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राजस्थान की 10 चर्चित सीटें, जिनपर सबकी नज़र थी

और इनके नतीजों पर यकीन करना और भी मुश्किल है.

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11 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 11 दिसंबर 2018, 05:43 AM IST)
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वसुंधरा राजे बीजेपी की तो गहलोत और सचिन पायलट कांग्रेस के बड़े नेता थे. इसके बावजूद 26 विधायक ऐसे थे, जो या तो छोटी पार्टियों से चुनाव लड़कर जीते या फिर निर्दलीय जीते.
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1. पोकरण (बाड़मेर)
पोकरण में मुकाबला स्वामी प्रतापपुरी और सालेह मोहम्मद के बीच था.
पोकरण में मुकाबला स्वामी प्रतापपुरी और सालेह मोहम्मद के बीच था.

राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में पोकरण की सीट सबसे हॉट सीट मानी जा रही थी. इसकी वजह ये थी कि यहां पर मुकाबला दो धर्मगुरुओं के बीच था. बीजेपी के उम्मीदवार हिंदू धर्म के धर्मगुरु थे, जिनका नाम है स्वामी प्रतापपुरी. वहीं कांग्रेस के उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से थे, जिनका नाम है सालेह मोहम्मद और ये भी धर्मगुरु ही हैं. बीजेपी के उम्मीदवार तातरपुरा मठ के स्वामी हैं, तो वहीं कांग्रेस उम्मीदवार गाजा फकीर परिवार के हैं और पहले भी विधायक रह चुके हैं. इसके अलावा ये सीट इसलिए भी चर्चा में थी, क्योंकि पूरे राजस्थान में सर्वाधिक वोटिंग यहीं हुई है और ये करीब 87.45 फीसदी थी.
2. बीकानेर पश्चिम (बीकानेर)
बीडी कल्ला और गोपाल जोशी दोनों आपस में साला-जीजा हैं.
बीडी कल्ला और गोपाल जोशी दोनों आपस में साला-जीजा हैं.

राजस्थान के विधानसभा चुनाव में ये सीट भी खासी चर्चित रही है. इसकी वजह है यहां के बीजेपी और कांग्रेस के प्रत्याशी. बीजेपी और कांग्रेस के उम्मीदवार आपस में जीजा-साले हैं. रिश्ते में बीजेपी उम्मीदवार डॉ गोपाल जोशी कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. बीडी कल्ला के जीजा लगते हैं. और ऐसा नहीं है कि ये मुकाबला पहली बार है. पहले भी दो बार डॉ. गोपाल जोशी अपने साले डॉ. बीडी कल्ला को चुनाव में मात दे चुके हैं. डॉ कल्ला बीजेपी प्रत्याशी डॉ. जोशी की पत्नी के मामा के बेटे हैं. 2008 और 2013 में जोशी ने कल्ला को चुनाव में मात दी है. हालांकि दो चुनाव हारने के बाद कांग्रेस ने डॉ. बीडी कल्ला का टिकट काटकर यशपाल गहलोत को टिकट दिया था. लेकिन इसकी वजह से स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता नाराज़ हो गए थे और फिर आलाकमान ने डॉ. कल्ला को तीसरी बार अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया.
3.महवा (दौसा)
ओम प्रकाश हुडला का टिकट कट गया और इसकी वजह बने राज्यसभा सांसद किरोणी लाल मीणा.
ओम प्रकाश हुडला का टिकट कट गया और इसकी वजह बने राज्यसभा सांसद किरोणी लाल मीणा.

