~ राजन पाण्डेय बता रहे हैं उत्तर प्रदेश में पहली विधानसभा से लेकर अब तक कीविधानसभा में राजनीति की उठा-पठक और बदलते समीकरणों के बारे में-------------------------------------------------------------------------------- उत्तर प्रदेश विधानसभा: 1950 से अब तकउत्तर प्रदेश विधानसभादेश की राजनीति में उत्तर प्रदेश की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि अब तकहुए 14 प्रधानमंत्रियों (कार्यवाहक को छोड़ के) में से आठ अकेले उत्तर प्रदेश से आयेहैं, जिनमें से दो (चरण सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह) प्रदेश के मुख्यमंत्री भीथे. 545 सदस्यों वाली लोकसभा में उत्तर प्रदेश अकेले 80 सदस्य भेजता है, जो दूसरेसर्वाधिक सदस्य भेजने वाले राज्य महाराष्ट्र (48 लोकसभा सीटें) का लगभग दोगुना है.403 निर्वाचित सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधानसभा देश की सबसे बड़ी राज्य विधायिकाहै. प्रदेश की विधानसभा का पहला चुनाव 1937 में हुआ था जब उसे संयुक्त प्रान्त(यूनाइटेड प्रोविन्सिज) के नाम से जाना जाता था. 26 जनवरी 1950 को तत्कालीनप्रीमियर पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने थे और 1951 मेंपहले आम चुनाव के बाद नवगठित उत्तर प्रदेश की पहली विधानसभा का गठन हुआ था, जिसमेंतब 430 निर्वाचित सदस्य हुआ करते थे. एक नॉमिनेटेड सदस्य था.पहली, दूसरी और तीसरी विधानसभा: स्थिरता का दौरगोविंद वल्लभ पंतअपनी राजनैतिक अस्थिरता के चलते किस्से-कहानियों का हिस्सा बन चुकी उत्तर प्रदेश कीशुरुआती चुनावी राजनीति स्थायित्व का नमूना थी, जब प्रदेश और देश की राजनीति परकांग्रेस के दबदबे को किसी भी विपक्षी दल से कोई बड़ी चुनौती नहीं मिल रही थी.प्रदेश की पहली विधानसभा ने अपना पांच साल का कार्यकाल बिना किसी दिक्कत के पूराकिया. यहां तक की जब दिसम्बर 1954 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित पन्त कोकेन्द्रीय गृह मंत्री बना के दिल्ली बुला लिया गया, तो नए मुख्यमंत्री के बतौरडॉक्टर सम्पूर्नानन्द का चुनाव बिना किसी उठा-पटक के संपन्न हो गया. यूं सत्तारूढ़उत्तर प्रदेश कांग्रेस अपनी गुटबाजी के लिए तब भी बदनाम थी, पर पंडित पन्त के रहतेगुटों पर लगाम बनी रही. उनके दिल्ली जाते ही चौधरी चरण सिंह और चन्द्र भानुगुप्ता-कमला पति त्रिपाठी गुटों की सर फुटौव्वल चरम पर पहुंच गई.डॉक्टर सम्पूर्नानन्ददूसरी विधानसभा के चुनावों के बाद सत्ता फिर कांग्रेस के हाथ में आई और डॉक्टरसम्पूर्नानन्द फिर से मुख्यमंत्री बने, पर कमलापति त्रिपाठी और चन्द्र भानु गुप्ताकी हरकतों के चलते उन्हें 1960 में अपने पद से हटना पड़ा और चन्द्र भानु गुप्ताविधान सभा के बचे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बने. तीसरी विधान सभा में भीकांग्रेस ही जीती और चन्द्रभानु गुप्ता फिर मुख्यमंत्री बने.चन्द्रभानु गुप्तापर आतंरिक विरोध के चलते उन्हें हटाकर सुचेता कृपलानी को मुख्यमंत्री बनाया गया. इससमय तक प्रदेश की राजनीति की खासियत ये थी कि तमाम गुटबाजियों के बावजूद शासक दल कोकोई बड़ी टूट फूट नहीं झेलनी पड़ी और तीनों विधानसभाओं ने अपना कार्यकाल पूरा किया.