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दलितों ने मर्जी से वोट दिया, तो मंदिर के लाउडस्पीकर से ऐलान करके जिंदगी सांसत में डाल दी

और हम खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं!

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10 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 9 दिसंबर 2018, 03:56 AM IST)
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इससे बेहतर था कि चुनाव ही ना करवाए जाते
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राजस्थान में एक जिला है नागौर. अगर आपकी इतिहास में दिलचस्पी है तो आप इसे अमर सिंह राठौड़ का नागौर पढ़ सकते हैं या फिर सूफी संत हमीदुद्दीन नागौरी का शहर. अगर खेती से जुड़े हैं तो आपके पिता या दादा ने यहां के मजबूत बैलों के बारे में जरूर बताया होगा. अगर स्वभाव से मिस्त्री हैं तो बहुत संभावना है कि जिस प्लास से नट की चूड़ी कसते हैं, वो यहां का बना हुआ हो. राजस्थान का वो जिला जहां से थार का रेगिस्तान शुरू होता है.

नागौर में जिला मुख्यालय से महज 14 किलोमीटर दूर एक गांव है फिड़ोद. 50 साल के बग्गाराम मेघवाल के लिए 9 दिसंबर की सुबह रोजमर्रा की कवायद से ही शुरू हुई. सुबह नहा-धोकर वो गांव के ही दिनेश गरवा के घर पहुंचे. गरवा के यहां भवन निर्माण चल रहा था. बग्गाराम यहां दिहाड़ी पर काम कर रहे थे. दोपहर तक सबकुछ ठीक रहा. दोपहर को खाने की छुट्टी के दौरान बग्गाराम को महसूस हुआ कि एक दिन पहले ठाकुरजी के मंदिर से लाउडस्पीकर पर हुई घोषणा को हल्के में लेना उनकी भूल थी. गरवा ने उनसे कहा कि वो खाने के लिए अपने घर चले जाएं और लौटते हुए अपने लिए पीने का पानी साथ में लेते आएं. बग्गाराम बुझे मन के साथ अपने घर लौट आए और वापस लौटकर नहीं गए. अब तक ऐसा होता आया था कि मजदूर को दोपहर का खाना और दो वक़्त की चाय काम करवाने वाले की तरफ से दी जाती थी. एक दिन पहले गांव के सिरोही बास के ठाकुरजी के मंदिर में ऐसा क्या हुआ कि दिनेश गरवा का बर्ताव अचानक बदल गया?

7 दिसंबर को राजस्थान में विधानसभा चुनाव थे. नागौर से बीजेपी ने जाट समुदाय से आने वाले मोहन राम चौधरी को मैदान में उतारा था. उनके सामने कांग्रेस ने बीजेपी के बागी हबीबुर्रहमान को टिकट दिया था. फिड़ोद गांव में स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने के लिए नरसी की जीप किराए पर ली. नरसी इसी गांव के रहने वाले हैं और दलित मेघवाल बिरादरी से आते हैं. चुनाव की भाग-दौड़ के बीच वो भी अपना वोट डालने के लिए पहुंचे. वोट देने के बाद बीप की आवाज नहीं आई. मशीन में गड़बड़ देखने के लिए बूथ पर मौजूद बीजेपी के पोलिंग एजेंट मशीन के पास आ गए. इस दौरान वीवीपीएटी मशीन की पर्ची भी निकल आई. पोलिंग एजेंट की नजर उस पर्ची पड़ी. इस पर कांग्रेस का निशान छपा हुआ था. यह देखकर एजेंट भड़क गया. उसने कहा कि काम बीजेपी के लिए कर रहे हो और वोट कांग्रेस को दे रहे हो. बस यहां से झगड़ा शुरू हो गया.

गांव की जाट बिरादरी बीजेपी के जाट उम्मीदवार मोहन राम चौधरी के पक्ष में लामबंद थी. इस गांव में दलितों के करीब 100 घर हैं. गांव के कई लोग दलितों को चौधरी के पक्ष में वोट डालने के लिए कह रहे थे. लेकिन दलित वोटों को विपक्ष के पाले में जाता देख तनाव पैदा हो गया. दी लल्लनटॉप से बातचीत के दौरान दलित बिरादरी के कई लोगों ने बताया था कि उन्हें वोट डालने से रोका गया. गहमा-गहमी के बीच जैसे-तैसे चुनाव संपन्न हुआ. इसके अगले दिन सुबह गांव के ठाकुरजी के मंदिर में पंचायत बुलाई गई. गांव की मेघवाल बिरादरी को इस पंचायत से दूर रखा गया. इस मीटिंग में जो तय हुआ उसे लाउडस्पीकर के जरिए माइक पर बता दिया गया. पहली चीज कि गांव के तालाब में मेघवाल बिरादरी का घाट अलग कर दिया गया है. दूसरा, जाट बिरादरी का कोई भी आदमी मेघवालों के घर पानी का टैंकर नहीं डालेगा. तीसरा, गांव में जाट समुदाय के दुकानदार किसी भी मेघवाल को कोई सामान नहीं बेचेंगे. चौथा, कोई भी जाट मेघवाल बिरादरी के लोगों के घर नहीं जाएगा.

नाम न उजागर करने की शर्त पर एक नौजवान ने हमें बताया -

"लोकतंत्र में हमें अपना वोट डालने का अधिकार है. हम चाहे जिसे वोट दें. आज हमारी महिलाओं ने बताया कि तालाब में पानी लेने जाते वक्त गांव के कई लड़कों ने अभद्र भाषा में छींटाकशी की. ये लोग धमकी दे रहे हैं कि डांगावास (घटना) जैसी हालत कर देंगे. आखिर हमारा गुनाह क्या है? हमारे ही गांव के कई जाट कांग्रेस के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं. इन लोगों को उनसे कोई दिक्कत नहीं है. बस हमने इनके कहे मुताबिक वोट नहीं दिया तो हम गुनाहगार हो गए? हम अपनी मर्जी से वोट भी नहीं डाल सकते तो इस चुनाव का मतलब क्या है?"

मई 2015 में नागौर के ही डांगावास में तीन दलितों को जमीन विवाद में जाट समुदाय के लोगों ने ट्रैक्टर से कुचल दिया था. दलितों के खिलाफ इस हिंसक वारदात की खबरें कई दिनों तक नैशनल मीडिया में रही थीं. यह संदर्भ इसलिए दिया जा रहा है ताकि आप डांगावास दोहराने की धमकी को समझ सकें. 1951 में भारत में पहली बार चुनाव हुए थे. हमारे संविधान ने हर वयस्क नागरिक को वोट डालने का अधिकार दिया था. उस समय हमारी साक्षरता महज 18 फीसदी थी. पश्चिमी विश्व के मीडिया ने संविधान सभा के इस फैसले का मजाक उड़ाया था. आज हम खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं. फिड़ोद गांव की यह घटना हमारे लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के तमाम दावों के ऊपर सवालिया निशान खड़ा करती है.


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