2018 के चुनाव में महवा सीट अपने प्रत्याशियों से ज्यादा बागियों के लिए चर्चित रही है. बीजेपी ने इस सीट से सिटिंग विधायक ओमप्रकाश हुडला का टिकट काटकर राजेंद्र मीणा को दे दिया. इसकी वजह ये रही कि 2013 में बीजेपी से बगावत करने वाले किरोणी लाल मीणा बीजेपी में वापस आ गए. बीजेपी में वापसी के साथ ही उन्होंने अपने भतीजे राजेंद्र मीणा को महवा से टिकट दिलवा दिया. इससे नाराज ओमप्रकाश हुडला ने पार्टी से बगावत कर दी और निर्दलीय ही मैदान में उतर गए. हुडला ने कहा कि किरोणी लाल मीणा की वजह से ही उनका टिकट काटा गया है, जबकि 2013 में जब मीणा ने बीजेपी से बगावत की थी, तो हुडला ने ही किरोणी लाल मीणा की पत्नी गोलमा देवी को महवा सीट पर 16 हजार वोटों से चुनाव हरवाया था. कांग्रेस के साथ भी ऐसी ही स्थिति रही. कांग्रेस ने यहां अजय बोहरा को टिकट दिया तो कांग्रेस के पूर्व जिला प्रमुख अजीत सिंह ने बगावत कर दी और मैदान में उतर गए. रही सही कसर बीएसपी ने पूरी कर दी और उसने अजय बोहरा के चाचा विजय शंकर बोहरा को चुनावी मैदान में उतार दिया. इस सीट का इतिहास रहा है कि इसमें विवाद हो ही जाता है. पिछले विधानभा चुनाव में गोली लगने से एक आदमी की मौत हो गई थी. वहीं इस सीट पर बूथ कैप्चरिंग की भी घटनाएं होती रहती हैं.
4. ओसियां (जोधपुर)
बीजेपी के भैराराम का मुकाबला कांग्रेस की दिव्या मदेरणा से था.
बीजेपी के भैराराम का मुकाबला कांग्रेस की दिव्या मदेरणा से था.

ओसियां विधानसभा सीट इस बार अपने एक प्रत्याशी के लिए चर्चा में थी और उस प्रत्याशी का नाम है दिव्या मदेरणा. दिव्या मदेरणा भंवरी देवी हत्याकांड के मुख्य आरोपी महिपाल मदेरणा की बेटी और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे परसराम मदेरणा की पोती हैं. राजस्थान की सियासत में भंवरी देवी कांड सबकी जुबान पर रहा है. इसके बावजूद दिव्या मदेरणा को टिकट दिया गया, जिससे ये सीट चर्चा में आ गई. वहीं बीजेपी ने इस सीट से अपने सिटिंग विधायक भैराराम सियोल को ही चुनावी मैदान में उतारा था. लेकिन दिव्या मदेरणा को टिकट मिलने की वजह से कांग्रेस ने महेंद्र सिंह भाटी का टिकट काट दिया. इसके बाद महेंद्र सिंह भाटी निर्दलीय ही चुनावी मैदान में उतर गए. महेंद्र सिंह भाटी कांग्रेस के दिग्गज नेता और चार बार के विधायक रहे नरेंद्र सिंह भाटी के परिवार से आते हैं. उनका टिकट कटने और निर्दलीय ही उनके चुनावी मैदान में उतरने से सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला हो गया था.
5. लूणी (जोधपुर)
महेंद्र विश्नोई और जोगाराम पटेल के बीच मुकाबला था.
महेंद्र विश्नोई और जोगाराम पटेल के बीच मुकाबला था.

ये सीट भी अपने उम्मीदवारों से कम और भंवरीदेवी हत्याकांड की वजह से ज्यादा चर्चित है. कांग्रेस ने इस सीट से भंवरी देवी हत्याकांड के आरोपी मलखान सिंह बिश्नोई के बेटे और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे रामसिंह बिश्नोई के पोते महेंद्र विश्नोई को अपना उम्मीदवार बनाया था. ये सीट रामसिंह विश्नोई की परंपरागत सीट रही है और वो यहां से सात बार विधायक रहे हैं. 2009 में रामसिंह विश्ननोई के बेटे मलखान सिंह ने इस सीट से जीत दर्ज की थी. भंवरी देवी हत्याकांड में मलखान सिंह, उनके भाई परसराम विश्नोई और उनकी बहन इन्द्रा विश्नोई जेल चली गई तो कांग्रेस ने उनकी मां अमरी देवी को 2013 के चुनाव के लिए टिकट दिया. अमरी देवी चुनाव हार गईं और वहां से जीते बीजेपी के जोगाराम पटेल. बीजेपी ने फिर से जोगाराम पटेल को ही उम्मीदवार बनाया था. वहीं कांग्रेस की सिरदर्दी बढ़ाई थी राजेंद्र चौधरी ने. राजेंद्र चौधरी कांग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके हैं. 2008 के परिसीमन में टिकट कटने के बाद वो हाशिए पर थे. 2018 में वो लूणी से टिकट मांग रहे थे. नहीं मिलने पर निर्दलीय ही चुनावी मैदान में उतर गए.
6. कोलायत (बीकानेर)
कांग्रेस के भंवर सिंह भाटी का मुकाबला कद्दावर देवी सिंह भाटी की बहू पूनम कंवर से था.
कांग्रेस के भंवर सिंह भाटी का मुकाबला कद्दावर देवी सिंह भाटी की बहू पूनम कंवर से था.