सुचेता कृपलानीचौथी विधानसभा: शुरू हुआ विघटन और अस्थिरता का दौरलम्बे समय से चरण सिंह कांग्रेस में अपनी स्थिति से असंतुष्ट थे और पार्टी केब्राह्मण-बनिया-ठाकुर या ऊंची जाती वाले नेतृत्व से नाराज थे. चन्द्र भानु गुप्तासे कभी ओबीसी उम्मीदवारों को पुलिस भरती में उम्र में छूट तो कभी किसानों से लिएजाने वाले टैक्स में 50% बढ़ोत्तरी जैसे सवालों पर चरण सिंह की ठनती रही थी. यही वहदौर था जब हरित क्रांति के चलते पिछड़ी, खेतिहर जातियां आर्थिक रूप से मजबूत हो रहींथीं और लोहिया का "पिछड़ा पावे सौ में साठ" का नारा उनकी राजनैतिक आकांक्षाओं को नएपंख दे रहा था. ऐसे में अंततः चरण सिंह ने कांग्रेस छोड़कर पिछड़ों और किसानों कीराजनैतिक ताकत के दम पर सिंहासन कब्जाने का फैसला किया. 1967 में हुए चौथी विधानसभाके चुनावों में कांग्रेस घिसटते-घिसटते बहुमत तक पहुंच पायी पर चन्द्र भानु गुप्ताको मुख्यमंत्री बनाने के सवाल पर चरण सिंह ने कुछ अन्य मुद्दों का बहाना बनाकरपार्टी तोड़ दी.चरण सिंहउनके साथ कांग्रेस के 16 और विधायक भी चल दिए और गुप्ता सरकार अल्पमत में आ गई. 19दिन मुख्यमंत्री रहने के बाद गुप्ता जी को कुर्सी छोड़नी पड़ी और कम्युनिस्टों,समाजवादियों, जनसंघियों और अम्बेडकरवादियों, यानी समूचे विपक्ष की मदद से पहली बारकोई गैर उच्च जातीय व्यक्ति प्रदेश का मुख्यमंत्री बना. इस प्रयोग को नाम दिया गयासंयुक्त विधायक दल, या संविद सरकार. अपने विचारधारात्मक अंतर्विरोधों के चलते येसरकार एक साल भी न चल पायी और आखिर फरवरी 1968 में प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगादिया गया. उत्तर प्रदेश के राजनैतिक इतिहास में यह पहली विधानसभा थी जो अपनाकार्यकाल पूरा नहीं कर पाई.पांचवीं विधानसभा: जब बना मुख्यमंत्रियों की संख्या का रिकॉर्डहेमवती नन्दन बहुगुणा1969 में हुए पांचवीं विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस को 425 सीटों में से 211 परविजय मिली, जबकि जनसंघ को 49, कम्युनिस्ट पार्टियों को 5, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टीको 33 और चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल को 98 सीटें मिलीं. अपने दम पर स्पष्टबहुमत पाने में कांग्रेस एक बार फिर नाकाम रही. यूं जोड़-तोड़ करके कांग्रेस केचन्द्र भानु गुप्त एक बार फिर मुख्यमंत्री बने पर उनकी सरकार एक साल से ज्यादा नहींचल पायी. अस्थिरता का जो दौर पिछली विधानसभा से शुरू हुआ था वो जारी रहा, लेकिनमुख्यमंत्रियों की संख्या के मामले में इस विधानसभा ने रिकॉर्ड बनाया. पहले गुप्ताकी सरकार को पटखनी देकर चरण सिंह मुख्यमंत्री बने, पर उनकी सरकार 8 महीनों में हीधराशायी हो गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. अक्टूबर 1970 में जोड़तोड़ करके कांग्रेस ने फिर सरकार बनायी और एक नया मुख्यमंत्री- त्रिभुवन नारायण सिंहगद्दी पर बैठा. पर लगभग पांच महीनों में ही उनकी जगह कमलापति त्रिपाठी कोमुख्यमंत्री बना दिया गया. त्रिपाठी जी की मुख्यमंत्री बनने की साध तो पूरी हुई, पर2 साल 2 महीने बाद उनके हाथ से भी कुर्सी सरक गई. लगभग पांच महीने फिर राष्ट्रपतिशासन रहा और उसके बाद नवम्बर 1973 से मार्च 1974 तक हेमवती नन्दन बहुगुणा राज्य केमुख्यमंत्री रहे. इस एक विधानसभा के दौरान 5 मुख्यमंत्री बने और दो बार राष्ट्रपतिशासन लगा.