदीक हैं. इसलिए दोनों धड़ों को अलग-अलग चुनावी निशान दिए जा सकते हैं.कुरैशी ने इसके लिए उत्तराखंड क्रांति दल में बंटवारे का उदाहरण दिया, जब ये पार्चीUKD X और UKD Y में बंट गई थी.https://www.youtube.com/watch?v=pmkfZaOFtaUवैसे लखनऊ के पुराने पक्षी बता रहे हैं कि अखिलेश खेमा इस वक्त उत्साह की जिस लहरपर सवार है, वह किसी संभावना से डरा हुआ नहीं है. 'इंडियन एक्सप्रेस' में छपा पूर्वविधायक ब्रजमोहन यादव का एक बयान काबिले-गौर है. वह कहते हैं, 'पिछले कुछ दिनों मेंसाफ हो गया है कि जनता, विधायक और कार्यकर्ताओं का समर्थन किसके पास है. लंबे समयसे उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने का इंतजार किया जा रहा था. वो सपा को गुंडों औरमाफियाओं के चंगुल से निकालकर लाए हैं. अगर उन्हें साइकिल का सिम्बल नहीं भी मिलताहै तो भी कोई दिक्कत नहीं है. अखिलेश अब खुद सिम्बल हैं.'