कोलायत सीट बीजेपी के दिग्गज नेता देवी सिंह भाटी की वजह से खास है. इस सीट से देवी सिंह भाटी की बहू पूनम कंवर चुनावी मैदान में थीं. देवी सिंह भाटी के बेटे और पूनम कंवर के पति महेंद्र सिंह भाटी बीकानेर के सांसद रह चुके हैं. 2003 में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई थी. देवी सिंह भाटी खुद कोलायत से सात बार विधायक रह चुके हैं, लेकिन 2013 के चुनाव में वो कांग्रेस के भंवर सिंह भाटी से चुनाव हार गए थे. इस बार भी कांग्रेस ने भंवर सिंह भाटी को अपना उम्मीदवार बनाया था. वहीं देवी सिंह भाटी से चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी थी, जिसके बाद उनकी बहू को टिकट दिया गया था.
7. नोखा (बीकानेर)
रामेश्वर डूडी को चुनौती उनकी भतीजी से ही मिल रही है.
रामेश्वर डूडी को चुनौती उनकी भांजी इंदू तरड़ से ही मिल रही थी. वहीं बीजेपी के बिहारीलाल विश्नोई भी चुनौती बढ़ा रहे थे.

नोखा सीट कांग्रेस के उम्मीदवार रामेश्वर डूडी की वजह से चर्चा में थी. वो इसलिए क्योंकि राजस्थान विधानसभा में रामेश्वर डूडी नेता प्रतिपक्ष हैं. और उन्हें चुनौती मिल रही थी उनकी ही भांजी और हनुमान बेनीवाल की पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी की उम्मीदवार इंदु तरड़ से. इस सीट से बीजेपी के उम्मीदवार थे बिहारीलाल विश्नोई. और इन तीनों की ही मुसीबत बढ़ाई थी निर्दलीय उम्मीदवार मगनाराम ने. वहीं बीजेपी के लिए सबसे बड़े सिरदर्द साबित हो रहे थे मेघसिंह जो टिकट न मिलने की वजह से बागी होकर निर्दलीय ही चुनावी मैदान में उतर गए थे.
8. चुरू (चुरू)
राजेंद्र राठौड़ को रफीक मंडेलिया से चुनौती मिल रही थी.
राजेंद्र राठौड़ को रफीक मंडेलिया से चुनौती मिल रही थी.

2018 के विधानसभा चुनाव में चुरु दो वजहों से चर्चा में था. सबसे पहली वजह ये कि इस सीट पर सबसे कम बूथ थे, इसलिए इसका रिजल्ट सबसे पहले आया. दूसरी वजह ये है कि इस सीट से बीजेपी के पंचायत राज और संसदीय कार्यमंत्री राजेंद्र राठौड़ सातवीं बार चुनावी मैदान में थे. राजेंद्र राठौड़ वही नेता हैं, जो राजस्थान में 2006 में हुए चर्चित दारा सिंह एनकाउंटर मामले में आरोपी रहे थे और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उनको बाइज्जत बरी कर दिया था. लगातार 6 बार विधायक रहे राजेंद्र राठौड़ को टक्कर देने के लिए कांग्रेस से मैदान में थे रफीक मंडेलिया. मुस्लिम बहुल सीट होने की वजह से कांग्रेस हर बार इस सीट से मुस्लिम प्रत्याशी को ही टिकट देती रही है. और इसी वजह से पार्टी ने इस सीट से विधायक रहे हाजी मकबूल मंडेलिया के बेटे रफीक मंडेलिया को टिकट दिया था. वो एक बार लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं.
9 बाड़मेर (बाड़मेर)
मेवाराम जैन इतने ताकतवर दिख रहे थे उन्हें हराने के लिए सांसद कर्नल सोनाराम को बीजेपी ने उम्मीदवार बना दिया था.
मेवाराम जैन इतने ताकतवर दिख रहे थे उन्हें हराने के लिए सांसद कर्नल सोनाराम को बीजेपी ने उम्मीदवार बना दिया था.