छठी और सातवीं विधानसभा: कांग्रेस का अवसान और जनता सरकार का आगमनराम नरेश यादवछठी विधानसभा के दौरान भी अस्थिरता चलती रही और बार बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.तमाम कोशिशों के बाद भी भारतीय क्रांति दल और समाजवादी पार्टियां कांग्रेस केमुकाबले कोई संयुक्त विकल्प खड़ा कर पाने में असफल रहे थे और 1974 के चुनाव मेंकांग्रेस 215 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी का अपना रुतबा बरक़रार रखे हुए थी. एकसशक्त विकल्प के लिए राज नारायण की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और चरण सिंह की भारतीयक्रांति दल ने विलय करके 1974 में ही भारतीय लोक दल की स्थापना की. बाद में इंदिरागांधी की लगाई इमरजेंसी के चलते समूचा विपक्ष एकजुट हुआ और जनता पार्टी के रूप नेसभी विपक्षी पार्टियां 1977 के चुनाव में उतरीं. इंदिरा की तानाशाही और आपातकाल कीज्यादतियों के विरुद्ध उमड़े जन विक्षोभ में केंद्र और राज्य दोनों जगह कांग्रेस कासफाया हो गया और सातवीं विधानसभा में जनता पार्टी को 425 में से 352 सीटें मिलींजबकि कांग्रेस 47 सीटों पर सिमट गई. प्रदेश की सर्वोच्च सीट पर पहली बार पिछड़ी जातिका एक व्यक्ति- राम नरेश यादव काबिज हुआ. मगर घटक दलों की आपसी फूट के चलते वे दोसाल भी मुख्यमंत्री नहीं रह पाए और फरवरी 1979 में बनारसी दास को जनता पार्टी सरकारका मुखिया बनाया गया. दलों की आपसी फूट तब भी नहीं रुकी और अंत में जनता सरकारअपनों के खींचे ही मुंह के बल गिरी. प्रदेश में फिर राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.बनारसी दासआठवीं और नवीं विधानसभा: स्थिरता की वापसीजनता सरकार जन आकांक्षाओं पर सवार होकर सत्ता तो पहुंच गई थी पर वायदों को पूराकरने में उसकी अक्षमता और राजनैतिक स्वार्थों के चलते अंधे हुए उसके नेताओं की आपसीजूतम पैजार ने मरी हुई कांग्रेस में नए प्राण फूंक दिए. 1980 में हुए आठवींविधानसभा के चुनावों में कांग्रेस ने धमाकेदार वापसी की और 425 में से 309 सीटों परअपना परचम लहराया, जबकि बिखर चुका विपक्ष सवा सौ सीटों तक भी नहीं पहुंच सका औरमाकपा, आर पी आई जैसी विपक्षी पार्टियों को शून्य पर समझौता करना पड़ा. यही ट्रेंडअगले चुनावों में भी जारी रहा और मार्च 1985 में हुए नवीं विधानसभा के चुनावों मेंकांग्रेस 269 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत लेकर आई. हालांकि कांग्रेस की गुटबाजी फिरअपने चरम पर पहुंच गई और इन दो विधानसभाओं में कांग्रेस ने 5 बार मुख्यमंत्री बदले.