चुनाव आयोग ने पांच राज्यों में चुनावों का ऐलान कर दिया है. 4 फरवरी से गोवा सेचुनावी सफ़र शुरू हो जाएगा, जो 8 मार्च को यूपी में जाकर ख़त्म होगा. 11 मार्च कोपांचों राज्यों के रिजल्ट आएंगे.1 फरवरी को संसद में आम बजट भी पेश होने वाला है. अब अपोजिशन वाले सक्रिय हो गएहैं. कांग्रेस को लगता है कि इस बजट से चुनावों पर फर्क पड़ेगा. वोटों के लिएरेवड़ियां बंट सकती हैं. तरह-तरह की योजनाओं की घोषणा करके बीजेपी इसका फायदा उठासकती है. अब तक आम बजट फरवरी के अंत में पेश होता था लेकिन इस बार बजट 1 फरवरी कोही पेश होगा. इस बार के बजट में नई चीज ये भी है कि रेल बजट भी आम बजट के साथ हीपेश किया जाएगा. अलग से सुरेश प्रभु रेल बजट नहीं पेश करेंगे. मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्टयानी आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है. उसी समय से जब इलेक्शन कमिश्नर नसीमज़ैदी प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे. राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार केनेता-मंत्री अब लोगों को बहला फुसला नहीं सकते कि भइया ये दे देंगे. वो दे देंगे.ये कर देंगे, वो कर देंगे. जाति धर्म पर वोट मांगने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदीलगाई है. चुनाव आयोग इस पर भी नज़र रखेगा. सरकारों की योजनाओं और बखानों कीहोर्डिंग्स को हटाने का काम भी शुरू हो गया. नए उद्घाटन और शिलान्यास इलेक्शन कमीशनकी अनुमति के बिना नहीं होंगे. नोटबंदी के बाद इसके आसार और बढ़ गए हैं क्योंकिबैंकिंग सिस्टम में बहुत सारा पैसा आया है. फंड बहुत है सरकार के पास और ये बातअपोजिशन वालों को खटक रही है. वो बजट की तारीख टलवाना चाहते हैं. कांग्रेस, तृणमूलकांग्रेस, सपा, बसपा और कई पार्टियां इसके खिलाफ चुनाव आयोग और राष्ट्रपति के पासपहुंच गई हैं. उनका कहना है कि आम बजट की तारीख टाल दी जाए. इलेक्शन कमिश्नर नसीमज़ैदी ने माना कि कांग्रेस, लेफ्ट, सपा के साथ कई पार्टियों की तरफ से बजट की तारीखटालने के लिए अर्जी दी गई है. कांग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि बजट की तारीखको 11 मार्च के बाद रखा जाए. ज़ैदी ने कहा कि आयोग इस बारे में कानूनी राय ले रहाहै. इस रायशुमारी के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा. ज़ैदी ने उन आरोपों को भी खारिजकिया कि 31 दिसंबर के पीएम के संबोधन और 2 जनवरी की लखनऊ रैली की वजह से चुनाव कीतारीखों को पहले नहीं बताया गया. अगर बजट की तारीख नहीं टली तो अपोजिशन ने आयोग काविरोध करने का प्लान भी बनाया है. अहम बात ये भी है कि सरकार पहले ही आम बजट पेशकरने की सहमति इलेक्शन कमीशन से ले चुकी है.क्या हो सकता है सरकार की झोली में?वैसे तो 31 दिसंबर की अपनी स्पीच में पीएम मोदी ने 'माइक्रो बजट' पेश ही कर दियाथा, लेकिन और भी कई चीजें हैं जिनकी घोषणा सरकार कर सकती है. एक स्कीम है जिस परबात हो रही है, यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम. इसका सीधा मतलब है कि मोदी सरकार सोचरही है कि देश के ज्यादातर लोगों को हर महीने एक फिक्स सैलरी दी जाए. पूरी तरह सेये लागू होना तो मुश्किल है लेकिन अगर ऐसा हुआ तो इस स्कीम से 20 करोड़ लोगों कोफायदा मिल सकता है. इस स्कीम का प्रपोजल लंदन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर गायस्टैंडिंग ने दिया है. उन्होंने कहा कि इसे फेज वाइज सरकार लागू कर सकती है.उन्होंने आगे बताया कि मध्य प्रदेश की सरकार ने एक पंचायत में पायलट प्रोजेक्ट केतौर पर इस प्रपोजल पर काम किया था जिसके काफी पॉजिटिव रिजल्ट आए थे. उम्मीद की जारही है कि इस बार बजट में इस स्कीम की घोषणा की जाए. लेकिन अभी सरकार की तरफ से इसबारे में कुछ भी नहीं कहा गया है. 2012 में भी जब इन्हीं राज्यों में चुनाव होने थेतब बजट को खिसकाकर मार्च के बीच में शिफ्ट किया गया था. लेकिन ये फैसला चुनाव आयोगने नहीं, तब की सरकार ने किया था. बीजेपी का कहना है कि ऐसा कोई कारण नहीं है किबजट की तारीख आगे बढ़ाई जाए. हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते ही हैं. फाइनेंसमिनिस्टर अरुण जेटली ने कहा कि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले भी बजट पेश किया गयाथा. चुनावों का मौसम है. हर पार्टी वोटर को लुभाने के लिए अलग-अलग पैंतरेबाजीदिखाती है. चुनाव से पहले कुछ दिन तो सबसे खतरनाक हो जाते हैं. एक पार्टी कुछ घोषणाकरे तो दूसरे चिल्लाने लगते हैं. यानी सब मिलकर एक दूसरे पर 'ईमानदारी' से नज़र रखतेहैं. ये बजट टालने वाली बात भी इसी का नतीजा है. अब गेंद चुनाव आयोग के पाले मेंहै. देखते हैं वो बजट की तारीख टालते हैं या नहीं?--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी निशांत ने की है.--------------------------------------------------------------------------------