बाड़मेर विधानसभा की सीट कर्नल सोनाराम चौधरी की वजह से खासी चर्चा में रही है. चार बार सांसद और एक बार विधायक रहे कर्नल सोनाराम चौधरी ने 2014 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी और बीजेपी में शामिल हो गए थे. 2014 के लोकसभा चुनाव में कर्नल सोनाराम बीजेपी की सीट पर बाड़मेर से सांसद बन गए. लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कर्नल सोनाराम को बाड़मेर से अपना प्रत्याशी बनाया था. कर्नल सोनाराम के नामांकन पर भी विवाद हुआ था. ऐसा इसलिए हुआ था कि उन्होंने 2018 का विधानसभा चुनाव लड़ने के दौरान जो हलफनामा दिया था, उसमें उम्र 73 साल बताई थी. इससे पहले जब वो 2014 का लोकसभा चुनाव लड़े थे तो उस वक्त भी उन्होंने हलफनामे में अपनी उम्र 73 साल ही बताई थी. वहीं बाड़मेर की सीट 2013 के चुनाव में कांग्रेस के खाते में आई थी और यहां से मेवाराम जैन ने जीत हासिल की थी और उन्होंने बीजेपी की डॉ. प्रियंका चौधरी को मात दी थी. बीजेपी बाड़मेर विधानसभा सीट पर हर हाल में कब्जा करना चाहती थी, लिहाजा उसने अपने सांसद को विधानसभा के चुनाव में प्रत्याशी बना दिया.
10. श्रीगंगानगर
कांग्रेस के अशोक चांडक और बीजेपी की वीनिता आहूजा के बीच कामिनी जिंदल ने सीट को चर्चित बना दिया था.
कांग्रेस के अशोक चांडक और बीजेपी की वीनिता आहूजा के बीच कामिनी जिंदल ने सीट को चर्चित बना दिया था.

श्रीगंगानगर विधासभा सीट अपने एक प्रत्याशी की वजह से चर्चा में रही है और वो प्रत्याशी हैं कामिनी जिंदल. कामिनी जिंदल पूरे राजस्थान की सबसे अमीर प्रत्याशी हैं जिनके पास 287 करोड़ रुपये की प्रापर्टी है. इसके अलावा कामिनी राजस्थान विधानसभा की सबसे कम उम्र की विधायक हैं. साथ ही कामिनी श्रीगंगानगर की अब तक की इकलौती महिला विधायक हैं. 2013 में भी कामिनी जिंदल राजस्थान की सबसे अमीर प्रत्याशी थीं और वो चुनाव भी उन्होंने जीत लिया था. उन्होंने अपना चुनाव अपने पिता बीडी अग्रवाल की 2013 में बनाई हुई पार्टी नेशनल यूनियनिस्ट जमींदारा पार्टी से जीता था और इस बार भी वो उसी पार्टी से चुनावी मैदान में हैं. उनके पति गगनदीप सिंगला एक आईपीएस ऑफिसर हैं. बीजेपी ने यहां से विनीता आहूजा को चुनावी मैदान में उतारा है, वहीं कांग्रेस ने अशोक चांडक को टिकट दिया है. ये वो सीट है, जहां से कभी बीजेपी के दिग्गज नेता रहे भैरो सिंह शेखावत भी चुनाव हार गए थे. इस बार भी बीजेपी और कांग्रेस के बागी मैदान में हैं. कांग्रेस के बागी जयदीप बिहाड़ी और राजकुमार गौड़ निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर बीजेपी के बागी और मंत्री रहे राधेश्याम भी मैदान में हैं.

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