नारायण दत्त तिवारीदसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं विधानसभा: नयी राजनैतिक शक्तियों का उदय, सवर्णों कापत्ता साफ़https://www.youtube.com/watch?v=byNdhmK_t4Eदसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं विधानसभाओं में अस्थिरता के दौर की वापसी हुई और कोईभी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी. साथ ही साथ जहां एक ओर भाजपा ने बाबरीमस्जिद की जगह अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को मुद्दा बनाकर उग्र हिंदुत्व कीराजनीति शुरू की वहीँ समाजवादी दलों ने पिछड़ों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में27% आरक्षण दिलाकर सामाजिक न्याय की राजनीति को नया रूप दिया. इसी दौर में प्रदेशके राजनैतिक मंच पर पिछड़े और दलित वर्गों की राजनैतिक ताकतों के प्रतिनिधि नयेराजनैतिक दलों का न सिर्फ उदय हुआ, बल्कि कुर्सी पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत भी हुई किआने वाले दस सालों तक कोई सवर्ण मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठ सका. सरकारबनाने वाले सभी दलों ने पिछड़ों और दलितों को ही मुख्यमंत्री बनाया. बाद के दौर मेंभी प्रदेश की राजनीति इस दौर की दो राजनैतिक शख्सियतों- मायावती और मुलायम सिंह केइर्द गिर्द ही घूमती रही.https://www.youtube.com/watch?v=AJCmImuMRM8तेरहवीं विधानसभा: एक ही ऑफिस में दो-दो मुख्यमंत्री-बलप्रयोग को शाब्दिक अर्थ मेंलियाप्रदेश की राजनीति यूं तो कभी आदर्श नहीं रही लेकिन तेरहवीं विधानसभा को राजनितिकव्यवहार का सबसे गंदा उदाहरण कहा जा सकता है. अस्थिरता के चलते राजनैतिक दलों नेसरकार बनाने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाया जिसमें विधायकों की खरीद-फरोख्त और बलप्रयोग जैसे तरीके भी शामिल थे. 1997 में अपनी सरकार बचाने के लिए कल्याण सिंह ने नसिर्फ मंत्री पद का लालच देकर विरोधी दलों से विधायकों को तोड़ने का कारनामा किया,बल्कि सदन में बहुमत साबित करते वक्त उनके समर्थकों ने विरोधी विधायकों कोदौड़ा-दौड़ा के पीटा भी. जिसकी रिकॉर्डिंग्स आज भी लोकतंत्र को शर्मसार करतीं हैं.इसी विधानसभा के दौरान सदन में शक्ति प्रदर्शन को विधायकों ने पहली बार शाब्दिकअर्थ में लिया और जम कर एक-दूसरे की धुनाई की.शक्ति प्रदर्शन का शाब्दिक अर्थलेकिन मजे की बात ये रही कि विरोधी दलों, विशेष तौर पर समाजवादी पार्टी और राज्य केराज्यपाल रोमेश भंडारी ने भी हर नीचता तक जाकर कल्याण सरकार को बर्खास्त कराने केठठ करम किए.रोमेश भंडारीएक ही ऑफिस में दो-दो मुख्यमंत्री1998 में एक मजेदार वाकया तब सामने आया जब 21 फरवरी को कल्याण सरकार के ही एक घटकदल लोकतान्त्रिक कांग्रेस के नेता जगदम्बिका पाल ने राज्यपाल के सामने दावा किया किउनके पास सदन के बहुमत का समर्थन है. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने भी सभी प्रक्रियाओंको ताक पर रखकर बिना कल्याण से बात किए उनकी सरकार बर्खास्त कर दी और पाल कोमुख्यमंत्री की शपथ दिला दी. कल्याण सिंह उसी दिन उच्च न्यायालय से स्टे ले आये औरअगले दिन मुख्यमंत्री सचिवालय में एक अद्भुत नजारा देखने को मिला. जब मुख्यमंत्रीकल्याण सिंह अपने दफ्तर पहुंचे तो वहां जगदम्बिका पाल उनकी कुर्सी पर बतौरमुख्यमंत्री पहले से बैठे हुए थे. रिकार्ड्स के हिसाब से जब कल्याण ने पाल को उच्चन्यायालय का आदेश दिखाया तो वे कुर्सी छोड़ के चले गए. लेकिन कुछ जानकार बताते हैंकि कुर्सी से चिपके जगदम्बिका पाल को घसीट कर दफ्तर से बाहर निकाला गया था.