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अशोक गहलोत के इस गढ़ को नहीं भेद पा रही है बीजेपी

महज 26 साल की उम्र में यहां से पहला चुनाव लड़े थे और हार गए थे.

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11 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 11 दिसंबर 2018, 04:33 PM IST)
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1. सीट: जोधपुर की सरदारपुरा सीट.
2. चुनने की वजह: अशोक गहलोत का पर्याय बन चुकी है. वो यहां 1999 से चुनाव जीतते आ रहे हैं.
3. चैलेंजर कौन: बीजेपी ने उनके मुकाबले में शंभू सिंह खेतासर को उतारा है. खेतासर पिछले चुनाव में अशोक गहलोत से 18,478 वोट के मार्जिन से मात खा चुके हैं.
4. ट्रिविया:
  • 1980 से यह सीट कांग्रेस के पास रही है. 1999 में जब वो पहली मर्तबा मुख्यमंत्री बने थे तो उनके दोस्त मान सिंह देवड़ा ने उनके लिए यह सीट खाली की थी. इसके बाद से यह सीट उनके पास ही रही है.
अशोक गहलोत.
अशोक गहलोत.

2008 के चुनाव में बीजेपी ने राजेंद्र गहलोत को टिकट दिया था. उन्हें भी अशोक गहलोत के सामने 15,340 वोट के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. अशोक गहलोत की कामयाबी की वजह उनका जनता के साथ कनेक्ट भी बताया जाता है. मुख्यमंत्री होने के बावजूद वो इलाके के लोगों के लिए उपलब्ध रहे थे. इसके अलावा अपने दो कार्यकाल में उन्होंने जोधपुर में काफी काम करवाए थे. यह चीज लोगों को उनसे जोड़े रखती है.
शंभू सिंह.
शंभू सिंह.
  • जो सरदारपुरा सीट आज अशोक गहलोत का सबसे मजबूत किला मानी जाती है, कभी इसी सीट से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. तब वो महज 26 साल के नौजवान हुआ करते थे. 1977 के विधानसभा चुनाव में इंदिरा विरोधी लहर में उन्हें जनता पार्टी के माधो सिंह के खिलाफ 4,329 वोट से मात खानी पड़ी थी. इस सीट पर अशोक गहलोत के खिलाफ एक ही बात जाती है कि वो यहां प्रचार के लिए समय नहीं दे पाए. दूसरी तरफ खेतासर लगातार जनसंपर्क करते हुए दिखाई दिए.
नतीजा: अशोक गहलोत 44,054 वोट से जीत गए हैं.
गहलोत- 92,934 वोट
खेतासर- 48,880 वोट


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