जगदम्बिका पालऔर भी हुए हैं सितम: जंबो मंत्रिमंडल, भुलक्कड़ और भगोड़े मुख्यमंत्रीकल्याण सिंहइसी विधानसभा के दौरान उत्तर प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा मंत्रिमंडल बनाया गया.1997 में जोड़-तोड़ से बनी अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए कल्याण सिंह ने जम्बोमंत्रिमंडल बनाया जिसमें 93 मंत्री थे. यानी सदन के लगभग हर चौथे विधायक को मंत्रीबना दिया गया था. साथ ही साथ इसी विधानसभा में ये भी हुआ कि मुख्यमंत्री रहा कोईव्यक्ति (कल्याण सिंह) विधानसभा के कार्यकाल के दौरान ही अपनी पार्टी छोड़ कर एक नयीपार्टी बनाने चला गया हो. नहीं कल्याण के रिप्लेसमेंट के बतौर लाए गए वरिष्ठ औरभुला दिए गए भाजपा नेता रामप्रकाश गुप्ता अपने भुलक्कड़पन के लिए भी प्रसिद्ध रहेक्योंकि वे अपनी ही पार्टी के विधायकों के बारे में भूल जाते थे. कुल मिलाकर इसविधानसभा ने भी दो पार्टियों के चार मुख्यमंत्री देखे (जगदम्बिका पाल को जोड़ें तोपांच) और 2 महीना राष्ट्रपति शासन भी रहा. उत्तर प्रदेश का विभाजन भी इसी दौरान हुआऔर सदन की संख्या 425 से घटकर 403 पर आ गई. कुल मिलाकर राजनीति का जो सर्कस तेरहवींविधानसभा के दौरान देखने को मिला वह "न भूतो न भविष्यति" जैसा ही था.रामप्रकाश गुप्ताhttps://www.youtube.com/watch?v=JKrQISdx68Mअस्थिरता से स्थिरता की ओर: स्पष्ट बहुमत का युगमायावती2002 में हुए चुनावों के बाद गठित चौदहवीं विधानसभा की शुरुआत ही राष्ट्रपति शासनसे हुई, क्यूंकि कोई भी दल सदन में बहुमत नहीं ला पाया था. लेकिन उम्मीद से इतर इसविधानसभा ने सिर्फ दो महीने ही राष्ट्रपति शासन झेला, जो पिछली विधानसभाओं केमुकाबले सबसे कम था. मई 2002 में ही भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्मंत्री बनीं.एक साल चार महीने बाद ताज कॉरिडोर मसले पर दोनों के बीच खटपट होने के बाद मायावतीने सदन भंग करने की चिट्ठी राज्यपाल को दे दी, पर मुलायम सिंह ने जोड़-तोड़ करके सदनमें अपना बहुमत साबित कर दिखाया. मायावती को मजा चखाने को आतुर भाजपा ने भी उनकीअपरोक्ष मदद की और जिस तरह मुलायम ने बसपा को फोड़कर अपना बहुमत जुटाया उसने एकबारगी1997 की याद दिला दी. लेकिन अपराध, गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम रही इससरकार को चलाने का खामियाजा सपा को 2007 के चुनावों में चुकाना पड़ा और मायावती 207विधायकों के स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आयीं. इसी के साथ "हंग असेंबली" यात्रिशंकु विधानसभा के दौर का भी अंत हुआ. सोलहवीं विधानसभा में भी यही ट्रेंड जारीरहा और 224 विधायकों के साथ सपा की सत्ता में वापसी हुई. 1990 से 2007 तक का दौरअपराध और राजनीति की सांठ-गांठ के लिए भी बदनाम रहा, पर उसपर तफसील से चर्चा करेंगेअगले लेख में.--------------------------------------------------------------------------------UP इलेक्शन की पहली लल्लनटॉप ग्राउंड रिपोर्ट: सपा के गढ़ मैनपुरी सेमैनपुरी से ग्राउंड रिपोर्ट 2: किशनी और करहल विधानसभाओं का हाल